
ब्राह्मणों की एकजुटता: स्वाभिमान की पुकार या राजनीतिक षड्यंत्र?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल ही में एक ऐसी घटना घटी जिसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी। विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान, 23 दिसंबर 2025 को लखनऊ में कुशीनगर के भाजपा विधायक पीएन पाठक के आवास पर करीब 40-50 ब्राह्मण विधायक और विधान परिषद सदस्य एकत्र हुए। इसे आयोजकों ने ‘सहभोज’ का नाम दिया, लेकिन चर्चा का विषय समाज की एकजुटता, बुजुर्गों की देखभाल और समुदाय के उत्थान से आगे बढ़कर राजनीतिक नाराजगी तक पहुंच गया। बैठक में पूर्वांचल और बुंदेलखंड के अधिकांश ब्राह्मण विधायक शामिल हुए, और कुछ अन्य दलों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।
यह बैठक कोई साधारण भोज नहीं थी। इसमें ब्राह्मण समाज की वर्तमान स्थिति पर गहन चिंतन हुआ। विधायकों ने महसूस किया कि जातीय राजनीति के बढ़ते प्रभाव में ब्राह्मणों की आवाज दबती जा रही है। पार्टी और सरकार में प्रतिनिधित्व की कमी, नियुक्तियों में उपेक्षा और सामाजिक सम्मान की कमी जैसे मुद्दे उठे। एक विधायक ने कहा कि समाज को मुख्यधारा से जोड़ने और संस्कृति संरक्षण की जिम्मेदारी ब्राह्मणों की है, तो ऐसे आयोजन क्यों गलत ठहराए जाएं? अन्य समुदायों – जैसे ठाकुर, कुर्मी या लोध – की इसी तरह की बैठकों का हवाला देकर इसे सामान्य बताया गया।
लेकिन इस बैठक ने राजनीतिक दलों में दहशत पैदा कर दी। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने स्पष्ट चेतावनी दी कि जाति आधारित आयोजन पार्टी की विचारधारा के विरुद्ध हैं। विपक्ष ने इसे सत्ता पक्ष की आंतरिक कलह का प्रमाण बताया, तो कुछ ने ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने की कोशिश की। सवाल उठता है – आखिर ब्राह्मणों का एकजुट होना क्यों इतना खतरनाक लग रहा है? क्या यह सिर्फ सामाजिक चिंतन है या 2027 के चुनावों से पहले एक नई राजनीतिक शक्ति का उदय?
ब्राह्मण समाज लंबे समय से खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। आरक्षण नीति, जो मूल रूप से सामाजिक न्याय के लिए थी, अब वोट बैंक की राजनीति का हथियार बन गई है। डॉ. भीमराव अंबेडकर की कल्पना समयबद्ध और क्षमता आधारित समाज की थी, जिसमें संविधान निर्माताओं – जिनमें कई ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य शामिल थे – ने विविधता को मजबूत करने का सपना देखा था। लेकिन आज आरक्षण अनंतकालीन हो गया है, और कुछ मामलों में यह सामाजिक विद्वेष का कारण बन रहा है। मध्य प्रदेश में एक वरिष्ठ अधिकारी की टिप्पणी – कि आरक्षण तब तक जारी रहे जब तक ब्राह्मण अपनी बेटी दान न करें – ने इस विद्वेष को उजागर किया। ऐसे बयान न केवल आपत्तिजनक हैं, बल्कि समाज को विभाजित करने वाले हैं।
ब्राह्मणों का आक्रोश इसी से उपजता है। वे खुद को ‘बंधुआ मजदूर’ की तरह महसूस करते हैं – जो सदियों से ज्ञान, संस्कृति और नेतृत्व देते आए, लेकिन आज राजनीतिक कॉर्पोरेट गठजोड़ में हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। संसाधनों का बलिदान कुछ सनकी विचारों के नाम पर हो रहा है, संस्थाएं पारदर्शी तरीके से नाच रही हैं, और आम आदमी की आवाज दबाई जा रही है। अगर ब्राह्मण अब चिंतन कर रहे हैं, अपनी स्वतंत्रता और सम्मान की बात कर रहे हैं, तो इसमें अपराध क्या है? देश की स्वतंत्रता का आधार ही गुलामी से मुक्ति था।
यह बैठक एक संकेत है – कि प्रबुद्ध वर्ग अब चुप नहीं रहेगा। अगर आधा सैकड़ा विधायक एक साथ बैठकर समाज की चिंता करते हैं, तो इसमें दहशत क्यों? यदि पूरे देश के ब्राह्मण एकजुट होकर चिंतन करें, तो शायद समाज में सकारात्मक बदलाव आए। कॉर्पोरेट-पॉलिटिकल इंडस्ट्री को थोड़ी दहशत अच्छी है – यह लोकतंत्र को जीवंत रखेगी। ब्राह्मणों की यह पुकार स्वाभिमान की है, मुक्ति की है। इसे अपराध घोषित करना अन्याय होगा। आने वाला समय बताएगा कि यह एकजुटता कितनी मजबूत साबित होती है। बहुत शुभकामनाएं उन सभी को जो समाज की विविधता में एकता देखते हैं।

