हंगामा है क्यों बरपा? एंकराओं को धोबी पछाड़ —( त्रिलोकी नाथ )–

“हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है…”
ग़ालिब का यह शेर आजकल हमारे राष्ट्रीय चरित्र का सबसे सटीक आईना बन गया है। चोरी नहीं की, डाका नहीं डाला, बस थोड़ी-थोड़ी सी लूट, थोड़ा-सा ध्रुवीकरण, थोड़ा-सा संविधान का मखौल, थोड़ी सी दलित-नेताओं की बेइज्जती और ढेर सारा कॉरपोरेट-राजनेता-अफसर गठजोड़ चला रहे हैं। फिर भी हंगामा क्यों?पश्चिम बंगाल में अचानक “बाबरी मस्जिद” का नया संस्करण उग आया है। कोई हुमायूं नाम का शख्स ईंटें जमा कर रहा है, नींव रख रहा है। तीन दशक पुरानी यादें ताज़ा करने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है? एक तरफ हिंदुत्व की सेना चिल्ल-पों मचा रही है, दूसरी तरफ मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए ओवैसी साहब को हैदराबाद में “बाबरी स्मृति संग्रहालय” खोलने की सूझी है। दोनों तरफ का धंधा एक ही है – नफरत बेचो, वोट काटो। बीच में टीवी चैनल वाले मजे ले रहे हैं। पुतिन ने उनकी दो-चार एंकरों को “असभ्य” कहकर धोबी-पछाड़ दे मारा, तो अब घर लौटकर उन्हें सांप्रदायित्व निभाना है – देश को दिन-रात सांप्रदायिक आग में झोंकना।
इसी आड़ में चप्पल छाप हवाई यात्रियों का शोषण चल रहा है। इंडिगो वाले पहले सपना बेचते हैं – “अब हर भारतीय उड़ेगा”, फिर कर्मचारियों को गुलाम बनाकर रखते हैं। हड़ताल हुई, चार दिन सड़कें जाम हुईं, फिर सब शांत। क्योंकि असली लक्ष्य तो ममता बनर्जी की कुर्सी हिलाना है। बाबरी-दो का नया नाटक उसी स्क्रिप्ट का हिस्सा है। ओवैसी अगर पूरा ध्रुवीकरण नहीं कर पा रहे थे, तो नया ठेकेदार नियुक्त कर दिया गया। बंगाल की धरती पर हिंदू-मुस्लिम के नाम पर फिर लहूलुहान होने को तैयार है, और हम सब पोस्टर देखकर ही ताली पीट रहे हैं।
दिल्ली में राष्ट्रपति भवन का न्योता भी बड़ा दिलचस्प खेल चल रहा है। राहुली। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को बुलाया ही नहीं गया। कारण? फोटो में अगर पुतिन के बगल में कोई दलित चेहरा या “शहजादा” आ गया तो हिंदुत्व की दुकान पर ग्रहण लग सकता है। अपमान का बाजार गर्म करना है, चप्पल छाप जनता को गुस्सा दिलाना है, ताकि असली लूट की खबरें दब जाएं।
तीन दशक बाद फिर से वही सांप्रदायिकता की गंध आने लगी है वही बाबरी मस्जिद इस बार पश्चिम बंगाल में ठीक उसी तरह ईंटें इकट्ठा करके बनाने के लिए किसी हुमायूं ने नींव रख दी है ठीक उसी तरह हिंदुत्व का चेहरा पश्चिम बंगाल में चिल्ल पों कर रहा है उमा भारती इस बार नहीं है लक्ष्य ममता दीदी की कुर्सी को हिलाना है कई आयाम तय कर दिए गए हैं उसमें बाबरी मस्जिद नामक नौटंकी एक नया आयाम है। मुस्लिम सांप्रदायिक ध्रुवी करण का धंधा हो और ओवैसी पिक्चर से बाहर हूं पिक्चरपूरी नहीं होती इसलिए हैदराबाद में भी एक नई नौटंकी खोली जा रही है नाम है बाबरी मस्जिद स्मारक मेंइस स्मृतियों का भंडार रखा जाएगा ताकि हिंदुत्व के साथ मुस्लिम तुष्टीकरण के धंधे को बरकरार रखा जाए टीवी चैनल वालों को भी रोजगार चाहिए क्योंकि राष्ट्रपति पुतिन ने उनके राष्ट्रीय टीवी चैनल की एंकराओं को धोबी पछाड़ तरीके से पटक दिया यह कहकर की असभ्य प्रश्न का उत्तर नहीं देंगे। इसलिए टीवी चैनल को सांप्रदायिकता की न्यूज़ का नया रोजगार मिल गया है।
चप्पल छाप भारतीय नागरिकों को हवाई यात्रा की सैर करने का ख्वाब दिखाने के बाद इंडिगो के मालिकों ने अपने नौकरों को अपनी बात सही ढंग से मानने के लिए बाध्य कर दिया है अब इतनी बड़ी सर्कस के लिए अगर कुछ हजार चप्पल छाप नागरिक सड़क में आ गए हैं कुछ दिनों घंटे के लिए तो इतना जायज है। लगभग सब कांटे हटाने हैं वन मैन शो के लिए लेकिन यह चप्पल वाली दीदी बड़ी स्पीड ब्रेकर के रूप में काम कर रही थी इसलिए उन्हीं के तरकश से एक तीर निकाल कर अंदाजे-ओवैसी कब्र से बाबरी मस्जिद को निकाल कर पश्चिम बंगाल में स्थापित करने में लगा गया। क्योंकि ओवैसी लक्ष्य को पूरा नहीं कर पा रहे थे शायद इसलिए हुमायूं को नया टेंडर पास कर दिया गया है शुरुआती खबरों में पश्चिम बंगाल की धरती पर हिंदू मुसलमान का धंधा जोरों पर निकल पड़ा है किंतु चप्पल वाली दीदी के पोस्टर अभी तक मनो मस्तिष्क से निकल नहीं पा रहे हैं।
उनकी शहजादे राहुल गांधी हो या संसद के वरिष्ठतम सदस्य दलित वर्ग के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे दोनों को राष्ट्रपति जी भोज कार्यक्रम में नहीं बुलाया गया उन्हें लगता है फोटोग्राफी में राष्ट्रपति के बाद उनकी ही फोटो आनी चाहिए धोखे से कोई फोटो राष्ट्रपति पुतिन और दलित नेता अथवा सहजादे के साथ आ गई तो वह धुंध में चले जा सकते हैं और अपमान का बाजार जो बनेगा उसमें बाजार बाद के कारण जो चप्पल छाप हवाई यात्री हैं वे खबरों से बाहर हो सकते हैं। मेंस्ट्रीम मीडिया में।
और सबसे ज्यादा टाइमिंग पर है जब मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ में संविधान की पांचवी अनुसूचीसे संबंधितजंगलों की क्षेत्र के जंगलो मे तथाकथित राष्ट्रीय उद्योगपति नाम के परजीवी के कारण पूरा तंत्र लगाकर जंगलों की कटाई से जो हंगामा होगा उसे हल्ला को भी छुपाया जा सकता है इसलिए जरूरी है मीडिया में मैनेजमेंटके जरिये एक सुनियोजित प्रेजेंटेशन देने की तो हंगामा क्यों है बरपा थोड़ी सी जो पी ली है चोरी तो नहीं की है डाका तो नहीं डाला...
शहडोल में भी एक तथाकथित राष्ट्रीय उद्योगपति पांचवी अनुसूची क्षेत्र में बिना खनिज अनुबंध के खनिज विभाग को करोड़ों रुपएकी रॉयल्टी देता है पिछले 16 साल से उसने अनुबंध नहीं किया है फिरभी रायल्टी लेता है पिछले 16 सालों से सब कुछ पारदर्शी है और जब पारदर्शी भ्रष्टाचार होने लगता है तो उसे मान्यता मिलते लगती है पूरा नेता अफसर उसे मान्यता देता है तब यह अघोषित कानून बन जाता.. और अघोषित कानून “अधिमान्य पत्रकारों” की तरह अधिमान्य होता जरूरी नहीं है कि उसने कानून का पालन किया हो इसे ही सिस्टम कहते हैं तो सिस्टम अगर ठीक चल रहा है मान्यता से चल ही रहा तो हंगामा क्यों है, चाहे मामला चप्पल छाप हवाई यात्रियों के शारीरिक मानसिक और आर्थिक शोषण का हो या फिर हवाई चप्पल वाली दीदी ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल को लूटने का हो सब जायज है ऐसे में दलित नेता अथवा सहजादे को राष्ट्रपति भोज में ना बुलाना भी एक चप्पल छाप कदम ही है।देखना होगा की कथित राष्ट्रीय मीडिया की तरह और उनके प्रश्नों की तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर के नेता पुतिन कब किसे कहां असभ्य घोषित करते हैं और कितने नेता करेंगे यह असभ्यता भी हमारी एक मान्यता हो जाएगी धीरे-धीरे तो हंगामा क्यों है बरपा…?
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