न्याय में राजनीतिक हस्तक्षेप; न्याय की स्वतंत्रता पर हाईकोर्ट के फैसले ने दिखाया आईना…शहडोल में भी हुआ था हस्तक्षेप.

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न्याय में राजनीतिक हस्तक्षेप; न्याय की स्वतंत्रता पर हाईकोर्ट के फैसले ने दिखाया आईना।
शहडोल में भी हुआ था हस्तक्षेप….

  जबलपुर हाईकोर्ट के हालिया आदेश (WP No. 28456/2025, दिनांक 01.09.2025) ने न केवल न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को उजागर किया है, बल्कि यह भी दर्शाया है कि सत्ता और संपत्ति के दुरुपयोग के प्रयासों के बावजूद भारतीय न्यायपालिका अपनी गरिमा और स्वतंत्रता को बनाए रखने में सक्षम है। इस मामले में माननीय न्यायमूर्ति विषाल मिश्रा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “श्री संजय पाठक ने इस मामले पर चर्चा के लिए मुझे कॉल करने का प्रयास किया, इसलिए मैं इस रिट याचिका की सुनवाई से अलग हो रहा हूँ।” यह कथन न केवल एक साहसिक कदम है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांतों—निष्पक्षता, स्वतंत्रता और पारदर्शिता—का प्रतीक भी है।
न्यायपालिका पर दबाव: एक पुरानी प्रवृत्ति
सत्ता और संपत्ति के बल पर न्यायिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने की कोशिश कोई नई बात नहीं है। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं, जहां प्रभावशाली लोग अपने हितों को साधने के लिए न्यायपालिका पर दबाव बनाने का प्रयास करते रहे हैं। यह दबाव कई रूपों में सामने आ सकता है—चाहे वह प्रत्यक्ष रूप से संपर्क करने का प्रयास हो, धमकियां हों, या फिर अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालने की कोशिश। इस मामले में श्री संजय पाठक द्वारा न्यायमूर्ति को कॉल करने का प्रयास एक ऐसी ही कोशिश को दर्शाता है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि कुछ लोग अपनी पहुंच और प्रभाव का उपयोग करके न्यायिक प्रक्रिया को अपने पक्ष में करने की चेष्टा करते हैं।
न्यायमूर्ति मिश्रा का साहसिक कदम
न्यायमूर्ति विषाल मिश्रा का इस मामले से स्वयं को अलग करना और इस घटना को सार्वजनिक रूप से उजागर करना एक ऐतिहासिक कदम है। यह न केवल उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी को दर्शाता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि न्यायपालिका ऐसी किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं करेगी। यह कदम निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है:
न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा: न्यायमूर्ति मिश्रा ने यह सुनिश्चित किया कि उनके ऊपर किसी भी प्रकार का दबाव या प्रभाव न पड़े। यह कदम यह दर्शाता है कि भारतीय न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
पारदर्शिता का उदाहरण: इस घटना को खुले तौर पर उजागर करके न्यायमूर्ति ने न केवल अपनी निष्पक्षता को साबित किया, बल्कि यह भी दिखाया कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता कितनी महत्वपूर्ण है।
सत्ता के दुरुपयोग पर प्रहार: इस कदम ने उन लोगों को कड़ा संदेश दिया है जो सत्ता और संपत्ति के बल पर न्याय को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। यह एक चेतावनी है कि ऐसी कोशिशें न केवल विफल होंगी, बल्कि उनकी सार्वजनिक भर्त्सना भी होगी।
न्यायपालिका की गरिमा और जनता का विश्वास

न्यायपालिका किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ होती है। यह वह संस्था है जो न केवल कानून का शासन सुनिश्चित करती है, बल्कि समाज में न्याय और समानता के सिद्धांतों को भी जीवित रखती है। जबलपुर हाईकोर्ट का यह आदेश इस बात का प्रमाण है कि भारतीय न्यायपालिका अपनी गरिमा और स्वतंत्रता को बनाए रखने में सक्षम है। इस प्रकार की घटनाएं जनता के बीच न्यायपालिका के प्रति विश्वास को और मजबूत करती हैं।
समाज और शासन के लिए सबक
यह घटना हमें कई महत्वपूर्ण सबक देती है:न्यायिक स्वतंत्रता का महत्व: यह हमें याद दिलाता है कि न्यायपालिका को बाहरी दबावों से मुक्त रहना चाहिए। इसके लिए न केवल मजबूत संस्थागत ढांचे की जरूरत है, बल्कि समाज के सभी वर्गों को इस स्वतंत्रता का सम्मान करना होगा।पारदर्शिता की आवश्यकता: इस प्रकार की घटनाओं को उजागर करना न केवल जवाबदेही को बढ़ाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि जनता का विश्वास बना रहे।
सत्ता के दुरुपयोग पर अंकुश: यह घटना उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो अपनी सत्ता और संपत्ति का दुरुपयोग करते हैं। यह दर्शाता है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है।
निष्कर्ष
जबलपुर हाईकोर्ट का यह आदेश न केवल एक कानूनी दस्तावेज है, बल्कि यह भारतीय न्यायपालिका की ताकत और स्वतंत्रता का प्रतीक भी है। माननीय न्यायमूर्ति विषाल मिश्रा का यह कदम न केवल उनकी निष्ठा और साहस को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि भारतीय न्याय व्यवस्था सत्ता और संपत्ति के दबाव के सामने नहीं झुकेगी। यह घटना हमें यह विश्वास दिलाती है कि जब तक हमारे पास ऐसी न्यायपालिका है, जो अपनी गरिमा और स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध है, तब तक लोकतंत्र और न्याय की नींव मजबूत रहेगी।
शहडोल न्यायालय परिषर में भी होती है दखलअंदाजी
हाल में एक आंदोलन से जुड़े मुद्दे पर इस प्रकार की बानगी शहडोल जिला न्यायालय में भी चर्चा विषय बना रहा है और संबंधित न्यायाधीश ने अपने न्यायालय से फाइलों को ट्रांसफर करवा दिया जो उचित भी है इस प्रकार की गलत परंपरा से अगर नेता या उनके सिरफिरे लोग न्यायालय प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने लगेंगे तो फिर न्याय कहां ठहरेगा किससे आशा की जाएगी …?

    जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष संदीप तिवारी कहते हैं लेकिन सवाल समाज और राजनीति से हैं क्या सत्ता का असली काम जनता की सेवा है या अदालत तक को प्रभावित करने की कोशिश करना?क्या करोड़पति नेताओं का दायित्व संविधान के प्रति जवाबदेही है या रसूख का प्रदर्शन करना?यह घटना सिर्फ़ एक बानगी है, यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि लोकतंत्र की जड़ें तभी मजबूत होंगी, जब न्यायपालिका पर भरोसा अटूट रहे और सत्ता की ऐसी कोशिशें जनता के सामने उजागर होती रहें।


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