
देश की आजादी के बाद तमाम भ्रष्टाचारों की उपस्थिति के बाद भी और भ्रष्टाचारियों की क्रांतिकारी विकास के बाद भी यह सुनने में कभी नहीं आया कि देश के किसी संसद में या किसी विधानसभा भवन में छत टूट पड़ी हो और उसके नीचे नेता मंत्री अफसर दब गए हो या कुछ मर गए लेकिन जब हम अंतरिक्ष में चले भी गए हैं मंगल में जाने की बात भी कर रहे हैं तब यह खबर बेहद खतरनाक भविष्य की ओर संकेत देती है कि हम किस विरोधाभास में भारत का विकास कर रहे हैं… भारत का भविष्य हमारे बच्चे होते हैं उसी में कोई प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति ,मंत्री, न्यायाधीश ,वैज्ञानिक ,पत्रकार आदि बनते हैं तो उनकी सुरक्षा के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता क्यों सुनिश्चित नहीं होती…? यह बड़ा प्रश्न एक स्थापित सत्य हो जाता है जब अच्छे खासे संसद भवन को पुराना कहकर नया संसद भवन बना दिया जाता है.. शहडोल में ही कई स्कूल आज भी खंडहर के रूप में एक स्मारक बताओ खड़े हैं वार्ड नंबर 5 का स्कूल, नंबर 3 का स्कूल या कई ऐसे भवन जैसे अर्बन बेसिक स्कूल जब तक किसी की हत्या न कर दें तब तक उनमें विकास की संभावना कैसे सुनिश्चित हो.. गई यह नियम बन गया है और यह भी अपवाद है की कोई स्टूडेंट दिलीप राज द्विवेदी जैसा किसी संकल्प से मॉडल बेसिक स्कूलों को एक नया रूप देने के बारे में सोचता है लेकिन कितने ऐसे लोग हैं फिलहाल झालावाड़ का स्कूल हमारी कड़वी सच्चाई है और हमारा वर्तमान भी…. प्रायश्चित कब होगा जब हर स्कूल के बच्चे को उचित मुआवजा उसके भविष्य की सुरक्षा दिव्यांग होने पर उसको आश्वासन का प्रमाण पत्र राजस्थान सरकार दे जनता अपने देवता का भजन भजनलाल जी पर ही रहे हैं .
——-(त्रिलोकी नाथ)—–
मप्र-राजस्थान सीमा पर झालावाड़ स्कूल हादसा: भ्रष्टाचार और लापरवाही की त्रासदी
25 जुलाई 2025 को राजस्थान के झालावाड़ जिले के पीपलोदी गांव में एक सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय की छत ढहने से हुए हृदयविदारक हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस हादसे में चार से पांच बच्चों की मौत हो गई, जबकि 17 से 30 बच्चे घायल हुए, जिनमें से कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। यह घटना न केवल एक त्रासदी है, बल्कि सरकारी स्कूलों की जर्जर स्थिति और प्रशासनिक लापरवाही का जीवंत प्रमाण है। यह सवाल उठता है कि आखिर क्यों आधुनिक तकनीक से बने भवन राख की तरह ढह रहे हैं, जबकि हजारों साल पहले बने राजा-महाराजाओं के किले आज भी अडिग खड़े हैं? इस हादसे के पीछे भ्रष्टाचार और लापरवाही की गहरी जड़ें हैं, जिन्हें समझना और उजागर करना आवश्यक है।
झालावाड़ के मनोहर थाना क्षेत्र के पीपलोदी गांव में सुबह करीब 8:30 बजे, जब बच्चे कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे, अचानक स्कूल की छत और दीवारें भरभराकर गिर गईं। इस हादसे में लगभग 19 से 60 बच्चों के मलबे में दबने की आशंका जताई गई। ग्रामीणों, शिक्षकों और स्थानीय पुलिस ने तुरंत बचाव कार्य शुरू किया, और जेसीबी मशीनों की मदद से बच्चों को मलबे से निकाला गया। घायल बच्चों को मनोहर थाना के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और झालावाड़ जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां कुछ की हालत गंभीर बनी हुई है। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने इस घटना पर दुख जताते हुए उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जांच से मृत बच्चों की जान वापस आएगी या भविष्य में ऐसे हादसों को रोका जा सकेगा?
स्कूल भवन की जर्जर हालत: एक पुरानी कहानी
प्रारंभिक जांच से पता चला कि पीपलोदी का यह स्कूल भवन काफी समय से जर्जर हालत में था। ग्रामीणों ने कई बार प्रशासन सेइसकी मरम्मत की मांग की थी, लेकिन उनकी मांगों को अनसुना कर दिया गया। यह समस्या केवल झालावाड़ तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई सरकारी स्कूलों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। उदाहरण के लिए, भोपाल के जहांगीरिया स्कूल, जहां कभी पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने पढ़ाई की थी, आज जर्जर हालत में है। इसी तरह, मध्य प्रदेश के सतना और मऊगंज के सीएम राइज स्कूलों में छतें टपक रही हैं, और प्लास्टर गिरने की घटनाएं आम हो गई हैं।
भ्रष्टाचार: जड़ में सड़ांध
इस हादसे के पीछे भ्रष्टाचार एक प्रमुख कारण है। सरकारी स्कूलों के निर्माण और रखरखाव के लिए हर साल भारी-भरकम बजट आवंटित किया जाता है, लेकिन यह पैसा अक्सर स्कूलों तक नहीं पहुंचता। ठेकेदार, अधिकारी और राजनेताओं की मिलीभगत से स्कूल भवनों का निर्माण घटिया सामग्री और निम्न गुणवत्ता के साथ किया जाता है। कई बार मरम्मत के नाम पर केवल कागजी कार्रवाई होती है, और धनराशि हड़प ली जाती है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने इस हादसे के लिए पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन यह आरोप-प्रत्यारोप का समय नहीं है। सवाल यह है कि वर्तमान सरकार ने सत्ता में आने के बाद स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए क्या ठोस कदम उठाए?इस हादसे ने कई सवाल खड़े किए हैं। स्कूलों की जर्जर हालत की शिकायतें बार-बार की गईं, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और स्थानीय अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से क्यों मुंह मोड़ते रहे? जब स्कूल प्रिंसिपल और शिक्षक जर्जर भवनों की शिकायत करते हैं, तो उनकी बातें उच्च अधिकारियों तक क्यों नहीं पहुंचतीं? और सबसे बड़ा सवाल, बच्चों की सुरक्षा से बड़ा क्या हो सकता है?
शहडोल-
आंदोलन के आज 113 दिन पूरे हुए। किरण टॉकीज शहडोल स्थित दुर्गा पूजा सामाजिक धार्मिक सरोकारों की शासकीय भूमि पर हुए अतिक्रमण के विरोध में निरंतर चल रहे आंदोलन का संध्या जागरण घर-घर दस्तक हस्ताक्षर अभियान के कारण बहुत ज्यादा विस्तार हुआ । आज अनशन में प्रतिष्ठित व्यवसाय प्रदीप साहू में अनशनकारी नौजवान अर्पित सिंह चंदेल सुशील सिंह बघेल को तिलक लगाकर माला पहनकर इंसान के संकल्प प्रतिज्ञा को दोहराया

