
कुंभ-निष्कर्ष- 2
29 तारीख को आज सुबह ही 5:30 बजे मौनी अमावस के मुख्य पर्व की स्थिति जानने के लिए जब शहडोल में घर में टीवी खोला तो अनुमान के हिसाब से प्रशासनिक अराजकता के परिणाम देखने को मिले। मौनी अमावस में प्रशासन की वीआईपी कल्चर का संपूर्ण प्राथमिक सुरक्षा व्यवस्था समर्पित होने का परिणाम देखने को मिला। कहते हैं 2:00 बजे रात संगम में भगदड़ मच गई क्योंकि भीड़ को नियंत्रित करने की प्राथमिकता प्रशासन में थी ही नहीं।। भीड़ के आने और जाने का एक ही रास्ता था। परिणाम स्वरूप कुछ लोगों की अब तक मरने की खबर आई है और सैकड़ो की संख्या में घायल होने की खबर आ गई है।
. ………………….( त्रिलोकीनाथ )………………………
19 जनवरी को मैं प्रयागराज के अरैल क्षेत्र में रहा। अखिल भारतीय ब्राह्मण एकता परिषद के मुख्यालय, धर्मशाला और भगवान परशुराम की मूर्ति स्थापना का अवसर था। पूरे भारत से ब्राह्मण एकता परिषद के लोग आमंत्रित किए गए थे। ब्राह्मण संगठन के संस्थापक पूर्व पुलिस उपायुक्त पंडित जुगल किशोर तिवारी के संकल्प से इस मुख्यालय और धर्मशाला तथा मंदिर का स्थापना हुआ। स्वाभाविक है कथित तौर पर144 साल बाद पड़ने वाले प्रयागराज के कुंभ का हमें भी लाभ मिला। मेरे साथ शहडोल के साथी आदरणीय विप्र गण राम प्रसाद तिवारी, राम मिलन शर्मा, देवदत्त मिश्रा संदीप तिवारी अशोक तिवारी भी शहडोल से पहुंचे थे।
हमें बताया गया संगम स्नान के लिए अरैल घाट जो मुश्किल से धर्मशाला से किलोमीटर है वहीं पर स्नान कर लिया जाए। पहुंचने पर पीपा पुल के जरिए वहां संगम घाट की तरफ आ जा रहे थे । हम भी चले गए, मेला क्षेत्र में आराम से त्रिवेणी संगम तक सुबह 8:00 पहुंच गए और कोई शौक से फिर पैदल ही पीपा पुल पार करके त्रिवेणी संगम स्नान भी किया। सब कुछ ठीक-ठाक लग रहा था। किंतु लौटते में हमें 10:00 बजे धर्मशाला पहुंचना था किंतु किसी वीआईपी शायद रक्षा मंत्री का और मुख्यमंत्री का का आगमन होना था, अतः सब व्यवस्था चरमरा गई। हमें नैनी की तरफ मोड़ दिया गया और नैनी से धर्मशाला अप्रैल तक पहुंचने में कई जगह पुलिस ने रोक लगा दी। कहा कि वीआईपी पास नहीं है तो नहीं जाने देंगे। जगह-जगह जाम लगे थे और इस तरह हम करीब 12:00 के बाद धर्मशाला पहुंच पाए। भीड़ उतनी नहीं थी। यह 19 तारीख की व्यवस्था थी।
29 तारीख को आज सुबह ही 5:30 बजे मौनी अमावस के मुख्य पर्व की स्थिति जानने के लिए जब शहडोल में घर में टीवी खोला तो अनुमान के हिसाब से प्रशासनिक अराजकता के परिणाम देखने को मिले। मौनी अमावस में प्रशासन की वीआईपी कल्चर का संपूर्ण प्राथमिक सुरक्षा व्यवस्था समर्पित होने का परिणाम देखने को मिला। कहते हैं 2:00 बजे रात संगम में भगदड़ मच गई क्योंकि भीड़ को नियंत्रित करने की प्राथमिकता प्रशासन में थी ही नहीं।। भीड़ के आने और जाने का एक ही रास्ता था। परिणाम स्वरूप कुछ लोगों की अब तक मरने की खबर आई है और सैकड़ो की संख्या में घायल होने की खबर आ गई है।
कह सकते हैं कि जब कुछ लाख या कुछ हजार आदमी किसान आंदोलन में सालों दिल्ली की सीमा पर बैठे थे और एक-एक करके करीब 700 किसान मर गए तब प्रशासन को फर्क नहीं पड़ा… तो जहां 10 करोड़ आदमियों के आने का प्रयागराज में संभावना प्रशासन की तरफ से जताई जा रही थी तो 10 लोगों के मर जाने की स्वाभाविक गुंजाइश बन ही जाती है… लेकिन यह तय है कि इस धार्मिक भीड़ अथवा भेड़ चाल में वी आई पी एक भी नहीं मरा होगा….।क्योंकि उत्तर प्रदेश की संपूर्ण व्यवस्था वीआईपी लोगों के लिए प्राथमिक रूप से आरक्षित रही।कहने के लिए इसी भाजपा सरकार में वीआईपी कल्चर को कानूनन बंद कर दिया गया है किंतु वह कानून दिखाने का दांत था खाने का दांत का उपयोग हाथी करता ही है तो खाने के दांत प्रयागराज में प्रशासनिक हाथी के धड़ाधड़ चल रहे थे।
दुर्भाग्य वस इस वीआईपी संस्कृति की समर्पण का भाव कथित रूप से तमाम अखाड़े के प्रमुख लोग भी वंदना अर्चना करते देखे गए। त्रिवेणी संगम में गंगा की कसम खाते हुए देखे गए।
ऐसे में स्वाभाविक है भगवान भरोसे आम आदमियों के पूरे दुनिया के लोगों की सुरक्षा टिकी हुई थी। क्योंकि पूरी दुनिया से आदमी अमावस के पुण्य स्नान के लिए प्रयागराज पहुंचा हुआ है।
कह सकते हैं कि जब शहडोल में राष्ट्रपति महामहिम द्रोपति मुर्मू को उतार कर गुजरात के आदिवासियों के वोट बैंक को प्रभावित करने के लिए दूसरी बार अनुसूचित जनजाति के पेसा एक्ट को राष्ट्रपति से लागू करने की घोषणा करवाई जा सकती है, तो दिल्ली विधानसभा के प्रतिष्ठित चुनाव के लिए संपूर्ण प्राथमिकता प्रयागराज के विश्व व्यापी कुंभ की भीड़ को दिखाकर तथा कथित सनातन धर्म के प्रति समर्पण दिखाकर वोट बैंक को प्रभावित क्यों नहीं किया जा सकता…?
तो प्रयागराज से बैठकर शासन और प्रशासन दिल्ली की सल्तनत को लूटना चाहता था ऐसा क्यों नहीं कहा जाना चाहिए…? और इस लूट के युद्ध में यदि कुछ आम आदमी बलिदान हो जाते हैं… कुछ घायल हो जाते हैं.. तो यह तथाकथित सनातन धर्म का शहीदों की श्रेणी में जाने की श्रृंखला ही हिंदुत्व की पहचान के रूप में क्यों नहीं देखी जानी चाहिए ।
अभी इसकी घोषणा बाकी है इस पर राय मशविरा निश्चित रूप से चल रहा होगा क्योंकि “आपदा में भी अवसर” देखने वाली हमारी शासन प्रणाली को धार्मिक आस्था के कुंभ में आपदा का अवसर मिल गया है… आम आदमी की भीड़ और उसकी भेड़ चाल से यह भी एक निष्कर्ष कुंभ से निकलता है अब इसे सकारात्मक देखना अथवा नकारात्मक देखना राजनीति के और दिल्ली के चुनाव के नजर से कितना सफल या असफल होगा यह तो 5 फरवरी को दिल्ली का चुनाव बताया जाएगा।
लेकिन इस बीच अत्यंत सुखद प्रयास भारत के संत समाज की तरफ से दिखा है वहां पर इस हादसे से प्रभावित और आहत तथा आम भारतीयों की आस्था के कुंभ की सुरक्षा को देखते हुए संत समाज के 13 अखाड़े ने इस 144 साल के पड़ने वाले महाकुंभ के अमृत महोत्सव में स्नान का भाग लेने की प्रक्रिया को रद्द कर दिया है ताकि भीड़ की भेड़चाल के चलते अन्य भारतीयों की हत्याओं को रोका जा सके यह अलग बात है यह भी खबर स्पष्ट रूप से आई कि इस बीच में प्रशासन 13 अखाड़े के संत समाज से गिडगाड़ते हुए देखा गया कि वह स्नान करें। किंतु 13 अखाड़े ने अपने तीसरे पर्व स्नान अमृत स्नान के लिए उन्होंने बसंत पंचमी के दिन को चुन लिया है।
यह भारत का संत समाज ही कर सकता था यह बड़ा त्याग और बलिदान उनके जीवन काल का ऐतिहासिक निर्णय कहा जाना चाहिए जब संपूर्ण जीवन इसी महाकुंभ के लिए इसी महा स्नान के लिए लक्षगत हो तब लक्ष्य को त्याग देना जनहित में साधु हृदय की ही पहचान हो सकती है।
बहरहाल कह सकते हैं कि अगर आप अब उत्तर प्रदेश की शासन और प्रशासन के भरोसे तो किसी भी हालत में प्रयागराज के कुंभ स्नान के लिए ना जाएं इसलिए अपनी सुरक्षा अपनी प्राथमिकता अपने लोगों के हिसाब से ही कुंभ स्नान के लिए जाएं… बेहतर यह है की कोई पारिवारिक एक व्यक्ति कुंभ के लिए जाए वहां से कुंभ जल भरकर लावे और अपने सभी परिवार के लोगों को कुंभ स्नान हेतु घर में लाकर थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें । यही वर्तमान प्रशासनिक आपदा का निराकरण हो सकता है अन्यथा पूरा परिवार संकट में आ सकता है । क्योंकि कुंभ को कॉमर्सलाइजेशन कर दिया गया है व्यवसायीकरण कर दिया गया है, राजनीतिज्ञ ने राजनीति के लिए और मुनाफाखोरों ने धंधे के लिए । अन्यथा जहां कुंभ स्नान के लिए मुफ्त में सेवा और त्याग तथा समर्पण की भावना से दान का प्रतिफल होता है वहां पर अलग-अलग से व्यवसाय करके कम से कम₹10,000 से लेकर डेढ़ लाख रुपए तक प्रतिदिन के कमरे बनाकर यात्रियों को लूटा जा रहा है। यह उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की सबसे बड़ी विफलता है। क्योंकि यदि एक संत समाज का प्रतिनिधि ही मुख्यमंत्री के पद में बैठा हो और वह कुंभ के दर्द को उसके सुख को इसकी संभावना को आम आदमियों के लिए निराकृत ना कर सके तो प्रशासन और शासन कोई साधु समाज नहीं होता है, इसमें कोई शक नहीं करना चाहिए। तो इस बार के प्रयागराज के कुंभ की यात्रा के लिए “यात्री अपने सामान की सुरक्षा के लिए स्वयं जिम्मेदार है” ऐसा समझ कर प्रयागराज की यात्रा करें। शुभम मंगलम।

