
वृंदावन धाम: आध्यात्मिकता के संकट और कॉरपोरेट छाया में बदलता स्वरूप
वृंदावन धाम,
भगवान श्री राधा-कृष्ण की लीलाओं का पवित्र केंद्र, जो कभी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक शांति के लिए जाना जाता था, आज रियल एस्टेट के कंक्रीट जंगल और कॉरपोरेट हितों के दबाव में अपनी सनातन पहचान खोता नजर आ रहा है। मथुरा-वृंदावन को एकीकृत कर मथुरा-वृंदावन नगर निगम बनाए जाने के बावजूद, विकास की आड़ में यह पवित्र धाम साम्राज्यवादी और विस्तारवादी व्यवस्था के शोषण का शिकार हो रहा है। बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर परियोजना और यमुना पार की जमीनों की आसमान छूती कीमतों ने वृंदावन की आध्यात्मिकता को बाजार में तब्दील कर दिया है, जिससे सनातन सुख और परंपरागत लोक व्यवहार कमजोर पड़ रहे हैं।
कॉरिडोर परियोजना: आध्यात्मिकता पर कॉरपोरेट की मार
वृंदावन के प्रसिद्ध ठाकुर बांके बिहारी मंदिर के आसपास प्रस्तावित कॉरिडोर परियोजना ने स्थानीय गोस्वामी समाज और भक्तों के बीच गहरे असंतोष को जन्म दिया है। इस परियोजना के तहत मंदिर के चारों ओर 5 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर कॉरिडोर का निर्माण किया जाना है, जिसके लिए सरकार ने पूरी योजना तैयार कर ली है। मथुरा के जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह के अनुसार, 275 प्रभावित परिवारों को मुआवजा, दुकान के बदले दुकान और मकान के बदले मकान या फ्लैट की सुविधा दी जाएगी। हालांकि, गोस्वामी समाज और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कॉरिडोर वृंदावन की ऐतिहासिक कुंज गलियों और आध्यात्मिक वातावरण को नष्ट कर देगा।गोस्वामी समाज, जो सदियों से बांके बिहारी जी की सेवा करता आ रहा है, ने इस परियोजना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उनका तर्क है कि कॉरिडोर न केवल उनकी परंपरागत सेवा व्यवस्था को प्रभावित करेगा, बल्कि मंदिर के प्रबंधन पर सरकारी हस्तक्षेप को बढ़ावा देगा। स्थानीय पुजारी और व्यापारी भी इस परियोजना को कॉरपोरेट हितों से प्रेरित मानते हैं, जो वृंदावन की आध्यात्मिक आत्मा को नुकसान पहुंचाएगा।
रियल एस्टेट और कॉरपोरेट बाजार का दबदबा
वृंदावन,
जो कभी अपनी हरियाली और शांत वातावरण के लिए जाना जाता था, अब रियल एस्टेट के विकास का केंद्र बन गया है। यमुना के किनारे प्राचीन मंदिरों और आश्रमों की जगह ऊंची-ऊंची इमारतें और कॉलोनियां उभर रही हैं। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) ने कई आवासीय और व्यावसायिक योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें छटीकरा मार्ग पर 183 एकड़ की विशाल योजना शामिल है। हालांकि, अवैध कॉलोनियों का निर्माण भी तेजी से हो रहा है, जिसके खिलाफ MVDA ने कार्रवाई की चेतावनी दी है।यमुना पार की जमीनों की कीमतें कॉरिडोर परियोजना की घोषणा के बाद से आसमान छू रही हैं। यह स्थिति कॉरपोरेट और रियल एस्टेट कंपनियों के लिए एक सुनहरा अवसर बन गई है, जो वृंदावन की भीड़ को बाजार के रूप में देख रही हैं। लेकिन इस विकास का लाभ स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों को नहीं मिल रहा। फुटपाथ पर रहने वाले भक्तों और गरीबों के लिए कोई विशेष सुविधा नहीं है, और उनकी स्थिति आज भी वैसी ही है, जैसी समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीज ने मुंबई के फुटपाथ निवासियों के लिए अपने संघर्ष में उजागर की थी।
सनातन परंपरा और गोस्वामी समाज की चुनौती
वृंदावन की सनातन परंपरा का आधार गोस्वामी समाज रहा है, जो बांके बिहारी मंदिर की सेवा और प्रबंधन को पीढ़ियों से संभालता आ रहा है। इस समाज का मानना है कि कॉरिडोर परियोजना उनकी परंपरागत सेवा और आध्यात्मिक व्यवस्था को कमजोर करेगी। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में गोस्वामी समाज ने सरकार के इरादों पर सवाल उठाए हैं, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के उपाध्यक्ष शैलजाकांत मिश्रा के प्रभाव को लेकर।वृंदावन के स्थानीय निवासियों और भक्तों का कहना है कि सरकार यदि सनातन परंपराओं के साथ समन्वय स्थापित कर गोस्वामी समाज को प्रबंधन में शामिल करती, तो वृंदावन की आध्यात्मिकता को संरक्षित करते हुए विकास संभव था। इसके बजाय, कॉरिडोर को स्मार्ट सिटी की अवधारणा और कॉरपोरेट हितों से जोड़ा जा रहा है, जिससे वृंदावन की मूल पहचान खतरे में पड़ रही है।
हेमामालिनी और कॉरिडोर का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’,सनातन सुख की खोज में चुनौतियां
मथुरा की सांसद और अभिनेत्री हेमामालिनी इस कॉरिडोर परियोजना को एक ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ के रूप में पेश करती रही हैं। उनके समर्थक इसे वृंदावन के विकास और वैश्विक पहचान का माध्यम मानते हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह परियोजना केवल चुनिंदा लोगों के लिए लाभकारी होगी, जबकि फुटपाथ पर रहने वाले भक्तों और गरीबों की स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा। अन्य शहरों में बने कॉरिडोर, जैसे काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, भीड़ प्रबंधन और सुविधाओं में सुधार लाने में असफल रहे हैं, और वृंदावन में भी यही स्थिति बनने का खतरा है।
वृंदावन धाम, जो सनातन आध्यात्मिक सुख का प्रतीक है, आज कॉरपोरेट हितों और रियल एस्टेट के दबाव में अपनी पहचान खो रहा है। बांके बिहारी कॉरिडोर परियोजना और यमुना पार की जमीनों की बढ़ती कीमतें न केवल आध्यात्मिकता को कमजोर कर रही हैं, बल्कि स्थानीय गोस्वामी समाज और भक्तों की परंपराओं को भी खतरे में डाल रही हैं। सुप्रीम कोर्ट में गोस्वामी समाज की याचिका इस मामले में निर्णायक साबित हो सकती है। क्या वृंदावन अपनी सनातन पहचान को बरकरार रख पाएगा, या यह कॉरपोरेट बाजार और वोटबैंक की राजनीति का शिकार हो जाएगा? यह सवाल समय के साथ जवाब मांगता है।

