कुंभ निष्कर्ष 25: सत्य ,न्याय और धर्म की ड्रीम-गर्ल तान्या मित्तल ने, ड्रीम-गर्ल हेमा को पीछे छोड़ा…. (त्रिलोकीनाथ)

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   तान्या प्रयागराज तीर्थ के महाकुंभ में सत्य न्याय धर्म के आधार पर एक स्वप्न सुंदरी (ड्रीम-गर्ल) की तरह चमकते सितारे की तरह आई यह अलग बात है कि अब सत्ता की राजनीति उसे कितने धुंध में फेंक देती है यह भविष्य बताएगा किंतु जब भी वह है अपना चेहरा आईने में देखेंगी उन्हें सर झुका कर आईने से बात नहीं करना होगा.. इतना तो तय है हर युवा के लिए वह एक आदर्श धड़कन धड़कन सामने आई. अगर मुझे अवसर मिलता तो मैं तान्या के साथ अवश्य सेल्फी लेता, क्योंकि वह कुंभ में सत्य की सरकार झलक थी। और हम कुंभ में सत्य की खोज में ही जाते हैं इसमें कोई शक नहीं।.                                        (त्रिलोकीनाथ)

तो कभी ड्रीम-गर्ल रही सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी अब जमकर गाल बजा रही है उन्हें शायद अभी भी इस बात का एहसास है की शोले की बसंती जो भी बोलेगी वही एकमात्र सत्य चरित्र होगा शोले फिल्म के दौरान निश्चित रूप से फिल्म स्टार्स के शोले आम आदमियों के दिल में धड़कते थे इसीलिए तब के नेता ने जब पहली बार बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी की गाल की तरह बनाने का वादा किया तो बवाल उठ गया था वह महिला होने के अर्थ पर प्रश्न चिन्ह खड़े करने लगा था लेकिन राजनीति के बड़े कलाकार लालू यादव ने जब अपने कला से हेमा मालिनी की गाल का बखान किया तब वह सहज और स्वाभाविक लगा था। उसके बाद संसद में गाली-गलौज करने वाला रमेश बिधूड़ी दिल्ली के मुख्यमंत्री अतिसी सिंह के गाल पर अपनी चर्चा किया तो निंदा का शिकार हुआ.. उसे बैक फुट में आना पड़ा क्योंकि वास्तव में उसकी मंसा बवाल पैदा करना था जो निंदा का कारण भी बना।

किंतु जब ड्रीमगर्ल प्रयागराज में कई जगह सैकड़ो लोगों की भगदड़ और मौत के बाद तथाकथित वीआईपी प्रतिबंधित क्षेत्र में भगवा वस्त्र पहन करके महाकुंभ में वीआईपी डुबकी लगती हैं। और फिर कुछ घंटे बाद भारत के संविधान के पवित्र मंदिर में खड़े होकर अपना गाल बजाती हैं कि कहीं कोई भगदड़ नहीं हुई तो वह साबित करती हैं कि उनके गाल अब नकली हैं।  इसलिए उनके गाल बजाने की प्रक्रिया में उतना वजन नहीं रहा और वह साबित यह भी करती हैं कि वह एक चरित्र नायिका है सांसद हो जाने से कोई सच बोलने का ठेकेदार नहीं हो जाता है। अब तो समय यह है कि भगवा वस्त्र पहनकर साधु समाज इस महाकुंभ के मेले में सच बोलने की औकात नहीं रखता और जो कोई सच बोलना भी चाहता है तो उसे सरेआम अपमानित करने का किन्नर-मीडिया, ठेका ले लेता है। क्योंकि इस कथित 144 साल बाद आए कुंभ में अजीब प्रकार का लोकतंत्र निकला है जिसमें एक महा-वीआईपी, एक वी-वीआईपी एक वीआईपी तथा इनका गुणगान करने वाला किन्नर-मीडिया प्रगट दिखता है। वर्तमान राजनीति का यही सच है।

     सब कुछ पारदर्शी है कहीं कुछ छुपाने लायक नहीं है कि प्रयागराज के महाकुंभ में अमावस के वक्त कई घटनाएं घटी सब प्रमाणित है इसके बावजूद सुंयोजित तरीके से साधु का नकाब पहनकर गोरखनाथ का महंत योगी पारदर्शी झूठ बोले की 30 लोग मरे हैं और 90 लोग घायल हुए हैं शायद उन्हें इतना ही सच बोलने का 17 घंटे चली मीटिंग का निर्देश था। इससे इस महंत और योगी का पद उन्होंने समाप्त कर लिया है अब वह मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के रूप में दिखने लगे हैं क्योंकि उनकको यह गलतफहमी है की भगवा वस्त्र उनकी अपवित्रता झूठ को छुपा देगा अगर वह संत के नकाब में नहीं होते तो आम भारतीय को उतना दर्द या दुख नहीं होता क्योंकि राजनेता अक्सर हत्याओं की राजनीति ही करते रहे हैं। लाशों पर अपने सपनों को बुनते रहे हैं। और यह कोई नई बात नहीं है लेकिन भगवद मार्ग सत्य के मार्ग की शपथ लेकर भगवा चोला पहनकर जिस प्रकार से किन्नर अखाड़ा ने किसी किन्नर को नहीं एक महिला को महामंडलेश्वर बनाया और उसे बाद में खारिज कर दिया गया इस तरह से गलत बयानी के लिए कम से कम महंत गोरखनाथ की गद्दी को योगी आदित्यनाथ ने हमेशा के लिए दागदार कर ही दिया है। कि ऐसा गाड़ी धारी भी अपने लक्ष्य के लिए झूठ बोलने में जरा भी शर्म महसूस नहीं करते।
अगर वह सच बोलते और इस्तीफा दे दिए होते तो भगवद प्राप्ति निश्चित तौर पर उनका स्वागत करती। कम से कम उसके दरवाजे उन्होंने बंद कर दिए हैं, सच न बोलकर के।तो बात चल रही थीरही बात ड्रीम गर्ल की, तो उनका पेसा ही है अपने लाभ के लिए चरित्र नायिका का रोल अदा करना। चाहे वह शोले की बसंती हो, फिल्म की मीरा हो या फिर भारतीय संसद की सांसद हो हर जगह सामान्य व्यक्ति की तरह प्रिय-हित-लाभ को प्राथमिकता देकर उनका निर्णय लेना सिर्फ परंपरा का निर्वहन मात्र है। अगर जिम्मेदार भारतीय नागरिक की तरह उम्र दराज अनुभवी व्यक्ति होने के नाते वह सत्य न्याय और धर्म की तराजू में गंगा के तट पर कुछ भी बोलते तो उनका सम्मान शायद बढ़ जाता ।
कह सकते हैं उन्होंने अपने डायरेक्टर के निर्देश पर महाकुंभ में संन्यास की उम्र में भी सिर्फ लोकप्रिय किसी फिल्म की सफलता के लिए ही गाल बजाएं। इस तरह हेमा मालिनी होने का हक हो चुकी है जो अधिकार हक के लिए अमिताभ बच्चन ने राजनीति से अलविदा कर स्वयं को सुरक्षित कर लिया था। क्योंकि अमिताभ समय रहते समझ गए थे की राजनीति काजल की कोठरी है काला दाग लगा ही लगा है इसलिए उन्होंने जल्द से अपने को अलग कर लिया।
इसी बीच इसी कुंभ में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का कथित तौर पर प्रचार प्रसार का ठेका लेने वाली युवा इनफ्लुएंसर तान्या मित्तल ने गंगा, जमुना और सरस्वती के संगम में साक्षी होकर पूरी निर्भीकता के साथ युवा चरित्र को सामने रखते हुए बगावत के अंदाज में उन्होंने प्रयागराज झूंसी के मैदान में न सिर्फ सच बोल बल्कि मौका स्थल पर उस समय मर रहे घायल और तकलीफ की भगदड़ में लोगों के लिए खास तौर से बच्चों के लिए जो मदद की उससे वह आजादी के बाद की “झूंसी की रानी” कहलाने का हक प्राप्त कर ली हैं। और लाखों युवाओं की आइकन बन गई हैं। वह भी चाहती तो महाकुंभ में मरने वालों की लाशों को इन नेताओं और अभिनेताओं की तरह झूठ के शराब में घोलकर पी गई होती किंतु उसका जमीर जब जगा तो उन्होंने जमकर गाल बजाते हुए गुस्सा जाहिर किया।
कह सकते हैं तान्या मित्तल प्रयागराज कुंभ की ड्रीम-गर्ल है जो सत्य न्याय और धर्म के लिए बलिदानी होती देखी गई…. हो सकता है इससे उनका कैरियर संकट में आ जाए किंतु कैरियर तो इसी कुंभ में निकले आईआईटी अभय सिंह का भी बन गया था जो करियर को लात मार कर सुख की तलाश में संत समाज में संभावना देखने लगा था और कुंभ में वायरल हो गया था… किसे कहा चमकता है यह तो प्रारब्ध तय करता है…. स्वाभाविक है सत्य, न्याय और धर्म में ही सुख छुपा हुआ है क्षणिक लाभ के लिए महाकुंभ की लाशों को घोलकर पी जाना और गलत बयानी को सच साबित करने का कसम खा लेना बड़ी कायरता है… ऐसे में हम कह सकते हैं कि इस कुंभ निष्कर्ष में एक बीते कल की ड्रीम-गर्ल हेमा मालिनी डूब गई और एक नई ड्रीम-गर्ल तान्या मित्तल निकल कर आई… जो सत्य न्याय धर्म के पक्ष में खड़े होकर वास्तव में तीर्थ करती दिखी।
यह भविष्य प्रमाणित करेगा की वास्तव में महाकुंभ का सच क्या था लेकिन वर्तमान की सच्चाई को कुचल कर कोई भी सच-सच नहीं हो सकता चाहे उस पर कितनी भी राख क्यों ना डाल दी जाए। क्योंकि यह गंगा यमुना और सरस्वती के साक्षी होने का सच है। आखिर यह बात संत के नकाब में रह रहे मुख्यमंत्री आदित्य नाथ के समझ में क्यों नहीं आई, हमारा सनातन इतना डरा हुआ आखिर कैसे हो सकता है…? तो क्या यह सनातन नहीं है यही वर्तमान का बड़ा प्रश्न चिन्ह है….?

 


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