
24 जनवरी को शहडोल में भी भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी ने “संविधान-संविधान” खेल को फुटबॉल की तरह खेला . दोनों ने शायदअपने आला कमान के निर्देश पर संविधान के पक्ष में और संविधान के विपक्ष में एक दूसरे पर संविधान को न मानने का अथवा बार-बार संशोधन करने का अथवा भारतीय संविधान की तकनीकी पहलुओं पर अपने-अपने तरीके से मनोरंजन का टाइम पास करने का काम किया . क्योंकि उन्हें निर्देश था कि वह इस पर एक ऐसा भ्रम पैदा करें ताकि लोग संविधान-संविधान नाम के नए खेल को मनोरंजन की तरह या तो समझे या फिर संविधान नामक फुटबॉल में लात मार कर किनारे हो जाएं। ताकि यह मुद्दा खत्म हो जाए कि संविधान जैसी चीज बहुत उबाऊ है बहुत बोरिंग है, इस पर चर्चा नहीं करनी चाहिए।
————————-( त्रिलोकी नाथ)———————-
यह बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि अगर भारत में संविधान पर जब चर्चा होती है तो 75 साल बाद इस बात का आकलन होना चाहिए की जमीन में भारतीय संविधान को लागू करने में हमारी राजनीतिक पार्टियों किस रूप से सफल हुई अथवा उसका प्रमाण पत्र क्या है..? तो हम शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र के संदर्भ में इसकी जमीनी हकीकत को तलाशने का काम करेंगे ……
उम्मीद तो थी कि जब दोनों राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस संविधान-संविधान का प्रेस कॉन्फ्रेंस पर चर्चा करेंगे तो वह प्रयास करेंगे यह बताने का की शहडोल में अगर भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची लागू है यानी सविधान की पांचवी अनुसूची में शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र के कई हिस्से अनुसूचित हैं तो उन अनुसूची वाले हिस्सों में भारत का संविधान क्या काम कर पा रहा है…? या बेहोश है अथवा मर गया है और अगर नहीं मारा है तो मरा हुआ क्यों दिखता है…? इस पर चर्चा किसी भी राजनीतिक दल ने करने की जरूरत नहीं उठाई…क्योंकि उन्हें यह मालूम है कि जब वह संविधान का आईना जमीन पर उतारेंगे तब पता चलेगा कि राजनीतिक दलों ने पूरी निष्ठा संविधान को भ्रमित करने में अथवा उसे सिर्फ प्रोपेगंडा की तरह उपयोग करने में दिखाई है।
अन्यथा कोई कारण नहीं है कि पेसा एक्ट लागू करने के बाद भी तमाम राजनीतिक दलों के नेता अथवा कार्यकर्ता आदिवासी विशेष क्षेत्र की आदिवासियों की जमीन पर कब्जा करके बैठे हुए हैं… और उसमें भारी लाभ कमाते हुए कालोनियां बनाकर बेच रहे हैं.. और कौन नेता किस आदिवासी की जमीन पर कितना कब्जा करके बैठा है अथवा उसे पर कॉलोनी बनाकर बेच रहा है और आदिवासियों को लूट रहे हैं इस पर चर्चा आखिर क्यों नहीं होती…?जबकि सब जानते हैं यानी भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी दोनों के दोनों नेता यह जानते हैं की दोनों पार्टियों के अंदर इस प्रकार का अपराध कौन-कौन नेता अथवा कार्यकर्ता कर रहा है किंतु वह इस पर बात सार्वजनिक करने से डरते हैं.. क्योंकि आखिर दोनों ही राजनीतिक दल के लोग हमाम के शीश महल में बैठे हुए हैं और उन्हें मालूम है की कांच के घर में बैठकर दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका जाता…? यहज्ञान तो उन्हें विरासत में मिला ही है, लेकिन जब वह अपने शीश महल से यानी कांच के मकान से बाहर जाते हैं तब देखा जाता है। इस क्षेत्र में उद्योगपतियों ने पिछड़े क्षेत्र के विकास के नाम पर संविधान और नियमों के खुले आम धज्जियां उड़ा रहे हैं और अपने हिसाब से इन्हीं प्रेस कांफ्रेंस करने वाले राजनीतिक दलों से संशोधन करवा रहे हैं..
मैं पुनः सिर्फ दो उद्योगों पर चर्चा करूंगा और शहडोल क्षेत्र यानी संभाग की नदियों तो सबसे पहले सोन नदी पर चर्चा करते हैं जो अमरकंटक से निकाल करके भारत के मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य के लिए वरदान बन रही है किंतु शहडोल के लिए वह उतनी ही पिछड़ी हुई और दलित है जितनी की इस क्षेत्र का आदिवासी कुचला हुआ है। सोन नदी के पानी का उपयोग शहडोल क्षेत्र में लगभग ना के बराबर हुआ है बल्कि उसमें प्रदूषण करके उसे देश की आजादी के बाद स्थानीय निवासियों आदिवासियों के लिए आयोग्य बना दिया गया था और जिसने भी उसका उपयोग किया वह अनेक बीमारियों अथवा प्रदूषण का शिकार होता रहा। ओरिएंट पेपर मिल्स ने इसी सोन नदी में 1970 में एक अनुबंध किया था कि कि वह पूरी सोन नदी के पानी का उपयोग नदी को रोक करके ओरिएंट पेपर मिल के लिए करता रहेगा और यदि नियम बनेंगे तो वह संबंधित नियमों के अधीन सोन पानी का शुल्क अदा करेगा। शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में मध्य प्रदेश के नेताओं ने कभी ऐसा नियम बनने ही नहीं दिया अथवा वह भूल गए यानी सविधान को लागू नहीं होने दिया ।
1992 में जब पहली बार यह बात मेरे संज्ञान में आई तब इस पर अनेक प्रकार से दबाव बनाकर के कांग्रेस पार्टी की दिग्विजय सिंह सरकार ने 1998 में कानून बनाया, यानी नियम बनाया और इस आदिवासी विशेष क्षेत्र में सोन नदी पर करीब 300 करोड रुपए का बकाया जल कर भुगतान का हिसाब बिना और भारतीय जनता पार्टी सरकार आने के बाद अब यह घटकर 100 करोड रुपए कर दिया गया है ऐसा बताया जाता है और वह भी नहीं लिया गया है । यहां पर आदिवासी विशेष क्षेत्र में विशेष कानून में अनुसूचित जिले में भी संविधान ने कह सकते हैं दम तोड़ दिया यह अलग बात है की वर्तमान में निर्धारित मासिक नियमित वॉटर टैक्स जो भी थोड़ा बहुत मिल रहा है उसकी वसूली नियमित रूप से हो रही है अथवा उसमें भी चोरी हो रही है यह पत्रकारों के लिए कुतूहल का विषय हमेशा रहेगा ।सवाल यह है कल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों पार्टियों संविधान की आदिवासी विशेष क्षेत्र में हुई हत्या पर इस पर कोई चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा…?
अब आते हैं भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल में आई मुकेश अंबानी की नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज पर, 2009 में यह इंडस्ट्री शहडोल में इस वादे के साथ आई थी कि वह स्थानीय लोगों को 90% रोजगार देगी यह नहीं मालूम कि संविधान में इसकी गारंटी दी गई है अथवा नहीं.., किंतु तत्कालीन उद्योग मंत्री बाबूलाल गौर ने यह बात कही थी। 2009 के बाद आज तक रिलायंस इंडस्ट्रीज आदिवासी क्षेत्र में शोषण और दमन का एक बड़ा चेहरा बनकर आई है उसने भी उद्योगपति बिरला की तरह इस आदिवासी क्षेत्र में संविधान को मानने से इनकार कर दिया और मध्य प्रदेश खनिज अधिनियम के तहत सीबीएम गैस के उत्खनन का अनुबंध करने पर अपने राजनीतिक पहुंच के कारण अनुबंध को टालती रही। क्योंकि खनिज अनुबंध किए जाने पर मध्य प्रदेश सरकार को करीब हजार करोड रुपए के राजस्व का भुगतान करने की स्थिति बन रही थी और रिलायंस के अंबानी जी यह भुगतान यह कहकर नहीं करना चाहते की वह पिछड़े क्षेत्र का उद्धार कर रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि इंडस्ट्रीज के बाहरी लोग जो शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र के निवासी नहीं है या कह सकते हैं भारत के आदिवासी विशेष क्षेत्र के निवासी नहीं है उनसे हटकर बाहरी लोगों ने कब्जा कर रखा है। और स्थानीय लोगों को नए प्रकार का बंधुआ मजदूर की तरह नाम मात्र का पेटी कॉन्टैक्टर या फिर आउटसोर्स का मजदूर बना रखा है। जो दस्तावेज बाहर छन कर आए हैं उसे यह स्थापित होता है की रिलायंस इंडस्ट्रीज मध्य प्रदेश के खनिज नियमों को दरकिनार कर दी है और उसमें अनुबंध नहीं कर रही है। बल्कि दिल्ली में वह इस प्रकार कोशिश कर रही है और अधिकारियों को भ्रमित करने में लगी हुई है की इस महंगे उद्योग के कारण उसे शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र के उद्योग में सासाकीय राजस्व से मुक्ति दी जाए… किंतु सवाल करोड़ों रुपए के राजस्व हानिका नहीं है बल्कि खनिज अनुबंध के तहत उन सभी स्थानीय निवासियों की सुरक्षा का भी है जो संविधान की पांचवी अनुसूची में उत्खनन के लिए भूमि अधिग्रहण उत्पादन करते हुए अथवा उत्पादन परिवहन से स्थानीय लोगों को, इस क्षेत्र की पर्यावरण और परिस्थितिकी को सुरक्षित व सुनिश्चित करते हुए कार्य करने की संविधान में दी गई गारंटी का पालन करने की है… तो इस मामले में भी बीते 15 साल से रिलायंस इंडस्ट्रीज संविधान को अपने जूती की नोक में रखते हुए अवैध रूप से गैस का उत्खनन कर रही है.. ऐसा क्यों नहीं माना जाना चाहिए..?
लेकिन दोनों ही राजनीतिक पार्टियां इन दोनों उद्योगों पर संविधान का पालन कर पाने में अपनी कोई सोच पत्रकार वार्ता में प्रकट नहीं कर पा रही हैं..? ऐसा नहीं है कि इन दोनों नेताओं को ज्ञान नहीं है लेकिन वह जमीनी हकीकत को आम जनता पर संविधान की गारंटी सुनिश्चित करने पर कोई बात नहीं करना चाहती बल्कि “संविधान-संविधान” का भूल भुलैया वाला खेल इस तरह से भ्रमित करके खेलना चाहती हैं जैसा दिल्ली की राजनीति में संसद के अंदर संविधान की धज्जियां उड़ाई गई थी और यह खेल उतना ही गंदा तरीका से शहडोल में भी खेला जा रहा है.. इसमें कार्यपालिका का बहुत रोल दिखाई नहीं देता क्योंकि जब दो महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टियों के महत्वपूर्ण पदाधिकारी शहडोल में संविधान लागू होने पर कोई रुचि लेते दिखाई नहीं देते, उसे दबा कर रखना चाहते हैं उसे पर चर्चा भी नहीं करना चाहते हैं तो “आप बैल मुझे मार..” के तरीके में अधिकारी क्यों अपना दिमाग खराब करें ।
इस तरह 2025 के नए वर्ष में दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी दोनों ही “संविधान-संविधान” का खेल इस तरह खेल रही हैं संविधान एक फुटबॉल हो और दोनों पक्ष के खिलाड़ी संविधान को लात मार कर यहां से वहां ले जा रहे हैं… इससे ज्यादा नए वर्ष का दोनों राजनीतिक दलों का प्रेस कॉन्फ्रेंस कुछ भी नहीं है। ऐसा क्यों नहीं समझ जाना चाहिए….?
अन्यथा जब संविधान पर चर्चा होती है तब सबसे पहले उन राजनीतिक दलों में जिन नेताओं ने अथवा कार्यकर्ताओं ने आदिवासियों की जमीन पर अपने आशियाने खड़े किए हैं अथवा कॉलोनी या बनाकर बेच रहे हैं सबसे पहले पारदर्शी तरीके से उसे पर चर्चा होनी चाहिए कम से कम शेड्यूल नगर में दिखने वाले तालाबों को संविधान के दायरे में सुरक्षित रखना चाहिए कि संविधान ने अगर आदिवासियों और आदिवासी क्षेत्र को सुरक्षित और संरक्षित करने का संकल्प पारित किया है तो स्थानीय नेता उससे मुंह क्यों चुरा रहे हैं।
और अगर इन राजनीतिक दलों को सार्वजनिक व पारदर्शी तरीके से आदिवासियों की जमीन पर अथवा नदी नालों पर नेताओं की माफिया गिरी की जानकारी नहीं है तो यह भी एक प्रकार की उनकी अज्ञानता है अथवा जानबूझकर अज्ञानता का प्रमाण पत्र है इससे ज्यादा कुछ नहीं ऐसी स्थिति में संविधान का फुटबॉल किसका कितना लात खाएगा यह तो वक्त ही बताएगा आप भी और हम भी संविधान पर क्या मनोरंजन हो सकता है जरुर सोचते रहना चाहिए..

