सोशल मीडिया मंच पर कलेक्टर का आपातकाल…? कोई नई बात नहीं… ( त्रिलोकीनाथ )

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     प्रतीत होता है अब यह है कल की बात हो गई है जब नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्रीबने और अमेरिका में फेसबुक हैडक्वाटर में जाकर के इस आशय की पूरी दुनिया में घोषणा की सोशल मीडिया अब लोकतंत्र का पांचवा स्तंभ हो गया है क्योंकि इसी सोशल मीडिया पर कलेक्टर छिंदवाड़ा ने लगभग आपातकाल लगाने की घोषणा कर दी है एक आदेश पारित करके उन्होंने सोशल मीडिया मंच को अपनी जवान में ताला लगाने को कहा है। सोशल मीडिया मंच “द सूत्र” के अनुसार क्योंकि संभावना है कि जिस महान उद्योगपति अदानी की कारोबार हेतु जमीन का अधिग्रहण किया जाना है वहां भ्रम फैल सकता है और कानून व्यवस्था की परिस्थितियों पैदा हो सकती हैं. इसलिए कोई भी आम जनता भी अदानी के कारोबार के खिलाफ किसी भी प्रकार की कोई संदेश प्रसारित न करें। इससे प्रतीत होता है भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कुछ कहा था शायद वह हाथी के दिखाने का दांत था…?

                                       ——-( त्रिलोकीनाथ )—–
यह अलग बात है कि भारत में अघोषित तौर पर लगभग राष्ट्रीय उद्योगपति स्थापित हो चुके अगर वही गौतमअदानी है तो, जिसे अमेरिका ने रिश्वतखोरी करने के अपराध का आरोप में अपने न्यायालय में मुकदमा चला रखा है। तो उसी के छिंदवाड़ा क्षेत्र स्थित सड़क निर्माण कार्य हेतु सुरक्षा के लिए कलेक्टर छिंदवाड़ा ने अपनी कर्तव्य निष्ठा का प्रदर्शन किया है। जिसका आधार वहां के पुलिस अधीक्षक का संदर्भित पत्र है।
यह अलग बात है कि उस आदेश की सीमा छिंदवाड़ा कलेक्टर जिला के सीमा पर लागू होती है। लेकिन यह संदेश भी है कि भविष्य में मध्य प्रदेश के सभी कलेक्टर ऐसे स्थापित हो चुके अघोषित तमाम उद्योगपतियों के लिए ऐसी आपातकालीन आदेश जारी कर सकते हैं। यह एक उदाहरण के रूप में क्यों नहीं देखा जाना चाहिए…?

और यह कोई नई बात नहीं है हाल में अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के शपथ समारोह में एकमात्र भारत से उद्योगपति मुकेश अंबानी को बुलाया गया था अदानी को भी नहीं बुलाया गया हो सकता है अमेरिका अपने न्यायालय का सम्मान में ऐसा किया हो। इन्हीं मुकेश अंबानी की इंडस्ट्री शहडोल में भी जब रिलायंस इंडस्ट्रीज स्थापित हो रही थी उसे दौर में शहडोल कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक तत्कालीन प्रभारी मंत्री के सामने सर्किट हाउस में यह कहते सुने गए थे रिलायंस इंडस्ट्रीज से संबंधित आदिवासी विशेष क्षेत्र केगांव में जो ग्रामीण निवासी असंतुष्ट होकर आंदोलन करने पर उतारू है वह रिलायंस के खिलाफ आंदोलन के बारे में सोच रहे हैं और अंततः उसमें से कुछ आंदोलन कारियो को तब कलेक्टर मुकेश शुक्ला ने जिला बदर कर दिया था ताकि दहशत में बाकी आंदोलनकारी अपनी बात ना रख सके और यह हुआ भी। लेकिन तब कलेक्टर मुकेश शुक्ला ने इस आशय का कोई प्रयास नहीं किया मध्य प्रदेश खनिज अधिनियम के तहत इसी मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज जो शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में अपना काम करने जा रही है वह खनिज अधिनियम के तहत अनुबंधों का पालन करें। और इसका असर भी यह हुआ की अंबानी बंधुओं शहडोल में खनिज अधिनियम के अंतर्गत उद्योग अनुबंध नहीं किए गए जो आज भी अघोषित तौर पर उन्हें छूट दी गई है… बल्कि दिल्ली में उद्योग लगने के 15 साल बाद इस बात पर चर्चा हो रही है कि उन्हें खनिज अनुबंध जिसमें मध्य प्रदेश शासन को संभावित तौर पर करीब हजार करोड रुपए का राजस्व मिलना है इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय पर्यावरण और पारिस्थितिकी तथा आम आदमियों की इस खतरनाक उद्योग से सुरक्षा होना सुनिश्चित है उसका पालन आज तक नहीं कराया जा सका… तत्कालीन कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक की तानाशाही से उद्योगपति मुकेश अंबानी को लगभग छूट दे दी गई यानी करोड़ों रुपए उद्योगपति को काला धन के रूप में रखने की छूट दी गई जो मध्य प्रदेश राजस्व के खजाने का हिस्सा था.. और स्वाभाविक है अगर स्थानीय नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए अपने मौलिक अधिकार के लिए जो आंदोलन कर रहे थे किसी एक को जिला बदलकर के ऐसा आतंक पैदा कर दिया गया कि अन्य नागरिक उसे बारे में सोच भी नहीं सकते।

 कलेक्टर छिंदवाड़ा की घोषित तौर पर यह आदेश तब शहडोल कलेक्टर के मौखिक विचार मंथन का आधुनिक स्वरूप है स्वाभाविक है यदि सोशल मीडिया जो माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की नजर में लोकतंत्र का पांचवा स्तंभ है उसे पर रोक लगा दिया गया है तो छिंदवाड़ा में पूरी तरह से आपातकाल वैचारिक तौर पर लग गया है और अब नागरिक ऐसे क्रांतिकारी भी नहीं है कि वह जान में जोखिम डालकर कानून के झमेले में फंसकर अपने विचार रख सकें यह शासन और प्रशासन को भली-भांति मालूम हो चुका है और वहां पर संबंधित लिंक परियोजना से जो भी भ्रष्टाचार या प्रशासनिक स्तर पर घोटाले क्रियान्वित हो रहे हैं उसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत कोई भी सूत्र अथवा स्रोत प्रशासन तक पहुंचने पर भी रोक लग गए हैं।

क्योंकि छत्तीसगढ़ में एक पत्रकार इसी प्रकार की एक सड़क परियोजना के भ्रष्टाचार पर समाचार सार्वजनिक कर रहा था जिससे उसकी जो बुरी मौत हुई है वह रूह काप देने वाली है तो पत्रकार जाति के लोग ऐसी असुरक्षा में सुरक्षा में ऐसा जोखिम क्यों उठाएंगे वह नक्सलवादी तो है नहीं..? तो ऐसे आदेश लोकतंत्र का यह स्वरूप बेहद खतरनाक और शोषणकारी है राज्य तंत्र का आधुनिक अवतार भी है कलेक्टर छिंदवाड़ा को इस प्रकार के आदेश से आखिर क्यों नहीं बचना चाहिए था उनकी निष्ठा जनता के लिए, जनता के द्वारा, और जनता का, कार्यपालिका का प्रतिनिधित्व करता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है 26 जनवरी 1925 की संविधान लागू होने के दिवस के पहले मध्य प्रदेश में ऐसे तथा कथित राष्ट्रीय उद्योगपतियों के हित में गुलामी भरे आदेश एक प्रयोग है अथवा संयोग यह भविष्य में कैसा असर डालेगा देखने लायक होगा।


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