
मोहन राम मंदिर, शहडोल: पारदर्शिता के अभाव में लूट का कारवां
“तू इधर-उधर की बात ना कर, बता ये कारवां लुटा कैसे…?”
शहडोल
काव्यात्मक प्रश्न मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में स्थित रघुनाथ जी राम जानकी शिव पार्वती मोहन राम मंदिर के संदर्भ में एक गंभीर सवाल बनकर उभरता है। यह मंदिर, जो भक्ति और आस्था का प्रतीक है, पिछले सत्तर वर्षों से विवादों और कथित लूटपाट के आरोपों के घेरे में है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 2012 में इस मंदिर के प्रबंधन को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया था, जिसमें विवादित पक्षकारों को पृथक कर सोहागपुर (शहडोल) के उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) को एक स्वतंत्र कमेटी गठित करने और मंदिर के प्रबंधन की जिम्मेदारी लेने का निर्देश दिया गया था। हाई कोर्ट का यह आदेश तब तक प्रभावी रहना था, जब तक मामले का अंतिम निराकरण उच्च न्यायालय से नहीं हो जाता। लेकिन 13 साल बाद भी यह स्वतंत्र कमेटी कोई प्रभार नहीं ले पाई है व प्रभावी रूप से कार्य शुरू नहीं कर पाई है, और मंदिर की संपत्ति पर धर्म का नकाब पहने लोगों द्वारा लूटपाट के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। इस स्थिति में सवाल उठता है कि क्या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जो भगवान राम के नाम पर अपनी राजनीतिक पहचान को मजबूत करती रही है, क्या इस मामले में जवाबदेही से बच सकती है?
(त्रिलोकी नाथ)
मंदिर विवाद और उच्च न्यायालय का आदेश
शहडोल के मोहन राम मंदिर का विवाद कई वर्षों से चला आ रहा है। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व का केंद्र है, बल्कि इसकी संपत्ति और प्रबंधन से जुड़े विवाद इसे चर्चा का विषय बनाते हैं। 2012 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए एक स्पष्ट आदेश जारी किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मंदिर के प्रबंधन से विवादित पक्षकारों को अलग किया जाए और सोहागपुर के एसडीएम के नेतृत्व में एक स्वतंत्र कमेटी गठित की जाए, जो मंदिर के प्रबंधन और संपत्ति की देखरेख करे। यह आदेश पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए था, ताकि मंदिर की संपत्ति का दुरुपयोग न हो और इसका प्रबंधन सुचारु रूप से हो सके।
लेकिन 13 साल बीत जाने के बाद भी यह कमेटी पूरी तरह से प्रभावहीन रही क्योंकि विवादित पक्षकारों ने अभी तक इस प्रहार नहीं दिया है या कह सकते हैं कि इसने प्रभार नहीं लिया है जिससे कार्य शुरू नहीं कर पाई है। इस दौरान मंदिर की संपत्ति के कथित दुरुपयोग और लूटपाट और अतिक्रमण तथा इसकी कब्जे की भूमि पर अन्य लोगों को पेट भी बांट दिए जाने की जानकारी के आरोप सामने आए हैं। यह स्थिति न केवल न्यायालय के आदेश की अवमानना को दर्शाती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि आखिर क्यों इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई?
भाजपा शासन और स्वतंत्र कमेटी की निष्क्रियता
मध्य प्रदेश में पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय से भारतीय जनता पार्टी का शासन रहा है। इस दौरान मंदिर के प्रबंधन में स्वतंत्र कमेटी की निष्क्रियता और कथित लूटपाट के आरोपों ने कई सवाल खड़े किए हैं। स्वतंत्र कमेटी में दो जिला भाजपा अध्यक्षों मार्तंड त्रिपाठी और डॉ राजेंद्र श्रीवास्तव जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों की मौजूदगी के बावजूद, मंदिर के प्रबंधन का जिम्मा विवादित पक्षकारों से नहीं लिया जा सका है। यह स्थिति आश्चर्यजनक है, क्योंकि भाजपा ने हमेशा भगवान राम के प्रति अपनी भक्ति और उनके नाम पर आधारित अपनी राजनीतिक पहचान को प्रचारित किया है।
अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर भाजपा ने जिस तरह से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सक्रियता और प्रतिबद्धता दिखाई, उसे देखते हुए यह सवाल स्वाभाविक है कि शहडोल के मोहन राम मंदिर के मामले में इतनी उदासीनता क्यों? क्या यह केवल प्रशासनिक विफलता है, या इसके पीछे कोई गहरी सियासी मंशा काम कर रही है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मंदिर की संपत्ति का पारदर्शी प्रबंधन न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।
लूटपाट के आरोप और पारदर्शिता का अभाव
मोहन राम मंदिर की संपत्ति के कथित दुरुपयोग और लूटपाट के आरोप गंभीर हैं। मंदिर मैं होने वाली लाखों रुपए की आय, दान, और अन्य करोड़ों रुपए की संपत्तियों का प्रबंधन पारदर्शी तरीके से नहीं हो रहा है, जैसा कि उच्च न्यायालय के आदेश में अपेक्षित था। यह स्थिति न केवल भक्तों की आस्था पर चोट करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन में प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर कितनी लापरवाही बरती जा रही है।
जब स्वतंत्र कमेटी, जिसमें स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली और सत्तारूढ़ दल से जुड़े लोग शामिल हैं, अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर पाती, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर इस निष्क्रियता के पीछे क्या कारण हैं? क्या यह स्थानीय स्तर पर सियासी दबावों का परिणाम है, या फिर मंदिर की संपत्ति से जुड़े निहित स्वार्थों की रक्षा की जा रही है?
भाजपा पर सवाल और जवाबदेही
भारतीय जनता पार्टी, जो भगवान राम के नाम पर अपनी राजनीतिक पहचान को मजबूत करती रही है, इस मामले में जवाबदेही से बच नहीं सकती। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर पार्टी ने जिस तरह से एक राष्ट्रीय आंदोलन को नेतृत्व दिया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मंदिर निर्माण को गति दी, वह उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। लेकिन शहडोल के मोहन राम मंदिर के मामले में उसकी चुप्पी और निष्क्रियता कई सवाल खड़े करती है।
“तू इधर-उधर की बात ना कर, बता ये कारवां लुटा कैसे…?” यह सवाल केवल काव्यात्मक नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक मांग है। भाजपा को यह स्पष्ट करना होगा कि उसके शासनकाल में क्यों मंदिर की संपत्ति अतिक्रमण, अवैध पट्टा बनने का दुरुपयोग हो रहा है? क्यों उच्च न्यायालय के आदेश का पालन नहीं हो पा रहा है? और क्यों स्वतंत्र कमेटी, जिसमें उसके ही लोग शामिल हैं, अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही है?
पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत
मोहन राम मंदिर का मामला केवल एक स्थानीय विवाद नहीं है; यह धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन, प्रशासनिक पारदर्शिता, और राजनीतिक जवाबदेही का एक बड़ा सवाल है। क्या पूरे देश व मध्यप्रदेश के धार्मिक क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी उच्च न्यायालय के आदेश को लागू करने में 13 साल की देरी और मंदिर की संपत्ति पर कथित लूटपाट के आरोप न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाते हैं, बल्कि यह भी सवाल उठाते हैं कि क्या सत्तारूढ़ दल की प्राथमिकताएं वास्तव में भगवान राम की सेवा और भक्तों की आस्था की रक्षा में हैं?
इस मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:
उच्च न्यायालय के आदेश का तत्काल पालन: स्वतंत्र कमेटी को तुरंत प्रभावी बनाया जाए और मंदिर का प्रबंधन विवादित पक्षकारों से हटाकर कमेटी को सौंपा जाए।
संपत्ति का ऑडिट: मंदिर की आय और संपत्ति का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए, ताकि कथित लूटपाट के आरोपों की सच्चाई सामने आ सके।
स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही: सुहागपुर के एसडीएम और अन्य संबंधित अधिकारियों को इस मामले में अपनी निष्क्रियता के लिए जवाबदेह ठहराया जाए।
राजनीतिक हस्तक्षेप की जांच: भाजपा नेताओं की संलिप्तता और निष्क्रियता की स्वतंत्र जांच हो, ताकि यह स्पष्ट हो कि क्या सियासी दबाव इस मामले को प्रभावित कर रहे हैं।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि मोहन राम मंदिर का यह विवाद न केवल धार्मिक आस्था, बल्कि सामाजिक विश्वास और प्रशासनिक पारदर्शिता का भी सवाल है। जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक यह प्रश्न गूंजता रहेगा: “तू इधर-उधर की बात ना कर, बता ये कारवां लुटा कैसे…?”

