
सोशल मीडिया फेसबुक में आम पब्लिक की भाषा में नगर पालिका अध्यक्ष घनश्याम जायसवाल ने अपने विचार साझा क्या किया, नागरिकों ने उनकी हां में हां मिलाते हुए उन पर ही और पालिका परिषद पर हमला कर दिया है …मजे की बात तो यह है कि हमला करने वालों में उनकी पार्टी के जिला कांग्रेस अध्यक्ष रहे आजाद बहादुर सिंह ने भी अपनी गुस्सा उतार दिया तो लोगों ने क्या-क्या कहा यह अलग बात है की नगर पालिका परिषद के द्वारा ही शहडोल की तमाम तालाबों में अतिक्रमण को प्रोत्साहित किया जाता रहा कुछ महत्वपूर्ण मुख्य मार्गों के कीमती जमीन में परिषद के ही नेताओं में अतिक्रमण कर प्रधानमंत्री आवास बनवा दिया और उसे जमीन को बेचने की व्यवस्था भी करती है, नगर पालिका की हालत भ्रष्टाचार के मामले में कितनी पारदर्शी है कि मुख्य मार्ग राजेंद्र टॉकीज के पीछे राजेंद्र नगर कॉलोनी में 1963 में बनाई गई पहली टाउन प्लान की 30 फीट चौड़ी सड़क मार्ग में ही मिनांशु मस्ता नामक व्यक्ति के नाम पर भवन निर्माण की नक्शे को पास कर दिया गया. सब कुछ पारदर्शी हो, भ्रष्टाचार का बंटवारा पूरी ईमानदारी से हो.. इसलिए नगरपालिका में स्थापित एक ठेकेदार को इस भवन निर्माण पर ठेका भी दिला दिया गया। अब मामला प्रशासनिक अमला और न्यायालय के पास पहुंचने से स्पष्ट हो रहा है की नगर पालिका में स्थापित हो चुका माफिया दिमक की तरह सड़क मार्ग और तालाबों को खा रहा है और बंदरबांट ईमानदारी से हो रहा है।
यह अलग बात है कि नगर पालिका अध्यक्ष घनश्याम जायसवाल की गैर जानकारी में यह सब हो रहा है; इसीलिए उन्होंने कड़वी सच्चाई का बयान कर दिया.. तब जबकि शहर पहली बारिश में पानी पानी हो गया था। उनके साझा किए गए विचार में लोगों ने जबरदस्त प्रतिक्रिया दी है तो देखते हैं किसने क्या कहा…
जिला कांग्रेस अध्यक्ष रहे आजाद बहादुर सिंह कहते है इन सबको रोकने की जिम्मेदारी का अमला तो आपके अंदर ही है उसे सक्रिय करिए आपकी जिम्मेदारी बनती है आपके हाथों में पूरे शहर की बागडोर है उन जिम्मेदारियां को समझिए….. इस पर टिप्पड़ी कर इशहाक खान ने कहा बेचारे मजबूर है अविश्वास प्रस्ताव का समय आ रहा है फिर से सब को खुश करना पड़ेगा आगे कहते है मेरी बात बुरी लगे तो माफ़ करना ,बोलता बहुत सही हु ,इसलिए बहुत बदनाम हू या बहुत मशहूर हु,…बड़ी उम्मीद थी आपसे चार बार के पार्षद थे आपको सब जानकारी होते हुवे भी ,समझ के परे ये सीट ही खराब है शायद…..
- चन्द्रसेखरअग्रवाल लिखते है “शहर की जिम्मेदारी आपके पास है आप ही दिशा देने के प्रयास करें और व्यवस्था भी आपके पास है। यदि तरीके से नियम बन जाए तो नालियों में कचरा नहीं भरेगा और ऐसे पानी के बहाव को रोका नहीं जा सकेगा । यदि सुझाव दिया जाए तो कुछ तरीके अपने चाहिए। शहर की पूरी नालियों को ऊपर से सुरक्षित तरीके से बंद किया जाए और जहां से पानी सड़क से या घरों से नाली में प्रवेश करता है वहां जालियां लगाई जाए और इन जालियों की साफ सफाई प्रतिदिन की जाए ताकि जालियों से कचरा हटे और पानी निकले।”इस पर टिप्पड़ी कर के के केजरीवाल ने कहा will power chaiye,kisi me nahi he..
क्रिस्टी अब्राहम का कहना है नगर पालिका परिषद शहडोल मैं जंगल राज ? बिना किसी डर और भय के बाहुबलियों ने अतिक्रमण कर नाली में भवन निर्माण किये। नगर पालिका की हिम्मत नहीं हो रही है कि उसे कैसे ध्वस्त किया जाए, कैसे तुड़वाया जाए। सुत्रो की माने तो नगर पालिका में पदस्थ कुछ अधिकारी, कर्मचारी के द्वारा पैसो की लेनदेन किये जिससे उक्त भवन का निर्माण हुआ, नगर पालिका अधिकारी को सब कुछ पता होने के उपरांत भी कार्यवाही नही ? यह मामला मुख्य मार्ग रेलवे स्टेशन से लगन पैलस और जलसा पैलेस के मध्य का है। संपूर्ण नाली पर भवन निर्माण किया गया रोड सकरी हो गई, किसी भी दिन किसी भी समय बड़ी दुर्घटना घट सकती है, परंतु नगर पालिका परिषद को इसकी परवाह नहीं ? आखिर शहडोल नगर पालिका मे वो कौन है अधिकारी व कर्मचारी है जिसके शह पर ऐसा हो रहा है ?
एस डी पाठक का कहना है, शुरुआत अपने निज निवास वार्ड नंबर 5 से करें, अंसारी कालोनी से पाली रोड तक णा रोड है ना नाली आपकी धर्मपत्नी आदरनीय भाभी जी जहाँ की पार्षद हैँ वहां पर ना रोड बची है ना नाली और गंदगी का अम्बार है!
राजकुमार यादव कहते है नगर की स्वच्छता और विभिन्न आपदाओं से बचाव हेतु संयुक्त प्रयास किया जाना चाहिए, जिसमें आम आदमी और जनप्रतिनिधियों का भी संयुक्त प्रयास वर्ष भर हो जिससे ऐसी आपदाओं से बचाव किया जा सकता है। अन्यथा ऐसी ही नकारात्मकता सबके भीतर बनी रहेगी तो शहडोल नगर, उत्तराखंड भी बन सकता है। उपरोक्त पंक्तियों का तात्पर्य है कि जन समुदाय को भी स्वच्छता एवं भौगोलिक संरचनाओं में अपना योगदान देने की आवश्यकता है।
मोहसिन खान का सवाल है: जब हर कोई सिर्फ अपना सोच रहा है, तो नगर का भला कौन करेगा? जब नाले बंद हैं, जब तलब खत्म हैं, जब निकासी के लिए रास्ता नहीं — तो बरसात का पानी आखिर जाए तो जाए कहां से?

