बिंध्य को मिला गौरव;हैदराबाद में चल रही राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के चेयरपर्सन है विंध्य के सनत त्रिपाठी।

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आदिवासी क्षेत्रों में उपज को लेकर हुई चिंतन।

शहडोल। हैदराबाद में चल रही में राष्ट्रीय कार्यशाला डायमंड जुबली के रूप में हैदराबाद में 26से28 अप्रैल को आयोजित की गई। उसमें देश के विभिन्न संस्थाओं के कृषि वैज्ञानिक एवं अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने बढ़ती हुई आबादी एवं सीमित संसाधन और घटते हुए खेती योग्य भूमि को दृष्टिगत रखते हुए चावल अनुसंधान विशेष कर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए नए शोध की आवश्यकता पर बल दिया गया है। जिससे की पोषण की समस्या खासतौर से जिंक आयरन जैसी तत्वों का समावेश किस्मो में किया जाए जिससे कि स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़े।

वैज्ञानिकों का मंथन इस बात पर है कि उत्पादकता उत्पादन भी बढ़ाया सके वातावरण परिवर्तन को दृष्टिगत रखते हुए क्षेत्रीय स्तर पर वहां के जलवायु एवं भूमि के अनुरूप शोध किया जाए तथा ऐसी किस्में विकसित की जाए जो कम समय में पकड़ के अच्छी उत्पादकता के साथ कृषकों की मालिहलत को सुधारने में योगदान दें तथा बीमारी एवं कीड़ों की प्रति रोग रोधी हो ।
इस बात पर विशेष बल दिया गया है की 60% आबादी पूरे देश में चावल पर निर्भर है जिसमें ग्लाइसिन इंडेक्स जो एक बहुत महत्वपूर्ण कारक होता है उसे कम किया जाए ताकि डायबिटीज जैसी समस्याओं से भी निजात मिल सके ऐसी किस्में विकसित की जाए जो उच्च तापक्रम , सूखा के प्रति अवरोधी हो । कम पानी में वह अच्छा उत्पादन दे सके और कृषकों को आर्थिक लाभ मिल सके प्रमुख बीमारियां जिसे लिफ़ ब्लास्ट बैक्टीरिया लाइट सीथ लाइट फॉल्स स्मार्ट और कीड़े विशेष रूप से लीफ फोल्डर
और वीph जैसे महत्वपूर्ण नुकसान करने वाले कीड़ों की रोकथाम पर भी व्यापक चर्चा की गई ।
इस अवसर पर बिना क्षेत्र की रीवा कृषि विश्वविद्यालय के दिन डॉक्टर सनत त्रिपाठी जो की इस राष्ट्रीय गोष्ठी के चेयरपर्सन के रूप में गोष्ठी का नेतृत्व कर रहे हैं उन्होंने कहा राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पर स्तर पर विशेष शोध की आवश्यकता है जिससे जैविक संसाधनों का उपयोग करते हुए पर्यावरण संरक्षण संवर्धन की दिशा में काम हो सके और कम से कम रसायनों का प्रयोग हो जिससे कि हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित हो जैविक उत्पाद जैसे ट्राइकोडर्मा एवं peseudo मानस तथा जैसे सूक्ष्मजीवों का प्रयोग अधिक से अधिक रोगों की एवं कीटों के निदान के लिए किया जाए तथा मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हेतु किया जाए जिससे की लंबी अवधि तक खेती की जा सके। कृष्ण की परंपरागत किस्म का संरक्षण संवर्धन किया जाए और उसमें सुधार किया जाए ताकि क्षेत्रीय जलवायु में इसका उत्पादन बढ़ाया जा सके और कृष्णा को अंगीकरण करने में आसानी हो उच्च स्तरीय बैठक में भविष्य में आने वाली समस्याएं खास तौर से क्लाइमेट चेंज वर्ष कम वर्षा तापक्रम का परिवर्तन आदि विषयों पर व्यापक चर्चा हुई ।और कार्य योजना मध्य प्रदेश से जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर सनत त्रिपाठी अधिष्ठाता कृषि महाविद्यालय रीवा को पादप रोग विज्ञान विभाग सत्र में अध्यक्षता करने का अवसर मिला भारत के आए तमाम कृषि वैज्ञानिकों के साथ उन्होंने अपने अनुभव साझा किया तथा कहा उन्होंने पौधों में लगने वाले बीमारियों किस्म में रोग प्रति प्रतिरोधकता एवं रोग नियंत्रण के नए आयामों पर विस्तृत चर्चा की तथा कार्य योजना बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।


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