स्वतंत्रता दिवस 2025: राजनीतिक अनुपस्थिति, मीडिया की भूमिका और वैचारिक संरक्षण का विश्लेषण-. (त्रिलोकी नाथ)

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  स्वतंत्रता दिवस 2025: राजनीतिक अनुपस्थिति, मीडिया की भूमिका और वैचारिक संरक्षण का विश्लेषण. (त्रिलोकी नाथ)

स्वतंत्रता दिवस का उत्सव भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं का प्रतीक है, जहां राष्ट्रपति भवन से लेकर लाल किले तक की प्राचीरें राष्ट्रीय एकता और आजादी की कहानियां गूंजती हैं। लेकिन 15 अगस्त 2025 को दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी की अनुपस्थिति ने एक नई बहस छेड़ दी है। यह घटना न केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण को उजागर करती है, बल्कि मीडिया, पत्रकारिता और वैचारिक संभावनाओं की रक्षा के मुद्दों को भी सामने लाती है। एक  पत्रकार के व्यक्तिगत अनुभव से शुरू होकर यह विश्लेषण राजनीतिक रणनीति, मीडिया की निष्पक्षता और राष्ट्रीय पर्वों के राजनीतिकरण पर केंद्रित है।
पत्रकारिता का बदलता चेहरा: विशेषाधिकार से भीड़ तक का सफर
शहडोल के गांधी स्टेडियम में स्वतंत्रता दिवस समारोह का जिक्र करते हुए, एक अनुभवी पत्रकार का अनुभव दर्शाता है कि कैसे राष्ट्रीय उत्सवों में मीडिया की भूमिका बदल गई है। पहले, जहां पत्रकारों को विशिष्ट स्थान मिलता था, वहां अब उन्हें सामान्य भीड़ में धकेल दिया जाता है। यह बदलाव भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार आने के बाद अधिक स्पष्ट हुआ, जैसा कि वर्णित है। इसका मतलब केवल सुविधा का अभाव नहीं, बल्कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता और उपयोगिता पर सवाल है। एक पत्रकार का काम समाचार संग्रह करना है, न कि भीड़ बढ़ाना या ताली बजाना। जब आयोजक पत्रकारों को ‘संभावनाओं की तलाश’ से वंचित कर देते हैं, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला है।
यह स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिबिंबित होती है। लाल किले जैसे आयोजनों में मीडिया की पहुंच अब सीमित हो गई है, जहां फोकस मेहमानों की उपस्थिति पर कम और सरकारी नैरेटिव पर अधिक है। टीवी चैनलों पर जनता या मेहमानों की अनुपस्थिति पर ध्यान नहीं दिया जाता, जो मीडिया की ‘गुलामी’ का प्रमाण दर्शाता है। जनसत्ता जैसे अखबारों में भी ऐसी घटनाओं को अंदरूनी पेजों पर दबा दिया जाता है, जिससे आम जनता तक सच्चाई पहुंचने में बाधा आती है। यह बदलाव न केवल पत्रकारों की गरिमा को प्रभावित करता है, बल्कि राष्ट्रीय पर्वों को राजनीतिक प्रचार का माध्यम बना देता है।
कांग्रेस की अनुपस्थिति: रणनीतिक तटस्थता या वैचारिक रक्षा?
कांग्रेस नेताओं की लाल किले से अनुपस्थिति का मुख्य कारण उपयोगकर्ता ने मोदी सरकार की संभावित ‘हेडलाइन चेंज’ रणनीति बताया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर मोदी द्वारा इसका महिमामंडन करने की आशंका व्यक्त की गई है। इससे आगे बढ़कर, नाथूराम गोडसे का जिक्र आने की संभावना भी जताई गई, जो गांधी हत्या का आरोपी था। उपयोगकर्ता का तर्क है कि यदि मोदी गोडसे का ‘नकारात्मक या सकारात्मक’ महिमामंडन करते, तो कांग्रेस नेताओं की उपस्थिति उनकी वैचारिक स्थिति को कमजोर करती।
तथ्यों की जांच से पता चलता है कि राहुल गांधी और खड़गे वाकई लाल किले पर नहीं पहुंचे, जबकि उन्होंने कांग्रेस मुख्यालय पर झंडा फहराया। भाजपा ने इसकी तीखी आलोचना की, कांग्रेस को ‘इस्लामाबाद कांग्रेस पार्टी’ या ‘इटैलियन कांग्रेस पार्टी’ का नाम देकर पाकिस्तान प्रेमी या विदेशी प्रभावित बताया। राहुल ने मोदी के भाषण को ‘जुमलेबाजी’ और ‘घिसा-पिटा’ कहा, जबकि भाजपा ने इसे राष्ट्रीय सम्मान का अपमान माना।
उमा भारती के हालिया बयान का जिक्र उपयोगकर्ता ने किया, जहां उन्होंने एक टीवी चैनल पर गोडसे को ‘आतंकवादी से बड़ा आतंकवादी’ कहा यह नकारात्मक संदर्भ है, लेकिन भाजपा के कुछ नेताओं द्वारा गोडसे को कभी-कभी सकारात्मक रूप से देखने की पृष्ठभूमि में कांग्रेस की सतर्कता समझ में आती है। मोदी के भाषण में आरएसएस का सीधा महिमामंडन नहीं हुआ, लेकिन आरएसएस की शताब्दी वर्ष की पृष्ठभूमि में कांग्रेस ने जोखिम लिया नहीं। यह अनुपस्थिति ‘नूरा कुश्ती’ का हिस्सा नहीं, बल्कि वैचारिक संरक्षण की रणनीति लगती है। यदि वे उपस्थित होते और कोई विवादास्पद बयान आता, तो उनकी चुप्पी या प्रतिक्रिया दोनों ही उन्हें राजनीतिक नुकसान पहुंचाती।

मीडिया की भूमिका: चुप्पी का षड्यंत्र या विवेकहीनता?

 टीवी चैनलों पर अनुपस्थिति पर फोकस नहीं किया गया, और अखबारों में इसे छिपाया गया। जनसत्ता में राहुल की टिप्पणी और भाजपा के बयान अगल-बगल छपे, लेकिन गहराई से विश्लेषण नहीं। यह मीडिया  दर्शाता है, जहां सरकारी नैरेटिव को प्राथमिकता मिलती है। यदि कांग्रेस उपस्थित होती, तो शायद मीडिया मोदी के भाषण को और चमकाता, लेकिन अनुपस्थिति ने भाजपा को आलोचना का मौका दिया।
 सम्मान की रक्षा या राजनीतिक पाखंड?
कांग्रेस की अनुपस्थिति को वैचारिक संरक्षण का कदम माना जा सकता है, खासकर जब राजनीति ‘चौराहे पर नंगा करने’ के स्तर पर पहुंच गई है। राष्ट्रीय पर्वों का राजनीतिकरण चिंताजनक है, लेकिन अनुपस्थिति से कांग्रेस ने अपनी मर्यादा बचाई। क्या यह सही था? हां, यदि यह वैचारिक अखंडता की रक्षा करता है। लेकिन लंबे समय में, ऐसे कदम ध्रुवीकरण बढ़ाते हैं। अंततः, स्वतंत्रता दिवस जैसे पर्वों को राजनीति से ऊपर उठना चाहिए, जहां सभी दल एकजुट हों। पत्रकारों और विपक्ष की भूमिका को मजबूत करने से ही लोकतंत्र मजबूत होगा

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