नेपाल के क्रांतिकारियों को 10 लख रुपए और सहीद का दर्जा भारत में किसान क्रांतिकारियों को क्या मिला…? ( त्रिलोकी नाथ )

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नेपाल के क्रांतिकारियों को 10 लख रुपए और सहीद का दर्जा भारत में किसान क्रांतिकारियों को क्या मिला…?
नेपाल, हिमालय की गोद में बसा यह छोटा सा देश, राजनीति में हिंदू राष्ट्र की अवधारणा, लोकतंत्र की चुनौतियां और सामाजिक परिवर्तन की लहरें हमेशा से चर्चा का विषय बनी रहीं। लेकिन हाल ही में नेपाल में हुई खूनी क्रांति ने न केवल इस देश की राजनीतिक संरचना को हिला दिया है, बल्कि पड़ोसी भारत के लिए भी कई महत्वपूर्ण सबक छोड़े हैं। इस क्रांति के बाद सत्ता संभालने वाली अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की का उदय एक प्रतीक है—एक ऐसी नेता जो न केवल राजनीतिक क्षेत्र से जुड़ी हैं, बल्कि उनकी पृष्ठभूमि पूर्व न्यायाधीश, महिला सशक्तिकरण की प्रतीक और हिंदू राष्ट्र की स्वाभाविक प्रतिनिधि के रूप में उभरती है।
—————————( त्रिलोकी नाथ )————————-

एक महिला होने के नाते, वे नेपाल के पुरुष-प्रधान राजनीतिक परिदृश्य में लैंगिक समानता की मशाल जलाती हैं। लेकिन सबसे रोचक पहलू उनकी हिंदू राष्ट्र की प्रतिनिधित्व है। नेपाल में कभी हिंदू राष्ट्र के रूप में जाना जाने वाला यह देश, 2008 में प्रजातंत्र की स्थापना के बाद धर्मनिरपेक्ष हो गया। फिर भी, कार्की का उदय उस काल्पनिक हिंदू राष्ट्र की भावना को जीवंत करता है, जो भारत के हिंदूवादी संगठनों—जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)—की कल्पनाओं से प्रेरित लगती है।
कार्की का नेतृत्व ऐसे समय में आया है जब नेपाल प्रजातंत्र की आड़ में भ्रष्टाचार, अपारदर्शिता और दमनकारी नीतियों के दलदल में फंस चुका था। नेपाल राष्ट्र प्रजातंत्रके बचपन से ही चली आ रही ये समस्याएं—बेरोजगारी, युवाओं का पलायन और आर्थिक असमानता—ने देश को एक गहरे संकट में डाल दिया था। ऐसे में, युवा वर्ग ने ‘जेन जी’ नामक आंदोलन के माध्यम से विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। यह आंदोलन केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शनों तक सीमित न रहा; यह खूनी क्रांति में बदल गया, जिसमें कई जानें गईं। इस क्रांति ने सत्ता के पुराने भ्रष्ट तानाशाह और कानून को अपने उंगली में नाचने वालेढांचे को उखाड़ फेंका और सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में आगे लाया।
जेन जी क्रांति: परिवर्तन का खूनी सफर
जेन जी आंदोलन नेपाल के युवाओं की निराशा का प्रतिबिंब था। भ्रष्टाचारपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन तेजी से फैला और हिंसक रूप धारण कर लिया। क्रांतिकारियों ने लक्ष्य प्राप्ति के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी, जिसके परिणामस्वरूप सत्ता परिवर्तन हुआ। कार्की के नेतृत्व में नई सरकार ने अपनी पहली बड़ी घोषणा में इस क्रांति के शहीदों को सम्मान दिया। मृतकों को ‘क्रांतिकारी’ का दर्जा देकर ‘शहीद’ घोषित किया गया और प्रत्येक शहीद परिवार को 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता की पेशकश की गई। यह कदम न केवल क्रांति की स्मृति को जीवित रखता है, बल्कि भविष्य की राजनीति को सुचिता की दिशा में मोड़ने का संकेत भी देता है।
नेपाल में अगले छह महीनों में आम चुनाव होने हैं, तब तक कार्की का अंतरिम नेतृत्व जेन जी आंदोलन और जनता की आशाओं को पूरा करने का दायित्व संभालेगा। यह परिवर्तन नेपाल को एक नई दिशा दे सकता है, जहां लोकतंत्र केवल नाम का न हो, बल्कि वास्तविक हो। लेकिन सवाल यह उठता है कि इस खूनी क्रांति का भारत पर क्या असर पड़ेगा?

भारत-नेपाल संबंध: हिंदुत्व से आगे की सोच

भारत और नेपाल के संबंध सदियों पुराने हैं—धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से गहरे जुड़े हुए। लुम्बिनी से लेकर जनकपुर तक, दोनों देशों की साझा विरासत हिंदू और बौद्ध परंपराओं में बसी है। वर्तमान भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार और उसके मूल संगठन आरएसएस ने हमेशा हिंदुत्व को इस संबंध का आधार बनाया है। नेपाल का हिंदू राष्ट्र का इतिहास भी इसी कथित ‘काल्पनिक’ हिंदुत्व से जुड़ता दिखता है। लेकिन नेपाल की यह क्रांति भारत के लिए एक आईना है। यहां खूनी परिवर्तन हुआ, लेकिन भारत में परिवर्तन शांतिपूर्ण तरीके से भी संभव है।
भारत के संदर्भ में देखें तो डेढ़ साल से ज्यादा चला महान किसान आंदोलन इसका जीता-जागता उदाहरण है। 2020-2021 में शुरू हुए इस आंदोलन में किसानों ने कृषि कानूनों के खिलाफ शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन किया। आर्थिक साम्राज्यवाद और कॉर्पोरेट हितों के विरुद्ध यह एक लोकतांत्रिक क्रांति थी। दुर्भाग्य से, इस दौरान करीब 700 किसान परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया—ठंड, बीमारी और दुर्घटनाओं के कारण। अंततः सरकार को झुकना पड़ा और कानून वापस लेने पड़े। लेकिन क्या यह सरकार नेपाल से सीख लेगी?

भारत के किसान आंदोलन: शहीदों की अनदेखी क्यों?

नेपाल में शहीदों को आर्थिक सहायता देकर सरकार ने संवेदनशीलता दिखाई, भले ही क्रांति खूनी रही। भारत में किसान आंदोलन शांतिपूर्ण था, फिर भी सरकार ने शहीद का दर्जा देने या आर्थिक सहायता प्रदान करने में अपनी तानाशाही टालमटोल किया। तथाकथित काल्पनिक हिंदुत्व की सोच वाली यह सरकार, जो नेपाल के हिंदू राष्ट्र को समर्थन देती रही है, क्या अपने किसानों के प्रति उतनी ही उदारता दिखाएगी?

किसानों ने लोकतंत्र की रक्षा की

आंदोलन के माध्यम से सरकार को जवाबदेह बनाया। उन्हें शहीद का दर्जा न सही, लेकिन उचित आर्थिक सहायता—जैसे मुआवजा या पेंशन—देना न केवल न्यायोचित होगा, बल्कि किसान परिवारों और संगठनों की आशाओं पर खरा उतरना भी होगा।यह सहायता भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण बनेगी। यह दिखाएगी कि भारत शांतिपूर्ण आंदोलनों में हुई दुर्घटनाओं के प्रति संवेदनशील है, न कि केवल दमनकारी। नेपाल की क्रांति से भारत को यही सीख लेनी चाहिए—परिवर्तन हो या विद्रोह, मानवीय मूल्य सर्वोपरि हैं।
साझा विरासत, साझा जिम्मेदारी
नेपाल की जेन जी क्रांति और सुशीला कार्की का नेतृत्व एक नई शुरुआत का संकेत है। भारत, जो नेपाल का बड़ा भाई होने का दावा करता है, को इस परिवर्तन से प्रेरणा लेनी चाहिए। हिंदुत्व से आगे बढ़कर, दोनों देशों को सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता पर ध्यान केंद्रित करना होगा। भारतीय किसान आंदोलन के शहीदों को सम्मान देना न केवल नैतिक कर्तव्य है, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम भी। यदि भारत नेपाल से यह सीख ले ले, तो हिमालय के दोनों ओर शांति और समृद्धि का नया युग शुरू हो सकता है।यही वह समय है जब किसान क्रांति के शहीदों को सम्मान देकर पता करें हिंदुत्व वाली यह कॉर्पोरेट सरकार न सिर्फ अपना प्रायश्चित करें बल्कि अपनी संवेदनशीलता प्रकट करके स्वयं को लोकतंत्र से जोड़े लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएगी अगर उसकी मानसिक पवित्रता होगी तो निश्चित तौर पर सरकार अपनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन करेगी यह भी एक अवसर है।


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