
अगर भ्रष्टाचार पारदर्शी हो जाए उस पर नेताओं और अधिकारियों के निष्ठा हो जाए तो वह व्यवस्था “सिस्टम” के रूप में परिवर्तित हो जाता है यह अलग बात है कि इस प्रकार की व्यवस्था एक माफिया को जन्म देता है तो क्या नगर पालिका परिषद शहडोल में माफिया-सिस्टम आम नागरिकों के लिए अभिशाप बन रहा है, ऐसा क्यों नहीं सोचा जाना चाहिए .हाल में हमने देखा है किस तरह शहडोल के तमाम तालाबों और सर्वजनिकों कुओं को भी नष्ट करके उनकी प्लाटिंग कर करके नगरपालिका ने बकायदे उसे पर भवन निर्माण के अनुमति दे दी साथ ही नियम विरुद्ध तरीके से भूजल निकासी के लिए बोरिंग की भी परमिशन दे दी जिससे ऊपर का पानी भी नष्ट हो गया और जमीन के नीचे का पानी भी खत्म होने की कगार में पहुंचने लगा और जब नगर पालिका परिषद में यह जान लिया कि अब नागरिकों की पानी एक अत्यंत आवश्यकता है और पानी की कमी भी पर्याप्त मात्रा में सुनिश्चित हो रही है ऐसे में पानी का अधिकार छीन लिए .पहले तो₹10 प्रतिमाह जल शुल्क 300 प्रतिशत बढ़ाकर जल कर लगाया गया फिर एक जंप और लिया गया और उसे तीन गुना बढ़कर ₹100 करीब दिया गया सर चार्ज दंड आदि अलग कनेक्शन का चार्ज भी बढ़ा दिया ..अब जो पैसा बाकी है उसकी रिकवरी के लिए अभियान चला कर आम नागरिकों से पैसा वसूला जा रहा है..
यह एक तरीका है अपने हिसाब से काम करने का ,तो दूसरा तरीका शहडोल की घोषित कॉलोनी सड़कों पर गैर कानूनी भवन निर्माण की अनुमति दी जाती है फिर नगर पालिका के नेता अधिकारी अपने प्रिय ठेकेदार को भवन निर्माण का ठेका दिलाया जाता है और फिर मनी लॉन्ड्रिंग होती है क्योंकि यही सिस्टम है.. इस संबंध में जब सूचना चाही जाती हैं तो लिख कर दिया जाता है कि संबंधित प्रकरण की फाइल नगर पालिका में उपलब्ध नहीं है तो क्या फाइल पहले गायब कराई जाती है…? इसके बाद उसमें घोषित प्लानिंग के सड़के, प्लेग्राउंड ,तालाब आदि पर अपने आदमी के जरिए कब्जा कराया जाता है और मिल बाटकर शहडोल नगर की धन संपदा और व्यवस्था को माफिया की तरह लूटा जाता है… क्या हम इस दिशा में विकास कर रहे हैं…? एक उदाहरण से समझते हैं
1963 में तत्कालीन व्यवस्था के अनुरूप शहडोल नगर की पहली कॉलोनी, टाउन प्लान से अनुमति लेकर राजेंद्र टॉकीज के पीछे राजेंद्र नगर नाम की कॉलोनी विकसित की जाती है. निश्चित तौर पर तब पूरी की पूरी टाउन कंट्री प्लानिंगडेवलपमेंट की फाइल कलेक्टर शहडोल को भी दी गई रही होगी स्थानीय नगर पालिका परिषद शहडोल को भी दिए कहीं रही होगी जो फिलहाल उपलब्ध नहीं हो रही है../ यह झूठ को सही मानकर चला जा सकता है की 1963 यानी करीब 50 साल पहले की फाइल सड गई होगी, गल गई होगी या दिमक खा गए होंगे किंतु इसी का कुछ रिकॉर्ड टाउन कंट्री प्लानिंग का नक्शा शामिल करके संलग्न करते हुए 2014 में नगर पालिका परिषद को राजेंद्र नगर निवासी चंद्रिका प्रसाद शुक्ला शिकायत करते हैं कि
उनके मार्ग में अवैध कब्जा किया जा रहा है, नाली निस्तार प्रभावित की जा रही है उसे पर निर्णय भी नगर पालिका लेती है, उसे ठीक करती है अब जब उसे प्रकरण की फाइल सूचना के अधिकार के तहत नगर पालिका परिषद से चाही गई उनके द्वारा स्पष्ट तौर पर पत्र क्रमांक 7391 दिनांक 12 8.25 के जरिए यह बताया जाता है की जानकारी भवन निर्माण व राजस्व शाखा में उपलब्ध नहीं होने का लेख किया गया है ऐसी स्थिति में जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण सूचना सामग्री नहीं दी जा सकती है… स्पष्ट है कि पहले फाइलें गायब कराई जाती हैं.. इसके बाद अपने आदमी के जरिए संबंधित कॉलोनी की सड़कों में भवन निर्माण की अनुमति अपने भ्रष्ट इंजीनियर के जरिए दिलाई जाती है और बाद में अपने ही ठेकेदार से ऐसे अवैध कब्जे निर्माण कराए जाते हैं बाद में जो भी धनराशि इकट्ठी होती है, माफिया-सिस्टम उसका बंदर बाट करता है… उससे ज्यादा की परिषद में जिम्मेदार तबका चाहे अध्यक्ष हो या पार्षद गण इस पर आंख मुंह दोनों बंद कर लेते हैं, बावजूद इसके कि इस बंदर पाठ में शायद ही जूठन का टुकड़ा उन्हें परोसा गया हो माफिया गिरी का यह नया आयाम नगर पालिका परिषद को शहडोल नगर में लूटपाट और भ्रष्टाचार का अट्टा बना दिया है.
प्रशासनिक लापरवाही: शिकायतों के बावजूद, नगर पालिका परिषद के जिम्मेदार पदाधिकारी, जैसे अध्यक्ष और पार्षद, इस मामले पर चुप्पी साध लेते हैं। यह संदेह पैदा करता है कि वे भी इस माफिया सिस्टम का हिस्सा हो सकते हैं या फिर दबाव में हैं।
कानूनी और संवैधानिक संदर्भभारत के संविधान के 74वें संशोधन (1992) के तहत, नगर पालिकाओं को शहरी स्थानीय स्वशासन की जिम्मेदारी दी गई है। यह संशोधन नगर पालिकाओं को स्वायत्तता प्रदान करता है, लेकिन साथ ही पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा भी करता है। राजेंद्र नगर मामले में, नगर पालिका परिषद की कार्यप्रणाली इस संवैधानिक भावना के विपरीत प्रतीत होती है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत नागरिकों को जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है, लेकिन नगर पालिका का दस्तावेज उपलब्ध न कराना इस अधिकार का उल्लंघन है।
माफिया सिस्टम और भ्रष्टाचार का प्रभाव अवैध कब्जे और अनधिकृत निर्माण से न केवल नाली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रभावित होती हैं, बल्कि आम नागरिकों का जीवन भी दुष्कर हो जाता है। माफिया सिस्टम के तहत होने वाली आय का बंदरबांट नगर पालिका के संसाधनों का दुरुपयोग करता है, जिससे विकास कार्यों के लिए धन की कमी होती है।
फाइलों के गायब होने और भ्रष्टाचार के आरोपों से नागरिकों का स्थानीय प्रशासन पर विश्वास कम होता है।यह सवाल उठता है कि क्या जिला मुख्यालय और संभाग मुख्यालय के अधिकारी इस माफिया सिस्टम को रोकने के लिए कदम उठाएंगे। अब तक, उनकी निष्क्रियता से यह प्रतीत होता है कि वे या तो इस सिस्टम में शामिल हैं या फिर इसे नजरअंदाज कर रहे हैं। यह स्थिति “मोनी बाबा” की तरह सन्यास लेने जैसी है, जो शहडोल की जनता के लिए निराशाजनक है।
शहडोल नगर पालिका परिषद में भ्रष्टाचार और अवैध कब्जे का यह मामला गंभीर चिंता का विषय है। यह न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है, बल्कि स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक भावना का उल्लंघन भी करता है। राजेंद्र नगर कॉलोनी और गायब फाइलों के मामले की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित की जाए, जिसमें कलेक्टर, T&CP विभाग, और लोकायुक्त के प्रतिनिधि शामिल हों। अवैध निर्माण और भ्रष्टाचार में शामिल अधिकारियों, इंजीनियरों, और ठेकेदारों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।शहडोल नगर को भ्रष्टाचार और माफिया सिस्टम से मुक्त करने के लिए जिला और संभागीय अधिकारियों को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यदि यह स्थिति यथावत रही, तो यह न केवल राजेंद्र नगर, बल्कि पूरे शहडोल नगर के लिए एक बदनुमा दाग बन जाएगी।

