चंद्रशेखर त्रिपाठी: शहडोल की पुरानी पत्रकारिता के अंतिम योद्धा

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 चंद्रशेखर त्रिपाठी: शहडोल की पुरानी पत्रकारिता के अंतिम योद्धा

शहडोल, मध्य प्रदेश का यह आदिवासी बहुल क्षेत्र, प्रकृति की गोद में बसा एक ऐसा इलाका है जहाँ घने जंगल, झरने और पहाड़ों की सौंदर्यता विकास की राह पर चलते हुए भी अपनी मूल पहचान बनाए हुए है। इसी क्षेत्र के विकास के प्रवक्ता और पुरानी पत्रकारिता की पीढ़ी के अंतिम स्तंभ थे चंद्रशेखर त्रिपाठी। वे न केवल एक पत्रकार थे, बल्कि स्थानीय जागरूकता की संवेदना से लबरेज़ कलम के धनी थे, जिन्होंने शहडोल को विकसित होते देखा और उसके प्राकृतिक सौंदर्य को संरक्षित रखने की वकालत की। उनकी कलम ने राजनीतिक चेतना को सतर्क रखा, और आज जब पत्रकारिता का स्वरूप बदल चुका है, उनकी याद हमें उस युग की याद दिलाती है जो अब बीत चुका है।
त्रिपाठी जी ने अपनी पत्रकारिता से ‘समय’ अखबार को ‘शहडोल का समय’ बना दिया। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी। उस दौर में जब मीडिया मुख्यधारा से दूर क्षेत्रों में सीमित संसाधनों में काम करता था, उन्होंने स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय पटल पर लाने का प्रयास किया। शहडोल के आदिवासी समुदाय की समस्याएँ, विकास की चुनौतियाँ और पर्यावरण संरक्षण – ये सब उनकी रिपोर्टिंग के केंद्र में रहे। उनकी पत्रकारिता में संवेदना थी, जो आज की तेज़ रफ्तार डिजिटल मीडिया में दुर्लभ हो चुकी है।
एक रोचक दृष्टांत मुझे विधायक शबनम मौसी का स्मरण कराता है। जब चंद्रशेखर जी उनके आवास पर पहुँचे, तो बैठने में थोड़ी झिझक दिखाई। शबनम मौसी, जो खुद एक अनूठी शख्सियत थीं, हँसते हुए बोलीं, “एक उम्र बाद हम और आप में कोई अंतर नहीं रह जाता, इसलिए शट कर बैठिए।” यह बात सबको हँसा गई। उसी मुलाकात में शबनम मौसी ने पत्रकार भवन के लिए 50,000 रुपये देने की घोषणा की। दिया या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन यह घटना त्रिपाठी जी की पहुंच और सम्मान को दर्शाती है।  वे ऐसे पत्रकार थे जो समाज के हर वर्ग से जुड़ते थे, बिना किसी भेदभाव के।
उस युग में पत्रकारिता की पीढ़ी समाप्त हो गई जो राजनीतिक चेतना को जागृत रखती थी। युवा पीढ़ी के रूप में मेरा उनसे स्वाभाविक विरोध रहा, क्योंकि नई सोच और पुरानी परंपराएँ अक्सर टकराती हैं। कई मामलों में हम एकमत नहीं होते थे, फिर भी मैं उनसे काफी कुछ सीखता रहा। अंतिम दिनों में जब मोहन राम मंदिर की स्वतंत्र कमेटी में उनकी भूमिका सफल नहीं रही, तो मैंने उनसे निवेदन किया कि वे इस्तीफा दे दें। वे मुझसे सहमत हो गए। मेरी सोच थी कि प्रशासनिक असफलता का कलंक उनके साथ क्यों जाए? यह उनकी उदारता और विनम्रता का प्रमाण था।
उस दौर में पत्रकारों को अभिमान्यता (मान्यता) देने का मुख्यालय रीवा था, इसलिए शहडोल की उस पीढ़ी से जुड़े अधिकांश लोगों को इसका लाभ नहीं मिला। जिन्हें मिला, उनमें त्रिपाठी जी एक थे। भछावत वेतन आयोग का लाभ शहडोल के अखबारों को नहीं मिलता था, और अब तो मिलना ही बंद हो गया है, क्योंकि गुलामी की आड़ में आउटसोर्सिंग का नकाब पहन लिया गया है। पत्रकारिता अब स्वतंत्र नहीं रही; यह कॉर्पोरेट और राजनीतिक दबावों की शिकार हो चुकी है।
चंद्रशेखर त्रिपाठी जी का योगदान शहडोल की पत्रकारिता के इतिहास में हमेशा स्मरण किया जाएगा। वे उस पीढ़ी के प्रतीक थे जो कलम से समाज को दिशा देती थी, न कि सिर्फ खबरें बेचती थी। उनकी कमी आज खलती है, जब स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मीडिया की चकाचौंध में गुम हो जाते हैं।
आदरणीय त्रिपाठी जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। आपकी कलम की स्याही शहडोल की मिट्टी में हमेशा बसी रहेगी।


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