
सनातन व वर्तमान हिंदू धर्म इन दोनों उपभोक्तावादी बाजार में बेचने का प्रचलन चल पड़ा है उससे सनातन आध्यात्मिकता की आत्मा की हत्या का प्रयास किया जा रहा है उसका एकमात्र कारण यह है कि “जो बाड़ी है वही खेत का रही है..” जिन्होंने यह दावा किया कि वह हिंदुओं के ठेकेदार हैं और हिंदूवादी प्रबंधन को आगे बढ़ा रहे हैं दरअसल वह ही इस आड़ में सनातन हिंदू धर्म के सभी आध्यात्मिक केन्द्रों का बाजारीकरण कर रहे हैं और उसे भारी लाभ का मुनाफा का धंधा बना रहे हैं या फिर वोट बैंक की राजनीति में उसे जरिया बना रखा है। इससे सनातन धर्म की मौलिकता विलुप्त होने की कगार में है और बाजारों की धुंध में मूल आध्यात्मिक भावना नष्ट हो रहे हैं। इसे बचाने वाला अभी तक कोई सामने खुलकर नहीं आया है । जो संत और शंकराचार्य इसके खिलाफ बात करते हैं वह राष्ट्रीयद्रोही से कम बताए जाने में झिझक नहीं किए जाते। यह अलग बात है कि संविधान के संरक्षण के चलते ऐसे मुखर अभिव्यक्ति को संरक्षण मिलता है।
———(त्रिलोकी नाथ)——
बहरहाल 144 साल बाद आने वाला ऐतिहासिक प्रयागराज कुंभ किसी मानव के जीवन में एक अहम पड़ाव है और कुंभ के हालात यह हैं कि जिस कुंभ से भारतीय आध्यात्मिक का जीवन दर्शन निकालना चाहिए और उनका आध्यात्मिक राजनीतिक पक्ष देश और दुनिया के हित में प्रदर्शित होना चाहिए वहां पर मीडिया गिरी के चलते टीआरपी बढ़ाने के लिए धंधे किया जा रहे हैं। कहीं कोई मोनालिसा नाम की रुद्राक्ष का माल बेचने वाली गरीब लड़की, तो कहीं कोई मॉडल चर्चित होती है या फिर आध्यात्मिकी झुकाव रखने वाले आईआईटी से निकले बाबा अभय सिंह की आध्यात्मिक पक्ष की बजाय उसका विवादित पक्ष बाजार में ट्रेंड कर रहा है।हालात इतने अराजक और खतरनाक हो गए हैं की आईआईटी बॉम्बे के अभय सिंह का विज्ञान और आध्यात्मिक जोड़ और उसके निष्कर्ष से निकलने वाली संभावनाएं ज्यादा चर्चित नहीं होती बल्कि उनकी पर्सनल लाइफ स्टाइल को मीडिया अपना धंधा बना रहा है।
उसका एकमात्र कारण यह है की राजनीति ने धर्म को हाईजैक कर रखा है और मीडिया की अराजकता ने उसे बढ़ावा दिया है इस बाजारवादी संस्कृति से प्रयागराज का कुंभ अपनी मौलिकता के मायने नहीं खोज पा रहा है।
कह सकते हैं कि ईश्वर का यही विधान है… किंतु यह ईश्वर का विधान नहीं बाजारवाद का घृणित कुत्सित प्रयास है जिसे रोकने में प्रशासन बुरी तरह से फेल है। बल्कि प्रशासन अप्रत्यक्ष रूप से इसे बढ़ावा भी दे रहा है जब वह इसे नहीं रोक पा रहा है।
कुछ इसी प्रकार के हालात शहडोल क्षेत्र के अमरकंटक की मां नर्मदा महोत्सव के आयोजन में देखने को मिल रहे हैं जहां बाजारबाद को महत्व देने के लिए अनूपपुर का जिला प्रशासन राजनीतिक इशारे से बाजार के धंधे को बढ़ाने में लगा हुआ है। यह आज भी हो रहा है लंबे समय से इसके प्रयास किया जा रहे थे और इसका सबसे गंदा प्रयास तब हुआ था जब साडा बनाकर के लल्लू लाल गुप्ता ने अमरकंटक की मौलिकता को बाजार के धंधे में अपना स्वार्थ सिद्ध करने का काम किया था। तब भ्रष्टाचार गंदी राजनीति और बाजारबाद ने मिलकरके अमरकंटक की मूल आध्यात्मिक चेतना को बाजार में बदलने का काम किया था।
अमरकंटक में नर्मदा जन्मोत्सव की तैयारी पर पुजारियों में असंतोष महाआरती के लिए बाहर के पुरोहितों को बुलाने पर नर्मदा मंदिर के पुजारियों ने जताया विरोधकहीं जिला प्रशासन के एक फैसले से नर्मदा मंदिर के पुजारियों में विरोध जताया है। पुजारियों ने बताया कि मां नर्मदाका जन्मोत्सव हर वर्ष परंपरागत और भव्य तरीके से मनाया जाता है जिसमें स्थानीय पुजारी विशेष पूजा-अर्चना और महाआरती कराते चले रहे हैं। इस वर्ष जिला प्रशासन रामघाट पर आयोजित होने वाली महाआरती के लिए वाराणसी से पुरोहितों को बुलाया है। पुजारियों का कहना है कि प्रशासन का यह कदम उनके अधिकारों का हनन है।उन्होंने सवाल उठाया कि क्या वाराणसी के पुरोहित मां नर्मदा की पूजा पद्धति को भलीभांति जानते हैं। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र की अपनीपूजा परंपराएं और विधियां होती है। जैसे नर्मदा के पुजारी मां गंगा की पूजा-पद्धति पूरी तरह नहीं जानते वैसे ही वाराणसी के पुरोहित भी नर्मदा पूजा में पारंगत नहीं हो सकते। पं. उमेश द्विवेदी( पुजारी नर्मदामंदिर अमरकंटक)का कहना है नर्मदा जन्मोत्सव में प्रदेश के मुख्यमंत्री के भी महाआरती में स्थानीय परंपराओं और उनके अधिकारों को क्षेत्र की पूजा-पद्धति अपने इतिहास और संस्कृति का प्रतिबिंब होती है। जिला प्रशासन द्वारा बाहरी पुरोहितों को नियुक्त करना और पूजा में बदलाव करना हमारे धार्मिक अधिकारों और परंपराओं का उलंघन है। हम इसका पूर्ण विरोध करते हैं।
और सबसे गंदा प्रतिफल यह आया कि अमरकंटक की शीर्ष में जैन मंदिर के आड़ में भ्रष्टाचार से ओतप्रोत तमाम व्यापारियों ने गैर कानूनी तरीके काफी सहारा लेकर से जैन मंदिर परिसर में अपना कब्जा किया और वहां पर एक अतिरिक्त बाजार खड़ा कर दिया। यह अलग बात है इसमें कई लोग की हत्या हो गई या वह मर गए लेकिन इससे काम नहीं बना और ना ही इसे रोका गया। अब यह विकसित बाजार के रूप में अपना वर्चस्व स्थापित कर चुकी है। एक अलग बाजार अगर कंटक से हटकर वहां पर धंधा बन रहा है। और प्रशासन ने उसे धंधा बनाने में मदद की।
अब यह बाजार नर्मदा के मूल स्रोत क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है जिसका पुरजोर विरोध किया जा रहा है।
कौन नहीं जानता है की यही जैन समुदाय जो की अमरकंटक में पर्यावरण को क्षति पहुंच करके अपना परिसर स्थापित किया है उसी के प्रमुख विद्यासागर जी महाराज के कार्यकाल में “शिखरजी” पर्वत को पर्यटन स्थल बनाए जाने केखिलाफ पूरे भारत में जैन समुदाय ने अहिंसक तरीके से रैलियां निकाल करके प्रायोजित रूप से शिखरजी को आध्यात्मिक केंद्र के रूप में संरक्षित कर लिया.. यह अलग बात है कि सब कुछ प्रायोजित था और राजनीति को इस प्रायोजित आंदोलन का संरक्षण था. उस वजह से शिखरजी पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने से बचाया जा सका.
किंतु यह काम अमरकंटक क्षेत्र में आखिर क्यों नहीं हो पा रहा है…? यहां पर उन जैन समुदाय के लोगों ने अतिक्रमण कर बाजार बना दिया है और इसकी आध्यात्मिक चेतना को नष्ट भ्रष्ट करने के पूरे प्रयास हो रहे हैं… किंतु आखिर उस स्थल की आध्यात्मिक चेतना वहां की जैव विविधता और मानव विकास को जो जैसा है उस स्थिति में विकसित करने की बजाय राजनीतिक दृष्टिकोण से बाहर से तथा-कथित पंडित-पुजारी लाकर नर्मदा महोत्सव में आरती करवाने का ठेका के सरकारी फंड का दुरुपयोग तो किया ही जा रहा है तो दूसरी तरफ स्थानीय पंडित पुजारी का भी अपमान किया जा रहा है। यह घोर निंदाजनक के साथ उस स्थल की मौलिकता को भी खत्म करने का प्रयास है।
फिर अगर प्रशासन को यह बात लगती है कि अमरकंटक के पंडित पुजारी आदिवासी स्तर के बैकवर्ड क्षेत्र के लोग हैं तो प्रशासन को अपनी योग्यता साबित करते हुए इन्ही पंडित पुजारी को बनारस में आरती की ट्रेनिंग के लिए भेज देना चाहिए था । लेकिन वह ऐसा नहीं करती वह स्थानीय पुजारी का अपमान करने में अथवा बनारस के पुजारी को आयात करके उनका धंधा बढ़ाने में ज्यादा रुचि लेती दिखाई देती है आखिर यह क्यों होता है
हो सकता है की प्रशासन और राजनेताओं की नजर में वहां के पंडित पुजारी आदिवासी स्तर पर बैकवर्ड हों किंतु इस क्षेत्र का विकास उसकी मौलिकता और मानव विकास के क्रम का हिस्सा क्यों नहीं हो सकता… उसे उसी रूप में विकसित क्यों नहीं किया जा सकता..? यह बड़ा प्रश्न है। और यह तभी संभव है जब इस क्षेत्र के सांसद और विधायक इस पर पुरजोर तरीके से अपनी बात रखेंगे अन्यथा बाहरी अतिक्रमणकारियों तत्व और बाहरी बाजारी पंडित पुजारी माफिया बनाकर के अमरकंटक की समस्त धार्मिक आध्यात्मिक चेतना को अपने तरीके से चलाने लगेंगे और वह भारतीय बाजार में विकृत तरीके से अमरकंटक को दिखाने का काम होगा।
देखना होगा कि सांसद अथवा विधायक अपनी राजनीतिक गुलामी और निष्ठा को छोड़कर के अमरकंटक की आध्यात्मिक मौलिक चेतना के बारे में कुछ सोचते भी हैं अथवा वह भी अपने अकाओं के इशारे पर अथवा व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए पर अमरकंटक की आध्यात्मिक स्थिति को खत्म करने में योगदान प्रकट करते हैं।
इस बीच एक सुखद खबर यह है की जब भ्रष्ट मानव स्वार्थ के वसीभूत होकर अध्यात्म को खत्म करने के नए-नए रास्ते ईजाद कर रहा है। इस बीच जैव विविधता के केंद्र के रूप में अमरकंटक के विकसित होने के भी खबर आ रही है कहा जाता है जालेस्वर में बाघ का कब्जा है तो तुलरा में हाथियों ने अपनी धमक दी है। और यह अच्छा भी है जब मनुष्य बाजारबाद के चक्कर में अमरकंटक की आध्यात्मिकता को बेच रहा है राजनीति सड़ चुकी हो तब अन्य जीव-जंतु शायद अमरकंटक को बचाने का काम करें…

