
शहडोल में पिछले सालों धनपुरी खदानों से कोयला ही नहीं निकला था धड़ाधड़ लासे निकल रही थी और इन लाशों के लिए कोई मानवीय संवेदना नहीं दिखी… उनके परिवार को कोई बड़ी राहत नहीं मिली, क्योंकि वह अपराध कर रहे थे यह अलग बात है कि वह अपराध किन परिस्थितियों में कर रहे थे..?अगर अपराध ही रोजगार बन गया है तो वह रोजगार क्यों नहीं कर रहे थे; यह नहीं देखा गया। इसे छोड़ दें और ओरिएंट पेपर मिल (ओपीएम) अमलाई में सोन नदी पर जब से आई है तब से जहर डाल रही है.. लेकिन यह जहर प्रशासन की मौन सहमति मिलकर डाला जा रहा था… क्योंकि प्रशासन ने कोई प्रभावशाली विरोध नहीं किया कुछ अवसर छोड़ दे तो.. समय-समय पर इसकी रिपोर्ट आई और चली भी गई, तब ओपीएम की गोद में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कार्यालय लगता था। अब यह कार्यालय संभागीय मुख्यालय होने के कारण शहडोल में वृत कार्यालय के रूप में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कार्यालय खुला है। लेकिन दुर्भाग्य वस इस कार्यालय में अधिकारी सात पर्दे के अंदर रहने वाला मेहरा हैं ।अगर मजबूरी ना हो कलेक्टर, एसपी के प्रति जवाब देही ना हो तो यह कभी भी पर्दे बाहर नहीं निकलते। क्योंकि उन्हें मालूम है जैसे ही पर्दापास होगा उनका असली चेहरा शहडोल के नागरिकों को दिखने लगेगा। क्योंकि विमर्श पैदा हो जाएगा और इसलिए वह पर्दे के अंदर ही रहते हैं। डरा कर धमकाकर कार्यालय को भयभीत और आतंक के वातावरण में रखना इनकी फितरत है। क्योंकि जब घर ही मजबूत नहीं होगा तो नगर को शहर को डरना मुश्किल होगा। ऐसा इनकी सोच है। इसीलिए वह साथ पर्दे के अंदर रहते हैं। ऐसे अधिकारी अगर पीथमपुर में होते तो शायद ही जिंदा होते हैं.. वर्तमान पीथमपुर में नागरिक जागरूकता को देखकर ऐसा कहा जा सकता है…।
अपनी जिम्मेदारियां के प्रति क्योंकि वहां के नागरिक डर और आतंक से ही सही यूनि.कार्बाईड की घटना को लेकर वह बहुत भयभीत है..या बहुत डरे हुए हैंइसलिए वह बहुचर्चित भोपाल गैस दुर्घटना में करीब सवा पांच हजार में मारे अपने पूर्वजों के प्रति अनजाने में ही पर्यावरण जागरूकता को लेकर श्रद्धांजलि देते नजर आते हैं।जब वह यूनियन कार्बाइड के कचरे को जलाने के लेकर विरोध करते हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि बिना जले ही जो कचरा जहर बनाकर भोपाल गैस त्रासदी में हजारों लोगों की मौत का कारण बना और लाखों जिंदगियां आज भी प्रभावित हैं वह अगर जलाया भी जाएगा तो कितना खतरनाक हो सकता है.. क्योंकि शासन और प्रशासन का विश्वास अब वैसा नागरिकों में नहीं रहा है जैसा होता आया है कोविद-19 महामारी के बाद नागरिकों का विश्वास प्रशासनिक जवाब देही के मामले में दम तोड़ चुका है..।
अगर कोई कोई फिर सेअज्ञात दुर्घटना होती है शासन और प्रशासन का क्या, वह तो कानून व्यवस्था सामान्य बनाने में लग जाएगी। नेताओं का तो पता ही नहीं चलेगा क्योंकि वह पहले से सतर्क है। इसलिए यह सतर्कता स्वयं को जिंदा रखने की एक जरूरत भी है।
इससे हम क्या सीखें… शहडोल में भविष्य में “रीजनल इंडस्ट्री कांक्लेव 16 जनवरी” को होने वाला है। कहां पर कैसी, कितनी इंडस्ट्री आएगी इसकी फॉर्मल तौर पर लोक सुनवाई अगर होती है तो यही पर्यावरण विभाग करेगा.. किंतु यह कितना जवाब देह है यह हमने अनुभव में पाया है।
हालांकि वर्तमान प्रचलन में पर्यावरण लोक सुनवाई सिर्फ एक सरकारी अंगूठा होता है जैसे हमारे क्षेत्र के आदिवासी अपने जीवन की समस्याओं को लेकर एक कागज में अंगूठा लगा देते हैं और उसमें वह समाधान ढूंढते हैं इस तरह प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के माध्यम से होने वाला लोक सुनवाई किसी भी उद्योग के लिए शहडोल जैसे आदिवासी क्षेत्र में सिर्फ एक अंगूठा होता है। इसतरह भ्रष्टाचार पारदर्शी तरीके से चलता रहता है ।कौन जानता था कि जब ओरिएंट पेपर मिल लगेगा तो सोन नदी का पूरा पानी कुछ समय के लिए वही पिएगा और बदले में जहर बटेगा.. इसी के कारण शहडोल का कृषि विकास दर बुरी तरह से प्रभावित रहा। इसके बावजूद भी यह प्राकृतिक संसाधन यहां भरपूर था।
हालात इतने खराब हैं इस संविधान में सुरक्षित पांचवी अनुसूची में अनुसूचित शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में 1970 को स्थापित ओरिएंट पेपर ने यह अनुबंध किया था कि जब सोन नदी के पानी को लेकर कोई कानून बनेगा तब वह पानी का टैक्स देगा। तब यहां के निवासी कृषक जो पानी का टैक्स यहां का किसान अगर एक सीजन नहीं देता है तो दूसरे सीज़न उसकी रिकवरी निकल आती थी, भू राजस्व संहिता के तहत खेत नीलाम होने लगते हैं.. वह सोन नदी का पानी उसे 30 साल फ्री में उपयोग करता रहा.. जब 1998 में कानून बना तब सुनिश्चित हुआ की 300 करोड रुपए करीब लेना है.. फिर शासन को लगा गलती हो गई। कहते हैं अब वह 100 करोड रुपए है 2010 में यह बात सामने आई। किंतु अभी भी 2024 में उसने में कितना पैसा जमा किया है कोई जवाब देही ना प्रशासन की है, ना नेताओं की…? जनता तो आदिवासी ही है.. भलाई वह जनजाति समाज की ना हो किंतु घर आदिवासी क्षेत्र निवासी की जनता है.. इसलिए वह इसे सरकारी काम मानती है।
इसके बाद अन्य जो छोटे-मोटे उद्योग लगे हैं कहते हैं शहडोल के औद्योगिक क्षेत्र में एक उद्योग से जहरीला रसायन निकला तो बगल के तालाब की मछलियां और गाए प्रभावित होती रही। अभी क्या हालत है… क्योंकि जिम्मेदार अधिकारी मेहरा पर्दे के अंदर रहते हैं इसलिए उनसे कौन बात करें..? घूंघट हटाएंगे तो कहीं अनुसूचित जाति,जनजाति समाज के कानून में अपराध ना बन जाए। इसलिए पत्रकार भी उस तरफ देखना बंद कर दिए। अगर अपनी विशिष्ट योग्यता से किसी ने देखा भी तो विज्ञापन मिल ही जाता है, और जब मुंह दिखाई मिल गई तो सवाल ही नहीं उठाता की कोई पर्दाफाश हो..?
बहर बात रिलायंस इंडस्ट्रीज की करें जब बाबूलाल गौर ् उद्योग मंत्री रहते हुए इसी औद्योगिक क्षेत्र में आकर कहे थे की 90% लोगों को रोजगार स्थानी लोगों को मिलेगा.. रोजगार तो मिला नहीं हां पूरा आउटसोर्स का इंडस्ट्री खड़ी हो गई… इस उद्योग का आतंक और भय के मामले में प्रशासनिक हालात इतने गंदे हैं रिलायंस इंडस्ट्रीज के मामले में की मध्य प्रदेश शासन खनिज अनुबंध के तहत 16 साल से कानूनी औपचारिकता भी पूरी नहीं कर पाई है।
क्योंकि वह अंबानी जी अपने मोदी जी के बहुत प्रिय मित्रों में एक है.. आदिवासी क्षेत्र में अम्बानियों को लूटने का आरक्षण है.. अच्छा हुआ है की अनिल अंबानी दिवालिया हो गए अन्यथा बड़ा भाई एक तरफ से तो छोटा भाई दूसरे तरफ से शहडोल को अपने-अपने तरीके से अवैध रूप से दोहन/शोषण करता रहता…।
ऐसा प्रतीत होता है इसीलिए आज तक अनुबंध नहीं हुआ है बल्कि अनुबंध में छूट मिल जाए इसकी प्रक्रिया ऊपर चलने लगी है.. अनुबंध में छूट मिलने का मतलब सिर्फ करोड़ों रुपए की स्टांप ड्यूटी से छूट नहीं है बल्कि शहडोल क्षेत्र में इस उद्योग से प्रभावित तमाम आम नागरिकों के साथ होने वाली किसी भी भयानक दुर्घटना की संभावना और उसकी जवाब दे ही से भी छूट है।
और हो भी क्यों ना वर्तमान रामराज में इसमें सबका भला है। प्रशासन का भी भला है । हां स्थानीय आदिवासी क्षेत्र के निवासी कोई भी हो नेता, अधिकारी, पत्रकार यह सब आदिवासी ही है… इनको लूटने का आरक्षण रिलायंस इंडस्ट्रीज को मिला हुआ है.. इसीलिए आज तक अनुबंध नहीं हुआ है। ऐसा क्यों न समझा जाए..?
क्योंकि यहां पर कोई विरोध करने वाला “माई का लाल” पैदा ही नहीं हुआ… यहां सिर्फ टाइगर जिंदा घूमते हैं यह जंगल है और जानवरों में कोई संवेदना नहीं होती.. पिछले दिनों ही शहडोल के बगल में एक महिला को बाघ खा गया, कानून कहता है पैसा दे दो.. इससे ज्यादा क्या होगा ..।जब कभी रिलायंस इंडस्ट्रीज या अन्य उद्योग जो है, अथवा लगने वाले हैं.. उनमें कोई भयानक दुर्घटना होगी तो कानून कहता है कि पैसा दे दो…, एक तो जवाब दे ही सुनिश्चित नहीं होगी अगर सुनिश्चित होगी भी तो किसी आउटसोर्स द्वारा पैसा दे दिया जाएगा.. यही तो आदिवासी विशेष क्षेत्र की शोषण की स्थापित कानून व्यवस्था है। जो शांतिपूर्ण तरीके से कायम रहती है। इसकी जिम्मेदारी भी प्रशासन की है।अन्यथा क्या कारण है कि “रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव” में पत्रकारिता की सम्मानजनक एंट्री नहीं है.. उन्हें वहां सिर्फ पेड न्यूज़ के तहत जो उनके अपने गुलाम होंगे, वही मीडिया वहां जा सकेगा ..।
कुशल प्रबंधन के बावजूद मजाल है की प्रदूषण के खिलाफ पर्यावरण विनाश के खिलाफ यहां विचार जिंदा हो सके.. यही 2025 का आदिवासी विशेष क्षेत्र का भविष्य है… और कोई बात नहीं है, क्योंकि यूनियन कार्बाइड भोपाल गैस त्रासदी में हजारों लोग मारे गए, क्योंकि गैस इंडस्ट्री ने जहरीला रसायन का उपयोग किया था.., उस मौत के ख्वाब की दहशत का डर 40 साल बाद इतना जबरदस्त है कि आज भी पीतमपुर में आम आदमी को थोड़ा भी शक है तो वह उबल पड़ता है.. पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड का कचरा जलाने का विरोध का यही सच है..।
आदिवासी विशेष क्षेत्र में लूटो, खाओ, खिलाओ मस्त रहो और अगर हत्याएं होती हैं, लोग मरते हैं तो यही यहां की जिंदगी है… कानून कहता है मुआवजा दे दो… किंतु यह मुआवजा रीवा-अमरकंटक सड़क मार्ग की लापरवाही के कारण बाणसागर नहर डैम में 56 लोगों के एक्सीडेंटल मौत से कितना मिलता है …? मिला भी है कि नहीं.. यह सब पारदर्शी नहीं है… क्योंकि यही सच्चाई है कि 56 लोगों की इस पारदर्शी हत्या के बाद एक भी सरकारी कर्मचारी सस्पेंड नहीं हुआ है…
मौत भगवान की देन है शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में भविष्य में औद्योगिक प्रदूषण से होने वाली मौतें.. भगवान की देन होगी.. क्या किया जा सकता है… हम दूध की जली बिल्ली नहीं है… इसलिए मातम कर क्यों जिंए.. पर्यावरण जागरूकता यहां की कोई चाहत नहीं है अफीम और रिलायंस में बल्कि उन उद्योगों में भी यही शहडोल का कड़वा सच है .. क्योंकि थोड़ा बहुत जो पता चलता है वह अधूरा होता है किंतु वही “बटुआ का भात” होता है…आदिवासी क्षेत्र के निवासियों को भगवान चलता है.. लूटपाट यहां की विरासत पूर्ण परंपरा है… शहडोल से बाहर से आने वाले तमाम स्थापित, प्रतिष्ठित हो चुके नेता, अधिकारियों और नागरिकों के लिए यह चारागाह है… लूट सके तो लूट… यही यहां का राम राज है और कोई बात नहीं… ( त्रिलोकीनाथ )

