उपराष्ट्रपति का इस्तीफा:एक और किसान पुत्र का सत्ता मोह से मुक्ति (त्रिलोकीनाथ)

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इस्तीफा देने के लिए उन्होंने, उनसे कहा था.. कि 75 साल हो रहे हैं इस्तीफा देना चाहिए… लेकिन इन्होंने पता नहीं क्यों अपनी आत्मा की आवाज को जगह दी और इस्तीफा दे दिया। अब वे सब कह रहे हैं की इस्तीफा उन्होंने आत्मा की आवाज में नहीं बल्कि राजनीति में दबाव की वजह से दिया है…। अब बात कुछ भी हो किसने, किसी से, क्या कहा… किसके दवाब में इस्तीफा दिया गया…? लेकिन सच्चाई उनकी इस्तीफा के लिखे शब्दों में छुपी हुई है… जिसमें कहा गया स्वास्थ्य और चिकित्सी सलाहकार इस्तीफा दिया गया।, तो क्या भारत की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी गई गुजरी हो चुकी है कि वह अपने उपराष्ट्रपति के स्वास्थ्य को सुरक्षित नहीं रह सकती….?

स्पष्ट है भारत इतना कमजोर नहीं किया जा सकता..। तो किसने और किसके दबाव में उपराष्ट्रपति में इस्तीफा दे दिया यह उन रहस्यों में हमेशा के लिए तब तक जुड़ जाएगा जो लाल बहादुर शास्त्री, सीडीएस रावत जैसे लोगों के मृत्यु से जुड़ी कथानक का हिस्सा रहेगा, तब तक, जब तक कोई पारदर्शी और ईमानदार जांच प्रक्रिया आम आदमी को यह न बता सकने की क्षमता न रखती हो…। वर्तमान की सच्चाई उतनी ही झूठी है जितनी ट्रंप की मध्यस्थता की बात झूठी है या फिर वही संपूर्ण सच है…. जितनी उपराष्ट्रपति की इस्तीफा के पीछे का अर्ध सत्य है… हां, हमें यह चिंतन करते रहना चाहिए क्योंकि सबसे ज्यादा फर्क आदिवासी क्षेत्र को ही पढ़ने वाला है                            ( त्रिलोकी नाथ)

भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को लिखे पत्र में उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी कारणों और चिकित्सा सलाह का हवाला दिया है.इसी पत्र में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 67(ए) के आधार पर अपने इस्तीफ़े की घोषणा की है. उप राष्ट्रपति ने इस पत्र को अपने सोशल मीडिया एक्स पर भी शेयर किया है.राष्ट्रपति मुर्मु को पत्र में जगदीप धनखड़ ने लिखा, ‘स्वास्थ्य की प्राथमिकता और चिकित्सकीय सलाह का पालन करते हुए, मैं भारत के उपराष्ट्रपति पद से तत्काल प्रभाव से त्यागपत्र दे रहा हूं.’इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रपति को उनके सहयोग और सौहार्दपूर्ण संबंधों के लिए धन्यवाद दिया और प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद को भी उनके सहयोग और मार्गदर्शन के लिए आभार व्यक्त किया.जगदीप धनखड़ ने अपने त्यागपत्र में लिखा, ‘मुझे संसद के सभी माननीय सदस्यों से जो स्नेह, विश्वास और सम्मान मिला, वह जीवनभर मेरे हृदय में बना रहेगा.’

जगदीप धनखड़: उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा, कारण और उनके जीवन का विश्लेषण

जगदीप धनखड़, भारत के 14वें उपराष्ट्रपति और एक प्रमुख राजनेता, ने 21 जुलाई 2025 को स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस निर्णय ने व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। एक साधारण किसान परिवार से निकलकर देश के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने वाले धनखड़ की यह यात्रा साथ ही, यह भी विचार किया जाएगा कि क्या उनकी ईमानदारी उनके लिए चुनौती बनी या उनके द्वारा दिए गए कारण पूरी तरह से तर्कसंगत हैं।
जगदीप धनखड़ का जन्म 18 मई 1951 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के किठाना गांव में एक साधारण जाट परिवार में हुआ  धनखड़ की प्रारंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल, चित्तौड़गढ़ में हुई, और उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक और फिर एलएलबी की डिग्री हासिल की। वकालत के क्षेत्र में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान उच्च न्यायालय में अपनी पहचान बनाई, और 1990 में उन्हें राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा दिया गया।
एक किसान पुत्र के रूप में, धनखड़ ने अपनी मेहनत और लगन से न केवल वकालत में बल्कि राजनीति में भी अपनी जगह बनाई।
उपराष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल 11 अगस्त 2022 को भारत के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के रूप में शपथ ली।इससे पहले, वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल (2019-2022) और केंद्र में चंद्रशेखर सरकार में संसदीय कार्य राज्य मंत्री (1990-1991) रह चुके थे। उपराष्ट्रपति के रूप में, उन्होंने संसद की गरिमा और मर्यादा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके कार्यकाल के दौरान, धनखड़ ने कई बार न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच संतुलन के मुद्दों पर अपनी राय रखी। विशेष रूप से, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों पर सहमति देने के लिए समयसीमा तय की गई थी। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 142 को “लोकतांत्रिक शक्तियों के खिलाफ परमाणु मिसाइल” करार दिया, जिससे उनकी टिप्पणियों पर व्यापक बहस छिड़ गई। यह बयान उनकी स्पष्टवादिता और संवैधानिक सिद्धांतों के प्रति उनके दृढ़ रुख को दर्शाता है।
इस्तीफे के कारण: स्वास्थ्य या कुछ और?धनखड़ ने अपने इस्तीफे में स्वास्थ्य कारणों को प्रमुखता दी, जिसमें उन्होंने लिखा, “स्वास्थ्य सेवा को प्राथमिकता देने और चिकित्सीय सलाह का पालन करने के लिए, मैं संविधान के अनुच्छेद 67(A) के अनुसार, तत्काल प्रभाव से भारत के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देता हूं।” हालांकि, इस कारण ने कई सवाल खड़े किए हैं। कुछ लोग मानते हैं कि स्वास्थ्य कारण केवल एक बहाना हो सकता है, और इसके पीछे अन्य राजनीतिक या व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं। हालांकि, उनके कार्यकाल के दौरान उनकी सक्रियता और सार्वजनिक उपस्थिति में कोई कमी नहीं दिखाई दी थी। यह सवाल उठता है कि क्या स्वास्थ्य कारण वास्तव में इतना गंभीर था कि तत्काल इस्तीफा देना जरूरी हो गया।
संवैधानिक गरिमा और दबाव: धनखड़ ने हमेशा संवैधानिक मर्यादा और संस्थाओं के बीच संतुलन की वकालत की। उनकी टिप्पणियां, विशेष रूप से न्यायपालिका के खिलाफ, कुछ हलकों में अस्वीकार्य मानी गईं। यह संभव है कि इन टिप्पणियों ने उनके लिए राजनीतिक और सामाजिक दबाव बढ़ाया हो, जिसके चलते उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया।जगदीप धनखड़ को उनकी स्पष्टवादिता और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा के लिए जाना जाता है।एक किसान पुत्र के रूप में, उन्होंने अपनी ईमानदारी और मेहनत से अपनी पहचान बनाई।

न्यायपालिका पर टिप्पणी:धनखड़ की सुप्रीम कोर्ट और अनुच्छेद 142 पर टिप्पणियों ने उन्हें विवादों में ला दिया। विपक्षी नेताओं, जैसे कांग्रेस की सुप्रिया श्रीनेत और डीएमके के तिरुचि शिवा, ने उनकी टिप्पणियों को “अनैतिक” करार दिया। उनकी यह स्पष्टवादिता उनकी ईमानदारी का प्रतीक थी, लेकिन इसने उन्हें राजनीतिक रूप से अलग-थलग भी किया।उपराष्ट्रपति के रूप में निष्पक्षता: कुछ आलोचकों का मानना है कि धनखड़ ने उपराष्ट्रपति के रूप में पूरी तरह निष्पक्षता नहीं दिखाई, और उनकी टिप्पणियां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पक्ष में थीं। हालांकि, उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने संवैधानिक मर्यादा को सर्वोच्च रखा और किसी भी दबाव के आगे नहीं झुके।
क्या उपराष्ट्रपति पद में रहते हुए समस्याओं का समाधान आसान था?धनखड़ ने अपने इस्तीफे में स्वास्थ्य को कारण बताया, लेकिन यह विचारणीय है कि उपराष्ट्रपति के रूप में उनके पास कई संसाधन और सुविधाएं थीं, जो उनकी स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान कर सकती थीं। उपराष्ट्रपति के रूप में, उनके पास उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं, सहयोगी स्टाफ और कार्यभार को संतुलित करने की क्षमता थी। इसके बावजूद, तत्काल इस्तीफा देने का उनका निर्णय यह संकेत देता है कि स्वास्थ्य के अलावा अन्य कारक भी हो सकते हैं।

जस्टिस यशवंत वर्मा पर बयान
क्या कहा: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जस्टिस यशवंत वर्मा के निवास पर 14-15 मार्च 2025 की रात को कथित तौर पर जले हुए नोटों के बंडल मिलने की घटना का उल्लेख किया। उन्होंने इस मामले में सात दिन तक जानकारी दबाए रखने और एफआईआर दर्ज न होने पर सवाल उठाए। धनखड़ ने इसे न्यायपालिका की जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि यह घटना संवैधानिक संस्थानों में विश्वास को कमजोर करती है और न्यायाधीशों को कानून से ऊपर नहीं मानना चाहिए।न्यायपालिका की जवाबदेही: धनखड़ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के दुरुपयोग और न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका की शक्तियों में हस्तक्षेप पर चिंता जताई। जस्टिस वर्मा का मामला उठाकर उन्होंने न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दियासंवैधानिक संतुलन: धनखड़ का मानना है कि न्यायपालिका को ‘सुपर संसद’ की तरह काम नहीं करना चाहिए। जले नोटों की घटना का उल्लेख कर उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि सभी संस्थाओं को संवैधानिक सीमाओं में रहना चाहिए।
  किसानों के वादों पर बयान
क्या कहा: उपराष्ट्रपति धनखड़ ने दिसंबर 2024 में केंद्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (ICAR-CIRCOT) के शताब्दी समारोह में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से सवाल किया कि किसानों से किए गए वादे क्यों पूरे नहीं हुए। उन्होंने कहा, “कृषि मंत्री जी, एक-एक पल आपका भारी है। मेरा आपसे आग्रह है कि कृपया मुझे बताइए, क्या किसान से वादा किया गया था? किया गया वादा क्यों नहीं निभाया गया? वादा निभाने के लिए हम क्या कर रहे हैं?” उन्होंने यह भी कहा कि किसानों से तुरंत वार्ता होनी चाहिए और आंदोलन की स्थिति को बार-बार नहीं दोहराया जाना चाहिए। धनखड़ ने चिंता जताई कि जब भारत वैश्विक स्तर पर बुलंदी पर है, तब भी “मेरा किसान परेशान और पीड़ित क्यों है?”
क्यों कहा:
किसानों की समस्याएं: धनखड़ ने किसानों के चल रहे आंदोलनों, खासकर शंभू और खनौरी बॉर्डर पर, और सरकार द्वारा 9 दिसंबर 2021 को किए गए लिखित वादों (जैसे MSP पर कमेटी गठन) को लागू न करने पर चिंता जताई।राष्ट्रीय एकता: उन्होंने सरदार पटेल का उदाहरण देते हुए कहा कि किसानों की समस्याओं का समाधान राष्ट्रीय एकता के लिए जरूरी है। उनका मानना है कि किसान और सरकार के बीच दीवार नहीं बननी चाहिए।

 

 


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