
दिल्ली से शहडोल तक: पारदर्शी-भ्रष्टाचार और अनैतिकता एक बड़ी चुनौती
कभी द्रोणाचार्य ने एकलव्य का शिक्षा के मामले में अंगूठा काटा था आज वह अंगूठा स्वयं को सिद्ध कर रहा है इसमें भारत की जातिवाद की राजनीति बाधक नहीं बनती। भ्रष्टाचार चाहे दिल्ली में हो रहा हो या फिर शहडोल में वह अगर पारदर्शी है और उसे मानता देने का काम होता है तो वह अघोषित कानून बन जाता है क्योंकि यह वहां सहज स्वीकार्य कराया जाता है। और कोई बात नहीं।
भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार और अनैतिकता को ‘पारदर्शी’ रूप देने की प्रवृत्ति पर दिल्ली से लेकर छोटे शहरों तक यह प्रथा अघोषित कानून की तरह स्वीकार हो रही है। राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से राष्ट्रीय राजनीति में तीखे हमले हो रहे हैं
हाल के दिनों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के आईटी सेल पर आरोप लगा कि उसने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को ‘अय्याश’ बताने वाला मैसेज प्रसारित किया। इसके जवाब में कांग्रेस ने बीजेपी नेता और दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा का पुराना वीडियो जारी किया, जिसमें वह आम आदमी पार्टी (आप) के मंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी पर एक महिला से संबंध और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगा रहे हैं। यह वीडियो पुराना है और 2016-2017 का बताया जाता है, जब मिश्रा आप में थे। भाजपा सरकार में मंत्री हैं। इसे ‘पारदर्शी भ्रष्टाचार’ की श्रेणी मैं रखा जा सकता है , जहां अनैतिकता को सार्वजनिक मान्यता मिल जाती है। कि अत्यधिक रूप से न्यायालय से भ्रष्ट प्रमाणित होने के बावजूद इलेक्टोरल बॉन्ड जैसे मुद्दों के बाद अब राजनीतिक दल गाली-गलौज पर उतर आए हैं, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
हाल ही में बिहार के मंत्री नितिन नवीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। लेख में इसे कम शैक्षणिक योग्यता वाले नेताओं की परिवारवाद की श्रृंखला बताया गया, हालांकि नवीन की नियुक्ति को पार्टी में युवा नेतृत्व की दिशा में कदम माना जा रहा है। नवीन ने मात्र 12वीं तक की ही शिक्षा ग्रहण की है जो यह सिद्ध करता है कि आरएसएस बीजेपी में इससे ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि गृहमंत्री अमित शाह ने भी 12वीं तक की ही शिक्षा ग्रहण की है।
शहडोल में अतिक्रमण विवाद की सुनवाई
मध्य प्रदेश के शहडोल में एक पुराने अतिक्रमण मामले की कल सुनवाई निर्धारित है। मामला डॉ. जेपी मस्ता और उनके परिवार से जुड़ा है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने सार्वजनिक सड़क पर अतिक्रमण कर कमर्शियल भवन बनाया, जिसे भविष्य में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को किराए पर देने की योजना है।
शिकायतकर्ता खनिज विभाग के पूर्व माइनिंग सर्वेयर चंद्रिका प्रसाद शुक्ल का दावा है कि यह अतिक्रमण 1963 में स्थापित राजेंद्र नगर कॉलोनी (राजेंद्र टॉकीज से सटी 12 एकड़ आवासीय कॉलोनी) में हुआ है। कॉलोनी टाउन कंट्री प्लानिंग के तहत बनी थी, लेकिन आरोप है कि नगर पालिका के अधिकारियों पदाधिकारी और ठेकेदारों की मिलीभगत से नियमों को ताक पर रखकर कमर्शियल निर्माण को मंजूरी दी गई। करोड़ों रुपये की सरकारी जमीन पर कब्जे का यह मामला लंबित है।
इसे ‘पारदर्शी भ्रष्टाचार’ का उदाहरण कहां जा सकता है, जहां फाइलें गायब करना और नियमों को अनुकूल बनाना आम हो गया है। मस्ता परिवार का दावा है कि धरातल पर कॉलोनी का अस्तित्व ही नहीं है, जबकि भौगोलिक रूप से यह कॉलोनी राजेंद्र टॉकीज भवन से पीछे शहर के मध्य में कॉलोनाइजर के द्वारा बनाए गए नशे के हिसाब से विकसित हुआ स्थापित है। इस कॉलोनी में 25 से 30 फीट की सड़क हैं तालाब है और प्लेग्राउंड भी
है यह अलग बात है की नक्शे को गायब करके पारदर्शी भ्रष्टाचार के तहत मान्यता देते हुए प्लेग्राउंड को भी डॉ जेपी मस्त की तरह ही एक अन्य डॉक्टर ने कब्जा कर लिया है और इसी कॉलोनी से कई लोग भवन करे कर रह रहे हैं। तब उस वक्त भवन कॉलोनी निर्माता के पावर ऑफ अटॉर्नी कृष्णकांत पांडे ने कॉलोनी में भवन विक्रय का काम किया था। इस राजेंद्र नगर आवासीय कॉलोनी का निर्माण 1963 में क्षेत्र के राजा मृगेंद्र सिंह की ओर से बनवाया गया था। यह शहडोल की टाउन कंट्री प्लानिंग के तहत निर्मित पहली कॉलोनी थी।
न्याय की उम्मीद या तारीख पर तारीख?
सवाल उठाया गया है कि क्या शहडोल अदालत पीड़ित पक्ष को न्याय देगी या मामला लंबा खिंचता रहेगा। मानना है कि दिल्ली से शहडोल तक भ्रष्टाचार और अनैतिकता को पारदर्शी करते हुए मान्यता देने की कोशिश जारी है, जो न्याय प्रणाली के लिए चुनौती है।यह मामला स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक बन सकता है, जबकि राष्ट्रीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर लोकतांत्रिक मर्यादाओं को चुनौती दे रहा है। शहडोल में लंबित न्यायालीन प्रकरण मेंकल की सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं।

