निजी विश्वविद्यालय क जरिए 4100 करोड रुपए की अवैध वसूली वापस की जाए -संदीप तिवारी

Share

मध्यप्रदेश में निजी विश्वविद्यालयों द्वारा फीस वसूली की अनियमितताओं पर रिपोर्ट

मध्यप्रदेश में निजी विश्वविद्यालयों द्वारा की जा रही कथित मनमानी फीस वृद्धि और नियमों का उल्लंघन एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। आरोप हैं कि ये विश्वविद्यालय तीन वर्षों में अधिकतम 15% फीस वृद्धि के प्रावधान को तोड़ते हुए चार वर्षों में फीस कई गुना बढ़ा रहे हैं, जिससे लगभग 7 लाख छात्रों और उनके अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। प्रदेश के लगभग 53 निजी विश्वविद्यालयों से बीते चार वर्षों में 4100 करोड़ रुपये से अधिक की वसूली का दावा किया गया है। साथ ही, मध्यप्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग (पीयूआरसी) की भूमिका पर संदेह जताया जा रहा है, जिसमें आयोग द्वारा फीस वृद्धि प्रस्ताव न देने पर दंड की धमकी का आरोप शामिल है। पूर्व बार जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष रहे संदीप कुमार तिवारी का कहना है शिक्षा कोई वस्तु नहीं है जिसे मर्माने ढंग से बचा जाए यह सेवा और सामाजिक दायित्व है इसे भ्रष्टाचार और मुनाफा पुरी का साधन नहीं बनने दिया जा सकता 

मध्यप्रदेश में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना और संचालन ‘मध्यप्रदेश निजी विश्वविद्यालय (स्थापना एवं संचालन) अधिनियम, 2007’ के तहत होता है, जिसका संशोधन समय-समय पर किया जाता है। पीयूआरसी इस अधिनियम के अंतर्गत काम करता है और फीस निर्धारण, प्रवेश प्रक्रिया तथा अन्य विनियमनों की निगरानी करता है। आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर फीस ऑर्डर्स उपलब्ध हैं, जहां विश्वविद्यालयों को अपनी फीस संरचना प्रस्तुत करनी होती है। हाल के वर्षों में, MBBS, MD/MS, BDS/MDS, नर्सिंग और फार्मा जैसे कोर्सेज के लिए फीस स्ट्रक्चर जारी किए गए हैं, जिसमें 85% ट्यूशन फीस और 15% विविध शुल्क शामिल हैं।
प्रदेश में लगभग 53 निजी विश्वविद्यालय हैं, और उच्च शिक्षा विभाग के अनुसार, इनमें लाखों छात्र नामांकित हैं, हालांकि सटीक संख्या 7 लाख के आसपास होने का अनुमान है।उच्च शिक्षा संस्थानों में फीस संबंधी शिकायतें बढ़ रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में निजी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों  में फीस से जुड़ी 4,200 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें 25 करोड़ रुपये से अधिक की रिफंड हुईं, और 50% से अधिक शिकायतें फीस अनियमितताओं से संबंधित बताई जाती हैं।

मध्यप्रदेश में यह समस्या मुख्य रूप से निजी स्कूलों में उजागर हुई है, लेकिन निजी विश्वविद्यालयों और मेडिकल कॉलेजों में भी समान पैटर्न देखा जा रहा हैशिक्षा अधिकार को सुरक्षित रखने वाले नियमों के अनुसार, फीस वृद्धि सीमित होनी चाहिए। मध्यप्रदेश में स्कूलों के लिए ‘मध्यप्रदेश निजी विद्यालय (फीस तथा संबंधित विषयों का विनियमन) अधिनियम, 2017’ लागू है, जो वार्षिक 10% से अधिक वृद्धि की अनुमति नहीं देता। निजी विश्वविद्यालयों के लिए पीयूआरसी फीस प्रस्तावों की जांच करता है, हालांकि, उच्च न्यायालय और नियामक निकायों ने फीस वृद्धि पर सख्ती बरती है। उदाहरणस्वरूप, 2015 में हाई कोर्ट ने छह निजी मेडिकल कॉलेजों पर एडमिशन और फीस रेगुलेटरी कमिटी (AFRC) द्वारा लगाए गए 10 करोड़ रुपये के जुर्माने को स्थगित किया, जो अनियमितताओं से जुड़ा था।

अनियमितताओं के मामले मुख्य रूप से निजी स्कूलों में सामने आए हैं, जहां जबलपुर जिले में रिफंड करने के आदेश दिए गए, और इनमें फीस को 10-20% तक मनमाने ढंग से बढ़ाने के आरोप थे।निजी विश्वविद्यालयों में समान अनियमितताएं रिपोर्ट हुई हैं, जैसे मेडिकल सीट्स की फीस मध्य सत्र में बढ़ाना। UGC ने भी मध्यप्रदेश सरकार को फर्जी विश्वविद्यालयों और UGC नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, जिसमें 32 विश्वविद्यालयों में अयोग्य कुलपतियों का मुद्दा शामिल है।
बीते चार वर्षों में 4100 करोड़ रुपये की वसूली का दावा सत्यापित नहीं हो सका, लेकिन राज्य स्तर पर फीस शिकायतें बढ़ी हैं। 70% से अधिक निजी संस्थान फीस संरचना सार्वजनिक नहीं कर रहे,यह NHRC में बच्चे के अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत दर्ज हुई हैअब शहडोल के पूर्व जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट संदीप तिवारी ने इस पर आपत्ति जाहिर करते हुए कहा है
छात्रों और अभिभावकों पर प्रभाव
लगभग 7 लाख छात्र प्रभावित होने का अनुमान है, जो आर्थिक संकट में फंस सकते हैं। फीस वृद्धि शिक्षा को व्यापारीकरण बना रही है, जिससे मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है।रिफंड ऑर्डर्स से स्पष्ट है कि लाखों छात्रों से अतिरिक्त फीस वसूली गई। उच्च शिक्षा में भी, मेडिकल और इंजीनियरिंग कोर्सेज में फीस दोगुनी होने के उदाहरण हैं, जिससे गरीब परिवारों के छात्र बाहर हो रहे हैं।पीयूआरसी फीस ऑर्डर्स जारी करता है और विश्वविद्यालयों को विकास शुल्क का उपयोग केवल विकास कार्यों में करने का निर्देश देता है।

हालांकि, आरोप हैं कि आयोग ने अवैध वृद्धि को स्वीकृति दी और प्रस्ताव न देने पर 1 लाख रुपये दंड की धमकी दी। उपलब्ध स्रोतों में इसकी पुष्टि नहीं हुई, लेकिन AFRC जैसे समान निकायों में अनियमितताओं के मामले सामने आए हैं पीयूआरसी की भूमिका संदिग्ध लगती है, क्योंकि कई संस्थान नियमों का पालन नहीं कर रहे, और UGC ने राज्य सरकार को चेतावनी दी है।पूर्व बार जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष रहे संदीप कुमार तिवारी का कहना है शिक्षा कोई वस्तु नहीं है जिसे मर्माने ढंग से बचा जाए यह सेवा और सामाजिक दायित्व है इसे भ्रष्टाचार और मुनाफा पुरी का साधन नहीं बनने दिया जा सकता इसलिए संबंधित संस्थाओं के सभी जिम्मेदार पदाधिकारी और अधिकारियों के खिलाफ जांच करके कानून कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए तथा जिन छात्रों और अभिभावकों से तथाकथित 4100 करोड रुपए की अवैध राशि वसूली गई है उसे तत्काल वापस कराया जाएदेखना होगा गरीब बच्चों को शिक्षा की गारंटी का अधिकार देने वाली व्यवस्था आम नागरिकों से शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए का जो डांका डाला जा रहा है उस पर उसका क्या नजरिया सामने आता है अथवा वह एक व्यवस्थित पारदर्शी माफिया सिस्टम को स्थापित करना चाहती है जो शिक्षा के जरिए आम आदमियों का खून चूस सके और तरक्की पसंद योग्य व्यक्ति अपने लक्ष्यगत शिक्षा से मरहूम हो जाए


Share

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

राशिफल

- Advertisement -spot_img

Latest Articles