प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् : शहडोल में पारदर्शी-नामकरण-भ्रष्टाचार, डकैती बड़ी या चोरी…?

प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्: पारदर्शी-भ्रष्टाचार में चोरी बड़ी या डकैती?
शहडोल का पोंडा नाला का वह चर्चित रास्ता जो सिंहपुर रोड की ओर जाता है इसी को लेकर घमासान है इसे ठीक करने के लिए नहीं बल्कि इस सड़क पर नामकरण को लेकर भाजपा पक्ष के नगर पालिका परिषद सीएमओ का कहना है नामकरण अवैध है क्योंकि वह कांग्रेस की पूर्ण स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दीनदयाल गुप्ता के नाम पर कांग्रेसियों ने जबरदस्ती कर दिया हैशहडोल की सड़कों पर नामकरण की महाभारत छिड़ी है, और हम सब दर्शक बनकर तमाशा देख रहे हैं। एक तरफ भाजपा के ट्रेडमार्क वाले नेता, जिनका शहडोल से रिश्ता उतना ही गहरा है जितना नागपुर के मसाले का मध्य प्रदेश के बिरयानी से, और दूसरी तरफ कांग्रेस के स्थानीय आइकॉन, जिन्हें नाम देने की कोशिश की जाती है तो अचानक नियम-कानून की किताबें खुल जाती हैं। सवाल ये है कि जब सत्ता में बैठे लोग पूरे जिले को अपने ‘अभिभावकों’ के नाम से सजा देते हैं, तो वो डकैती है या पारदर्शी विकास? और जब विपक्ष थोड़ी-सी चोरी करने की कोशिश करता है, तो वो अपराध कैसे हो जाता है?
शुरुआत करते हैं शहडोल जिला अस्पताल से, जो अचानक ‘कुशाभाऊ ठाकरे जिला चिकित्सालय’ बन गया। कुशाभाऊ जी का योगदान? खैर, वो RSS से थे, भाजपा से थे, और शायद मध्य प्रदेश को अपनी प्रयोगशाला मानते थे। लेकिन शहडोल से उनका क्या लेना-देना? क्या उन्होंने कभी यहां की सड़कों पर घूमकर मरीजों का हालचाल पूछा? नहीं न? फिर भी नाम चिपका दिया गया, जैसे कोई बच्चा दीवार पर अपना नाम लिखकर अमर हो जाता है। और शहडोल वाले? तो आदिवासी प्रकृति के लोग हैं, सोचते हैं, “नाम लिखकर क्या उखाड़ लोगे?” बिरसा मुंडा मेडिकल कॉलेज का नाम भी आयातित है, स्थानीय दलपत सिंह या दलबीर सिंह को कौन पूछे? वो तो विरासत में हैं, लेकिन विरासत को थोपने का काम तो सिर्फ सत्ता वाले करते हैं।अब जब एक्सीडेंटल ही सही नगर पालिका परिषद शहडोल में कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष है तो उसे भी अपने स्थानीय आइकान के नाम पर सड़क या चौराहे या गली का नामकरण लूटने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए शायद इसी अघोषित नियमावली में शहडोल के पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दीनदयाल गुप्ता का नाम पर उनके चाहने वालों ने जिनमें उनके पुत्र सुभाष गुप्ता भी शामिल हैं के प्रयास से एक कार्यक्रम के जरिए सिंहपुर तिराहा से लेकर पंडा नाला तक सड़क का नाम धूमधाम से विधायक फुंदेलाल और और पालिका अध्यक्ष घनश्याम जायसवाल की उपस्थिति में घोषित कर दिया गया। चुकी अपन को बुलाया नहीं गया था इसलिए हम नहीं जानते कि यह कितना भव्य कार्यक्रम रहा लेकिन जो भी रहा उसे कार्यक्रम से नामकरण की लूट वालों को इस सड़क नाम को दीनदयाल के नाम पर नाम करण कर दिए जाने पर आभास हुआ कि यहतो चोरी है और अपनी प्रभु सत्ता का दबाव बनाकर इसआशय की सही कलेक्टर शहडोल से जरिया नगर पालिका अधिकारी बुंदेला के करवा दी गई कि वह अवैध है
तोक्या फर्क पड़ता अगर हमारा आदर्श चोरी छिपे भी स्थापित हो जाता है तो क्यों परेशानी होनी चाहिए जब आप डकैती डाल रहे थे

अब देखिए भाजपा का कमाल। उनके शासन में चौराहों की लॉटरी लगी—हर चौराहा एक ट्रेडमार्क नेता के नाम। स्थानीय आइकॉन में लल्लू सिंह की मूर्ति बुड़ार रोड पर लगी,वीर सैनिक देवेंद्र सोनी की कॉलेज और सब्जी मंडी में। पंडित शंभूनाथ शुक्ला को तो तीन-तीन जगह मिलीं—कॉलेज, कलेक्ट्रेट, विश्वविद्यालय। कृष्णपाल सिंह को कन्या महाविद्यालय में, शायद भाई प्राचार्य थे तो स्पेशल एंट्री। लेकिन स्थानीय आइकॉन? वो तो विकास की धारा में बह गए। भाजपा का मंत्र: “सौ बार नाम थोपो, तो वो सच बन जाएगा।” ये लूट है, लेकिन पारदर्शी लूट—क्योंकि सबके सामने हो रही है। जैसे इलेक्टोरल बांड: कानून बनाकरडकैती डालो, हजारों करोड़ इकट्ठा करो, और सुप्रीम कोर्ट कहे अवैध तो भी पैसे रख लो। क्या जप्त हुए? नहीं, यही तो पारदर्शी भ्रष्टाचार की खूबसूरती है—जिसकी लाठी, उसकी भैंस।
और अब कांग्रेस की बारी। एक्सीडेंटल ही सही, नगर पालिका परिषद में उनका अध्यक्ष है—घनश्याम जायसवाल। तो उन्होंने क्या किया? पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दीनदयाल गुप्ता के नाम पर सिंहपुर तिराहा से पंडा नाला तक की सड़क का नामकरण। धूमधाम से, विधायक फुंदेलाल की मौजूदगी में। लेकिन ओहो! ये तो चोरी है! कलेक्टर साहब से नगर पालिका अधिकारी बुंदेला नेकह कि ये अवैध है। क्यों? क्योंकि ये सहमति से नहीं, या शायद क्योंकि ये विपक्ष की तरफ से है। जब भाजपा डकैती डाल रही थी, तो कांग्रेस को परेशानी नहीं थी? अरे भाई, तब तो वो विपक्ष में थे, अब सत्ता की थोड़ी-सी चखनी मिली तो चोरी क्यों….? क्या फर्क पड़ता अगर चोरी-छिपे ही सही, दीनदयाल जी की स्मृति अमर हो जाती…?
सोचिए, मोहन राम मंदिर कैंपस में पीपल के पेड़ के नीचे नामकरण हुआ, तो पेड़ सूख गया।
शायद नामों की लूट से प्रकृति भी थक गई। लेकिन दीनदयाल गुप्ता की सड़क से क्या हर्ज? उनकी स्मृतियां बनी रहेंगी, और ये साबित होगा कि कांग्रेस ने भी थोड़ी-सी ‘लूट’ की हिस्सेदारी ली। लेकिन नहीं, नगर पालिका अधिकारी कलेक्टर से शिकायत कर रहा है कि अध्यक्ष ने सड़क चुरा ली। अरे वाह! जब आप स्थानीय महापुरुषों को दफनाकर अपने ट्रेडमार्क थोप रहे हैं, तो विपक्ष को एक सड़क भी नहीं मिलनी चाहिए? शहडोल आदिवासी क्षेत्र है, तो क्या हम सिर्फ जूठन पर जीएं? नामकरण के धंधे में डकैती आपकी, चोरी हमारी नहीं…?—ये कहां का न्याय?राहुल गांधी कहते हैं, “वोट चोर—गद्दी छोड़” तो शहडोल वाले सपने में ही सही, जाग गए और एक सड़क चुरा ली। हंगामा क्यों? चोरी तो नहीं की,डकैती तो नहीं डाली, थोड़ी-सी पी ली है… जैसे देश में इलेक्टोरल बांड की पी ली गई।
सवाल ये है: पारदर्शी भ्रष्टाचार में चोरी बड़ी या डकैती? ऐसा नहीं है कि शहडोल में उसकी विकास के सरोकारों से जुड़े अन्य कई नाम नहीं है सबसे पहले शहडोल के मोहन राम मंदिर के निर्माता जिसमें आधा बाजार लगता है जिसमें उनके नामकरण पर एक भी सड़क नहीं है जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं कुंवर मृगेंद्र सिंह ,प्रेम जी निगम, ददन राम गुप्ता, भोलाराम गर्ग जिनके हम यदाकदा शहडोल की पहचान में नाम लेते हैं जिला व क्षेत्र स्टार के आदिवासी नेताओं की भी एक पहचान है जिसमें दलवीर सिंह दलपत सिंह परस्ते श्रीमती राजेश नंदिनी ने भी शहडोल का अहम नेतृत्व किया है उन्हें भी शहडोल की सड़कों में नाम नहीं दिया गया बल्कि ज्यादा से ज्यादा बाहरी आयात किए गए तथाकथित राष्ट्रीय नेताओं की संज्ञा में नवाजा गया हाल में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पुरुषोत्तम प्रसाद मिश्रा जिन्होंने पूरा जीवन शहडोल में बच्चों को पढ़ाने में उन्हें अनुशासन वध्द रखने में समर्पित किया उनके योगदान को भी हम नकार गए। क्योंकि हम अवसर धारी स्वार्थी राजनेता है और नामकरण का धंधा हमारे स्वार्थ के आधार पर टिका है किसी नैतिकता व न्याय के आधार पर नहीं, किसी प्रेरणा के आधार पर नहीं….. इसीलिए हम नामकरण की चोरी पर या फिर डकैती पर विश्वास रखते हैं और कोई बात नहीं है..जवाब साफ है—जब सत्ता वाली डकैती हो, तो वो विकास है; विपक्ष की चोरी हो, तो अपराध….प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्: पारदर्शी-भ्रष्टाचार में चोरी बड़ी या डकैती?सब कुछ आंखों के सामने है, बस देखने वाला चाहिए। शहडोल की सड़कों पर नामों की ये जंग जारी रहेगी…
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