कांग्रेस की देन: भाजपाई उपराष्ट्रपति के बुढ़ापे का सहारा… ( त्रिलोकी नाथ )

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कांग्रेस की देन: भाजपाई उपराष्ट्रपति के बुढ़ापे का सहारा…

भारतीय राजनीति में अक्सर ऐसे मोड़ आते हैं जहां व्यक्तिगत निर्णय और राष्ट्रीय संस्थाओं की गरिमा के बीच एक पतली रेखा खिंच जाती है। हाल ही में पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे और उसके बाद राजस्थान विधानसभा से पेंशन की मांग ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। धनखड़, जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ जुड़कर उपराष्ट्रपति पद तक पहुंचे, अब कांग्रेस के समय की विधायकी से मिलने वाली पेंशन पर निर्भर दिखाई दे रहे हैं। यह घटना न केवल उनकी व्यक्तिगत यात्रा को उजागर करती है, बल्कि देश की संवैधानिक संस्थाओं में स्वतंत्रता, दबाव और आर्थिक सुरक्षा के सवाल भी उठाती है।

                                          ( त्रिलोकी नाथ )
जगदीप धनखड़ का राजनीतिक सफर दिलचस्प रहा है। वे मूल रूप से किसान परिवार से आते हैं और खुद को अक्सर किसान के रूप में पेश करते रहे हैं। 1993 से 1998 तक वे राजस्थान की किशनगढ़ विधानसभा सीट से कांग्रेस के विधायक रहे। बाद में उन्होंने जनता दल और फिर भाजपा का दामन थामा। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल विवादास्पद रहा, जहां वे तृणमूल कांग्रेस सरकार से टकराव के लिए जाने गए। 2022 में वे उपराष्ट्रपति बने, लेकिन 21 जुलाई 2025 को अचानक इस्तीफा दे दिया, जिसकी वजह स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को बताया गया। इस्तीफे के बाद वे उपराष्ट्रपति भवन से निकलकर एक निजी फार्महाउस में चले गए।इस घटना को एक बड़े षड्यंत्र के रूप में पेश किया गया है। स्वाभाविक ही सवाल उठता है कि धनखड़ को पद छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, शायद भाजपा के दबाव में। कहा गया है कि धनखड़ “गायब” हो गए थे

और फिर अचानक पेंशन के लिए आवेदन करते दिखे। वास्तव में, इस्तीफे के कुछ हफ्तों बाद धनखड़ ने राजस्थान विधानसभा सचिवालय में आवेदन देकर अपनी पुरानी विधायकी की पेंशन बहाल करने की मांग की।नियमों के अनुसार, 70 वर्ष से ऊपर के पूर्व विधायकों को 35,000 रुपये की आधार राशि पर 20% अतिरिक्त मिलता है, यानी करीब 42,000 रुपये मासिक। दिलचस्प बात यह है कि यह पेंशन कांग्रेस के समय की विधायकी से जुड़ी है, जबकि धनखड़ अब भाजपा से जुड़े हैं।विडंबना हैं कि “अंततः कांग्रेस की विधायकी ही आपको सम्मान सहित जिंदा रहने के लिए पेंशन दे सकती है।”

लेकिन क्या यह इस्तीफा वाकई दबाव का नतीजा था? आधिकारिक बयानों में स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इसे स्वास्थ्य संबंधी मुद्दा बताकर विपक्ष के दावों को खारिज किया। हालांकि, इस्तीफे की अचानकता ने अटकलों को जन्म दिया। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में “हाउस अरेस्ट” जैसी अफवाहें उड़ीं, लेकिन इनका कोई ठोस आधार नहीं मिला धनखड़ का इस्तीफा ऐसे समय आया जब संसद का मॉनसून सत्र चल रहा था।

और अगले उपराष्ट्रपति चुनाव 9 सितंबर 2025 को होने वाले हैं इसे संवैधानिक पदों पर स्वतंत्रता की कमी से जोड़ता है। वे महात्मा गांधी के दर्शन का हवाला देते हैं – “देश की आजादी तब तक नहीं सुनिश्चित हो सकती जब तक अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति को उसका लाभ न मिले।”
क्या अमृत काल (आजादी के 75 वर्ष) को आर्थिक साम्राज्यवाद का शिकार , जहां संवैधानिक संस्थाएं भी दबाव में आ जाती हैं। धनखड़ को किसानों का प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं हैं कि वे पद पर रहते हुए किसानों या लोकतंत्र के लिए कुछ नहीं कर पाए। वास्तव में, धनखड़ के उपराष्ट्रपति काल में राज्यसभा की कार्यवाही में विपक्षी सांसदों के साथ टकराव चर्चा में रहे, लेकिन किसान आंदोलनों पर उनका रुख भाजपा के अनुरूप ही था।एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या धनखड़ को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया? , जो सीडीएस बिपिन रावत की हेलीकॉप्टर दुर्घटना या अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों पर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी से जोड़ा गया है। ये तुलनाएं साजिश सिद्धांतों की तरह लगती हैं, लेकिन वर्तमान राजनीतिक माहौल में जहां आर्थिक शक्तियां राजनीति को प्रभावित करती हैं, ऐसे सवाल उठना स्वाभाविक है।

एक्स (पूर्व ट्विटर) पर भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई, जहां उपयोगकर्ताओं ने धनखड़ की पेंशन मांग को विडंबनापूर्ण बताया। कुछ पोस्ट्स में इसे “कांग्रेस की देन” के रूप में हास्य के साथ पेश किया गया।
आखिरकार, यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि संवैधानिक पद कितने स्वतंत्र हैं? यदि उपराष्ट्रपति जैसा पद भी व्यक्ति को मानसिक स्वतंत्रता नहीं दे पाता, तो गांधीजी की कल्पना की आजादी अधर में लटकी हुई लगती है। धनखड़ की पेंशन मांग वैध है, लेकिन इसका समय और संदर्भ राजनीतिक बहस को जन्म दे रहा है। क्या यह आर्थिक साम्राज्यवाद का शीत युद्ध है, जहां शक्तिशाली ताकतें पर्दे के पीछे से नियंत्रण करती हैं? स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सतत संघर्ष जरूरी है, लेकिन सच्चाई जानने के लिए पारदर्शिता की जरूरत है – इस्तीफे के पीछे के कारणों पर स्पष्टता, ताकि लोकतंत्र की नींव मजबूत रहे।


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