3-मोहनराम मंदिर: आखिर मोहन राम मंदिर का चोर कौन ? क्यों लुट गई करोड़ों की 33 डिसमिल जमीन…?-(त्रिलोकी नाथ)

उच्च न्यायालय के आदेशों की अवमानना और भ्रष्टाचार का मामला
मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के सोहागपुर में स्थित मोहन राम मंदिर ट्रस्ट से संबंधित गंभीर विवाद उच्च न्यायालय, मध्य प्रदेश के समक्ष प्रकरण क्रमांक एफ-177/12 और प्रकरण 895/12 में विचाराधीन रहा। इस मामले में मंदिर के प्रबंधन, भ्रष्टाचार, और अवैध कब्जे से जुड़े गंभीर आरोप सामने आए हैं, जिनमें स्थानीय प्रशासन और प्रभावशाली राजनीतिक नेताओं की कथित संलिप्तता की बात उजागर हुई है।- (त्रिलोकी नाथ)
उच्च न्यायालय के आदेश:
2 नवंबर 2012 (प्रकरण क्रमांक एफ-177/12): मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के प्रबंधन को लेकर अंतरिम आदेश पारित किया। आदेश में रजिस्ट्रार पब्लिक ट्रस्ट (अनुविभागीय अधिकारी, एसडीओ, सोहागपुर) को निर्देश दिया गया कि वे एक स्वतंत्र कमेटी का गठन करें, जो मंदिर ट्रस्ट के प्रबंधन और देखरेख का कार्य करे। यह कमेटी वाद के निराकरण तक मंदिर के कार्यों को नियंत्रित करने और पक्षकारों को पृथक रखने के लिए जिम्मेदार थी।
11 जनवरी 2013 (प्रकरण 895/12): रोहिणीश्वर प्रपन्नाचार्य ने पूजा करने की अनुमति के लिए याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने इस पर सुनवाई करते हुए अपने पूर्व आदेश 2 नवंबर 2012 का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही, रोहिणीश्वर प्रपन्नाचार्य को पूजा करने का अधिकारदे स्वतंत्र कमेटी को पूजा के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने का आदेश दिया ।
स्वतंत्र कमेटी का गठन और विवाद:
30 जनवरी 2013: तत्कालीन एसडीओ, एल.एल. यादव ने कथित तौर पर सत्ताधारी नेताओं के दबाव में आकर स्वतंत्र कमेटी का गठन किया, जिसमें वाद पक्षकार लव कुश पांडे को शामिल किया गया। यह उच्च न्यायालय के आदेशों की स्पष्ट अवमानना थी, क्योंकि आदेश में पक्षकारों को कमेटी से
पृथक रखने का निर्देश था।
31 जनवरी 2013: गलती का संज्ञान लेते हुए, एसडीओ ने तत्काल संशोधन आदेश जारी कर लवकुश पांडे को कमेटी से हटा दिया। हालांकि, इस संशोधन के बावजूद, स्वतंत्र कमेटी को मंदिर का प्रभार सौंपने में विफलता रही।
स्वतंत्र कमेटी की निष्क्रियता: उच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, स्वतंत्र कमेटी को मंदिर का प्रभार नहीं सौंपा गया। कमेटी में शामिल कुछ सदस्य, जैसे तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष मार्तंड त्रिपाठी, पूर्व अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र श्रीवास्तव, तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक, और जिला संग्रहालय के उपसंचालक, कथित तौर पर राजनीतिक दबाव के कारण सक्रिय नहीं हो सके। अन्य सदस्यों, जैसे चंद्रशेखर त्रिपाठी, राजेश्वर उदानिया, और रमेश त्रिपाठी, ने प्रयास किए, लेकिन रोहिणीश्वर प्रपन्नाचार्य, लव कुश पांडे, और उनकी शिष्य मंडली के प्रभाव के कारण कमेटी को नियंत्रण नहीं मिल सका।
भ्रष्टाचार और अवैध कब्जे के आरोप:
अवैध कब्जा: लव कुश पांडे पर आरोप है कि उन्होंने उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करते हुए मंदिर का संपूर्ण प्रभार अपने नियंत्रण में रखा। उन्होंने मंदिर की संपत्ति, विशेष रूप से खसरा नंबर 138 कि 33 डिसमिल जमीन, जिसे आरजी (रघुराज स्कूल ग्राउंड के पास) के नाम से जाना जाता है, पर अवैध कब्जा कर लिया। इस जमीन पर एक फर्जी संस्था (चित्रकूट की संस्था) के नाम पर कब्जा किया गया, और लव कुश पांडे अपने पुत्र के साथ वहां रहने लगे। इस जमीन को बारातघर के रूप में किराए पर देकर लाखों रुपये की वसूली की गई, जो कथित तौर पर उनके संरक्षक नेताओं के साथ बांट दी गई।
मंदिर संपत्ति का दुरुपयोग: मंदिर भवन में मनमाने परिवर्तन किए गए, और किराए के मकानों में बदलाव कर संपत्ति का दुरुपयोग किया गया। स्रोत तालाब, जो शहडोल का महत्वपूर्ण तालाब था, अब बदबूदार और गंदा हो चुका है।
स्थगन आदेश की अवहेलना: स्वतंत्र कमेटी के सदस्य रमेश त्रिपाठी द्वारा इस मामले को तहसीलदार के समक्ष उठाया गया, जिसके परिणामस्वरूप 20 मार्च 2018 को स्थगन आदेश पारित हुआ। हालांकि, सत्ताधारी नेताओं और लव कुश पांडे के दबाव में यह प्रकरण दबा दिया गया, और स्थगन आदेश का पालन नहीं हुआ। यह मामला आज भी तहसीलदार के समक्ष लंबित है।
राजनीतिक दबाव और प्रशासन की निष्क्रियता:
स्थानीय प्रशासन, विशेष रूप से सोहागपुर के अधिकारियों, ने बार-बार पत्र लिखकर लव कुश पांडे को मंदिर से हटाने का निर्देश दिया, लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े प्रभावशाली नेताओं ने कथित तौर पर स्वतंत्र कमेटी को निष्क्रिय बनाए रखा और लव कुश पांडे को संरक्षण प्रदान किया। इस संरक्षण के कारण मंदिर ट्रस्ट की करोड़ों रुपये की संपत्ति का दुरुपयोग हुआ और कोई जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई।
वर्तमान स्थिति: पिछले 13 वर्षों से मोहन राम मंदिर ट्रस्ट में अतिक्रमण, भ्रष्टाचार, और अवैध कब्जे की गतिविधियां जारी हैं। उच्च न्यायालय के दो स्पष्ट आदेशों (प्रकरण 177/12 और 895/12) के बावजूद, लव कुश पांडे और उनके सहयोगियों ने मंदिर की संपत्ति पर कब्जा बनाए रखा। स्वतंत्र कमेटी को मंदिर का प्रबंधन सौंपने में विफलता, स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता, और राजनीतिक संरक्षण ने इस मामले को और जटिल बना दिया है। स्रोत तालाब की दुर्दशा और मंदिर की जमीन पर अवैध कब्जे ने स्थानीय समुदाय की आस्था और मंदिर की गरिमा को गंभीर क्षति पहुंचाई है।
मोहन राम मंदिर ट्रस्ट का मामला मध्य प्रदेश में धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। उच्च न्यायालय के आदेशों की अवमानना और राजनीतिक हस्तक्षेप ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है।और उच्च न्यायालय के आदेशों का कड़ाई से पालन: स्वतंत्र कमेटी को तत्काल मंदिर का प्रभार सौंपा जाए, और लव कुश पांडे व सहयोगियों के अवैध कब्जे को हटा राजनीतिक हस्तक्षेप पर रोक: प्रशासन को राजनीतिक दबाव से मुक्त कर उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाए।संपत्ति की रक्षा: मंदिर की जमीन (खसरा नंबर 138) और अन्य संपत्तियों का पुनर्मूल्यांकन और संरक्षण किया जाए।
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