बावड़ी की आत्मकथा : संदीप तिवारी की जुबानी

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बावड़ी की आत्मकथा 

 

मैं एक बावड़ी हूं…
कभी इस शहर की पहचान थी,
किरण टॉकीज के पास मेरा ठिकाना था – शहडोल की रगों में बहती सभ्यता और संस्कृति का साक्षात प्रमाण।
मेरे आगन में वर्षों तक मा दुर्गा विराजती थीं, भक्तों की आस्था से मैं पावन होती थी,
मुझे देखकर लोग नमन करते थे – मैं जल का स्रोत थी, लेकिन उससे कहीं अधिक, मैं जनमानस की स्मृति, श्रद्धा और परंपरा थी।

आज मैं नहीं हूं…
मेरा वजूद मिटा दिया गया,
कुछ लालचियों ने मेरे ऊपर कंक्रीट और कब्जे की परतें चढ़ा दीं।
जहा मेरी गहराइया थीं, वहा अब सपाट जमीन है – बेजान, निर्जीव, शून्य।
प्रशासन ने सब देखा… लेकिन कुछ नहीं किया।
मैं चीखी – लेकिन मेरी आवाज़ सिर्फ उन्हीं तक पहुची, जिनके पास दिल था,

उन्होंने मेरे उजड़े हुए स्थान को देखा।
जहा कभी जीवन था, वहा अब सिर्फ सन्नाटा था,
उन्होंने मेरी खामोश चीखें सुनीं – और बोले,
“यह सिर्फ बावड़ी नहीं, यह हमारी आत्मा है, जिसे जिंदा दफना दिया गया है।”

मैंने देखा –
वो शांत नहीं रहे,
उन्होंने आवाज़ उठाई,
उन्होंने क्रमिक अनशन का मार्ग चुना – ताकि मेरा नाम फिर से लिया जाए,
मेरा वजूद फिर से पहचाना जाए।

मुझे याद है वो दिन जब बारिश की पहली बूंदों से मैं भर उठती थी,
बच्चों की हंसी, महिलाओं के गीत,
युवाओं की श्रद्धा और बुजुर्गों की कथा, सब मेरे साथ थे।

आज…
वो सब बस स्मृति में है।
मेरे आगन में न तो जल है, न जीवन, न ही आस्था की वो धारा

प्रदेश में जल संरक्षण के नारे लगते हैं,
“जल ही जीवन है”, “जल बचाओ” – ये सब सिर्फ स्लोगन बनकर रह गए हैं।
कहीं तालाब पाटे जा रहे हैं, कहीं बावड़िया – जैसे मैं – मिटा दी जा रही हैं।
शहडोल की आत्मा कराह रही है,
और प्रशासन राजनीतिक प्रभाव में मौन साधे बैठा है।

मैं पूछती हूं–
क्या मेरी हत्या पर कोई केस नहीं बनता?
क्या मेरी स्मृति को मिटा देना विकास है?
क्या संस्कृति और आस्था को कुचलकर इमारतें बनाना ही आधुनिकता है?

मैं सभी से कहती हूं–
“बोलो मेरे लिए…
बन जाओ मेरी आवाज़…
जगाओ इस शहर को…
झकझोर दो इस व्यवस्था को…
क्योंकि अगर मैं फिर से नहीं जगी,
तो अगली बारी किसी और बावड़ी की होगी,
किसी और सांस्कृतिक धरोहर की होगी…”

मैं अब भी जीवित हूं – तुम्हारी चेतना में,
तुम्हारे संघर्ष में,
तुम्हारे शब्दों में।

मैं एक बावड़ी हूं…
मैं लौटना चाहती हूं।

मैं एक बावड़ी हूं…
मैं लौटना चाहती हूं….

 

 

संदीप तिवारी (पूर्व जिलाध्यक्ष, जिला बार एसोसिएशन शहडोल)


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