
छठ पर्व के जल स्रोत: दिल्ली से शहडोल तक – उपयोग और उपेक्षा का दंभ
छठ पर्व, उत्तर भारत की लोक परंपराओं का एक पवित्र उत्सव, जहां सूर्योपासना और जल स्रोतों की शुद्धता पर आधारित आस्था हजारों श्रद्धालुओं को एकत्रित करती है। नदियां, तालाब और घाट इस पर्व के केंद्र में होते हैं, जहां लोग अर्घ्य देकर प्रकृति से जुड़ते हैं। किंतु आज यह पर्व राजनीतिक दंभ और प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार बनता दिख रहा है। दिल्ली के वासुदेव घाट पर यमुना की कथित शुद्धि से लेकर शहडोल के मोहन राम तालाब की दोमुंही स्थिति तक, जल स्रोतों को मात्र ‘उपयोग और फेंक दो’ की नीति से देखा जा रहा है। यह न केवल पर्यावरणीय संकट को उजागर करता है, बल्कि जनता की आस्था के साथ छल को भी सामने लाता है।
दिल्ली का यमुना प्रपंच: गंगा का पानी और शुद्धि का भ्रम
दिल्ली में यमुना नदी प्रदूषण का पर्याय बन चुकी है। फिर भी, छठ पर्व के दौरान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की सरकार यमुना को शुद्ध बताने का दावा करती है। वासुदेव घाट पर यमुना के किनारे अलग से कुंड बनाकर गंगा का पानी पाइपलाइन से लाया जाता है। यह पानी सीधे कुंड में डाला जाता है, ताकि श्रद्धालु यमुना को शुद्ध मानकर अर्घ्य दें। लेकिन सच्चाई क्या है? यमुना का मुख्य जल प्रवाह आज भी अति प्रदूषित है – औद्योगिक कचरा, सीवेज और रासायनिक अपशिष्ट से भरा हुआ। गंगा का पानी लाकर कुंड बनाना मात्र एक दिखावा है, जो जनता में भ्रम फैलाता है।आम आदमी पार्टी ने इस पर तीखा प्रहार किया है। उनके अनुसार, यह सरकार की झूठी श्रद्धा है। अलग-अलग वीडियो जारी कर साबित किया गया कि कुंड के बाहर यमुना का पानी पीने लायक नहीं। यदि यह भ्रम फैलता रहा, तो आम जनता प्रदूषित जल ग्रहण कर सकती है, जिससे स्वास्थ्य संकट – जैसे जलजनित रोग, त्वचा संक्रमण और दीर्घकालिक विषाक्तता – पैदा हो सकती है। छठ जैसे पर्व में जल स्रोत परंपरा का हिस्सा हैं, न कि राजनीतिक प्रोपगैंडा का। यमुना की सफाई का दंभ भरने वाली सरकार असल में नदी को बचाने के बजाय अस्थायी कुंडों से काम चला रही है। यह उपयोगिता की नीति है – पर्व के लिए साफ पानी, बाकी समय उपेक्षा।
शहडोल का मोहन राम तालाब:
विभाजन, प्रदूषण और न्यायालयीय अवमानना
शहडोल की स्थिति और भी जटिल है। मोहन राम मंदिर का तालाब, जो छठ पर्व का प्रमुख केंद्र है, दो टुकड़ों में बांट दिया गया है। मुख्य तालाब को ‘मॉडल’ बनाकर दिखावा किया जाता है, जहां शहर का पेयजल डालकर उसे भर दिया जाता है। लेकिन इससे जुड़ा जल स्रोत तालाब अत्यधिक प्रदूषित और बदबूदार बना हुआ है। शहर का गंदा पानी इसी में बहता है, जिससे मुख्य तालाब भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है।
इसकी जड़ में निजी भूमि और ट्रस्ट का विवाद है। ट्रस्ट द्वारा संचालित यह संपत्ति उच्च न्यायालय में लंबित है। 2012 के एक फैसले में स्वतंत्र कमेटी गठित कर प्रबंधन सौंपने के आदेश दिए गए थे, लेकिन जिला प्रशासन ने आज तक पालन नहीं किया। कारण स्पष्ट है – भारतीय जनता पार्टी से जुड़े प्रभावशाली लोग नहीं चाहते कि आदेश लागू हो। कमेटी के अभाव में सफाई कौन करेगा? स्थानीय नेता और मंत्री हर अवसर पर इस तालाब को मॉडल बताते हैं, लेकिन संरक्षण के लिए न्यायालयीय निर्देश की अनदेखी करते हैं।
मान्यता है कि आदेश पालन से भाजपा समर्थित कब्जाधारियों का नियंत्रण खत्म हो जाएगा। करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार – अवैध निर्माण, भूमि हड़प और रखरखाव में अनियमितता – की पोल खुल जाएगी। परिणामस्वरूप, प्रदूषित स्रोत तालाब अन-touch बना रहता है, जबकि मुख्य तालाब पर छठ का दिखावा चलता है। यह दोहरी नीति है – एक हिस्सा चमकदार, दूसरा सड़ता हुआ।
उपयोग और फेंक दो: जल स्रोतों की राजनीतिक दुर्दशा
दिल्ली से शहडोल तक का पैटर्न एक जैसा है। जल स्रोतों को पर्व के लिए सजाया जाता है, लेकिन वर्ष भर उपेक्षित रखा जाता है। यमुना में गंगा का पानी लाकर कुंड बनाना या शहडोल में तालाब विभाजित कर एक हिस्से को चमकाना – दोनों में आस्था का व्यापारीकरण है। छठ पर्व आम जनता की श्रद्धा पर टिका है, जहां जल शुद्धता जीवन का प्रतीक है। लेकिन राजनीतिक दल इसे वोट बैंक का औजार बना रहे हैं।
पर्यावरणीय दृष्टि से यह घातक है। प्रदूषित जल से स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं, जैव विविधता नष्ट होती है। न्यायालयीय आदेशों की अवहेलना लोकतंत्र की अवमानना है। समाधान क्या? स्थायी सफाई योजनाएं, स्वतंत्र निगरानी और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त प्रबंधन। छठ को सच्ची श्रद्धा से मनाने के लिए जल स्रोतों को बचाना होगा, न कि उन्हें अस्थायी मेकअप से धोखा देना।
अंत में, यह पर्व हमें याद दिलाता है कि प्रकृति और आस्था अविभाज्य हैं। उपयोग और फेंक दो की नीति से बचकर ही हम सूर्य देव को सच्चा अर्घ्य दे पाएंगे। अन्यथा, दिल्ली की यमुना और शहडोल का तालाब दोनों ‘नकली शुद्धि’ के प्रतीक बनकर रह जाएंगे।

