“घंटा पत्रिकारिता”.. भारत की सबसे स्वच्छ शहर के मॉडल में लाशों की ढेर से निकली “घंटा पत्रिकारिता”.. ( त्रिलोकीनाथ)

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घंटा;…पत्रकारिता   
  ( त्रिलोकीनाथ )

2025 गया 2026 आया..लिखने की लिए यह समझ में नहीं आ रहा था कि इस किस भूत के बारे में लिखें या भविष्य के बारे में..भला हो इंदौर के विधायक कैलाश विजयवर्गीय का. की उसने हमें लिखने के लिए परिभाषा दे दी क्योंकि 2014 के बाद जो आजादी आई उसमें शब्दकोश कम पड़ गए थे।
कि त्रिपुरा के भारतीय युवा एंजल चकमा को joउत्तराखंड की देहरादून में शिक्षा की आशा से रह रहा था उसे नस्लीय टिप्पणी पहना कर पीटकर और चाकू मार कर हत्या दी गई इस लाश में लिखें या फिर 22 साल के राम राज्य वाले सुशासन के मध्यप्रदेश पर लिखे जहां वर्षों के मन्नत बाद जन्मा पांच महीने का बच्चा संविधान में प्रदत्त गारंटी भूख से ना मरने देने की गारंटी मे सिर्फ इसलिए मर गया क्योंकि जो मां की दूध उपलब्ध ना होने के कारण पानी मिलाकर पीने वाले दूध में पानी मिलाने के कारण वह मर गया, क्योंकि भारत के सबसे स्वच्छ शहर का मॉडल का तमगा को कई साल से लटका कर घूमने वाला इंदौर में उसे दो तोला स्वच्छ जल नहीं मिला ,इस लाश में लिखें.. ?क्यूंकि दूध में मिलाने वाला पानी इंदौर के पालिका प्रशासन ने जहर के रूप में उसे उपलब्ध कराया था। क्योंकि उसे बोतल बंद 8000 करोड़ो की इंडियन प्लेन में परोसा जाने वाला  पानी उसे दो तोला नहीं मिल पाया.., क्योंकि उसके परवरिशकारों को रामराज्य पर भरोसा था.. इसलिए वह मर गया..

  ———————-( त्रिलोकीनाथ )————————

ऐसी अब तक 14 लाशों को इंदौर में पाए जाने की खबर है हजार से ऊपर से प्रभावित संख्या लगातार बढ़ती रहेगी जनसत्ता अखबार में ने इसे त्रासदी चिन्हित किया है. जैसे “भोपाल गैस ट्रेजडी”…, जैसे  “कोविड19 महामारी” आदि आदि। क्योंकि शहडोल में मेडिकल कॉलेज में कोविड19महामारी में ऑक्सीजन सप्लाई सिस्टम फेल होने से एक साथ करीब 25 मरीजो की मौत हो गई थी। सिस्टम उस एक मुस्त लाशों को छिपाने में लगा था‌… दुनिया की करोड़ो लाशो के भंडार में यह भगवान विरसा मुंडा मेडिकल कॉलेज शहडोल का अंशदान था।

2025 में भीड़ बुलाकर उत्तर प्रदेश में कुंभ के नाम पर लाशों का अंबार खड़ा कर दिया.., फिर उसे छिपाया भी । चाहे उत्तराखंड को ho, चाहे उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश इसके शासन ऐसी बड़ी मानवीय त्रासदी शासन-प्रशासन के सत्ता के मद में पैसे में बिक कर गुलाम हो चुकी पत्रकारिता में गुम हुए शब्दों की तलाश में भटक गयी थी।
हमें लगा था शिक्षा की तलाश में युवक एंजेल चकमा  ने हमें चकमा दे दिया.., यह चिल्ला चिल्ला कर मुझे मत मारो, मैं भारतीय हूं… किंतु 14 के बाद की आजादी ने उन्हें इतना मदमस्त कर दिया था कि उसे विदेशी कहकर उसकी हत्या कर दी… कह सकते हैं वह तत्काल नहीं मरा उसे कुछ दिन जिंदा रखकर मारा गया था। इस पर मंथन चल ही रहा था इंदौर के पास  बच्चे मौत ने इस नई आजादी ने भारत के घोषित स्वच्छ मॉडल इंदौर शहर के सबसे अस्वच्छ, अपवित्र प्रदूषित सिस्टम में नागरिकों की मौत ने हिलाकर रख दिया।

ब्योहारी में राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष के शब्दों में “मध्यप्रदेश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रयोगशाला है..” ऐसे प्रयोगशाला में पत्रकारिता कि जिंदा-लाश लिए घूमता पत्रकार अनुराग थोड़ा संवेदनशील हो गया और वहां के परमानेंट विधायक और मंत्री कैलाश से इस पर प्रश्न किया। सत्ता के मद में चूर कैलाश ने कहा “फोकट का प्रश्न मत करो..”
पत्रकारिता कि जिंदा लाश लिए घूमता अनुराग फिर बोला, मैं वहां था; कैलाश ने कहा “घंटा..”

पत्रकारिता से अनुराग रखने वाला पत्रकार अनुराग असहज हो गया.., शब्द-शैली पर प्रश्न किया और फिर सब मीडिया में बायरल कर दीया… पत्रकार, कभी पत्रकारिता का एकमात्र चेहरा रही ndtv न्यूज चैनल से जुड़ा था कहते हैं कुछ समय के लिए ndtv इस घटना को महत्व दिया बाद में अपने सोशल मीडिया हैंडल से इसे हटा दिया… अब पत्रकार अनुराग द्वारी को कब हटाएगा या अनुराग का ndtv से अनुराग कब खत्म होगा…? यह आने वाला वक्त बताएगा..

बहरहाल पत्रकारिता कि जिंदा मसाल इंदौर की लाशों की ढेर में घंटा बजा कर निकला।करीब 13 साल की भाजपा की रामराज वाली सरकार में और 23 साल की मध्य प्रदेश की रामराज सरकार में “..घंटा-पत्रकारिता..” को जन्म दिया.

कह सकते हैं 2026 में सरकार का चरण चुंबन कर उनकी जूठन में अपना और अपने बच्चों का पेट पालने वाले पत्रकारों, अखबार मालिकों और तथा कथित मीडिया जो मदमस्त नेताओं का घंटा बजाने में अपनी योग्यता समझते थे उनका भी घंटा बजा है..। अब उन्हें सरकारी जूठन पाने के लिए और अपनी जमीर की हत्या करके उस लाश के रूप में परोस कर ज़ोर जोर से घंटा बजाना पड़ेगा या फिर लास बनी जमीर को जिंदा करने का प्रयास करना पड़ेगा..।

त्रिपुरा के एंजेलने देवभूमि में आकर अपने को भारतीय-भारतीय कहकर देश की नई आजादी की मौत के सौदागर को जो चकमा देने का प्रयास किया.. होनहार एंजेल चकमा  विफल हो गया, यही हमारी विफलता है… और भारत की सबसे स्वच्छ घोषित  मॉडल-शहर मे पांच माह का अबोध बच्चा दो तोला स्वच्छ जल के अभाव में मर गए वह उस एंजेल से ज्यादा चकमा दे गया….।सत्ता में बैठा मदहोश मदमस्त नायक इस पर एक शब्द नहीं बोला, क्योंकि उसे मालूम है लाशों की ढेरों के अनुभव में रहने के बाद लोगबाग भूल जाते हैं।कहते हैं उनके मुखिया मोहन भागवत भोपाल में है अपनी प्रयोगशाला राज्य को निगरानी कर रहे हैं ताकि कुछ अधिक ना हो.. दिल्ली के महानायक और नायक का ट्विटर, ना तो एंजेल चकमा में और ना ही 5 माह के बच्चे सहित अब तक 14 लोगों जहरीला पानी सप्लाई होने से मौतों में ट्वीट (चहक) भी नहीं कर रहा है.. क्योंकि अनुभव में ऐसी लाशें लोकतंत्र में सजती ही रही हैं… फिर  ऐसे फोकट सवाल पर, क्यों विमर्श होना चाहिए… शायद यही सोचकर मौन व्रत धारण किया गया है… अच्छा है हिंदू मुस्लिम का कोई नया इवेंट खड़ा किया जाए… यही राजनीति है

    लेकिन इसी स्थापित रामराज्य की कल्पनाकार मुख्यमंत्री उमा भारती संवेदनशील हो गई, उन्होंने कहा “..यह घटना पाप के समान है इसके लिए राज सरकार को घोर प्रायश्चित करना होगा।”

     लोकसभा में विपक्षीदल नेता गांधी का भी बयान आया “इंदौर में पानी नहीं जहर बंटा… प्रशासन कुंभकरण नींद मे रहा। घर घर मातम है, गरीब वेवस है और भाजपा नेताओ के अहंकारी बयान जारी है..”

 

सरकार के  “घंटा-पत्रकार”  “घंटा-पत्रकारिता”

वैसे पत्रकार-वार्ता भाजपा सरकार की पसंदीदा  नहीं है वह पत्रकारों को और पत्रकारिता को जिंदा लाश के रूप में फिर भी ढोना चाहती है किंतु वह पत्रकार-वार्ता जैसी स्वतंत्र मंच को खारिज करती है तब तक वह खारिज करती रहेगी जब तक पत्रकार “घंटा-पत्रकार” के रूप में स्थापित ना हो जाएं… जो उनका घंटा बजाते रहे… उनके लिए घंटा बजाते रहे..।

अनुभव में इस घंटा-पत्रकारिता को पहचान  अपन ने स्वयं ही इसके आयोग्य माना और दूरियां बना ली । कौन “आ बैल मुझे मार के तर्ज पर काम करे…” किंतु एक वक्त आया कि घंटा-सरकार ने घंटा-पत्रकारिता को बुलाकर पूरे देश में 11 साल की उपलब्धि का घंटा बजाने का काम किया। शहडोल में हम भी भाजपा हैडक्वाटर में घंटा-पत्रिकारिता देखने की भीड़ में बिना बुलाए मेहमान के अंदाज में पहुंच गए…। सब कुछ सुनने समझने के बाद जब घंटा-पत्रकारिता का समापन चला, हमने  हमको जिंदा किया और आदिवासी क्षेत्र के पत्रकारों को प्रश्न पूछने के लिए उपस्थित मंत्री दिलीप जायसवाल से आग्रह किया । उन्होंने कृपा करके हमें समय भी दिया… किंतु प्रश्न उस अंदाज पर जिंदा नहीं हुए जैसी की 11 साल की उपलब्धि में अपेक्षा थी.. अत: हमने अपने ही थोड़ी से प्रश्न पूछे उसमें जैस 15 साल से चल रही अवैध रिलायंस इंडस्ट्रीज, सहित जल संरक्षण और शहडोल की मोहन राम मंदिर से संबंधित मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की आदेश जो 12 साल से लंबित होकर क्रियान्वन नहीं हो रहा है जिससे शहडोल के राम को वर्तमान रामराज्य में लूटा जा रहा है… उस पर प्रश्न पूछे…? घंटा-पत्रकारिता में मंत्री दिलीप जायसवाल जी ने घंटा बजाया, पत्रकार वार्ता खत्म हो गई हमारा भी प्रश्न पूछने का शौक खत्म हो गया। रही प्रशासन की बात तो “जथा राजा- तथा प्रजा” कि तर्ज पर करतब निष्ठा का निर्वहन हो ही रहा है। उनसे क्या शिकायत…?पत्रकारिता तथाकथित चौथा स्तंभ है इस लोकतंत्र का… वह घंटा पत्रकारिता के रूप में आ गया.. यह पता नहीं चला अगर मंत्री कैलास न बताते तो हमें पता भी नहीं चलता…. हम घंटा-पत्रकारिता के युग में आ गए हैं…..

2025 लोकतंत्र में नागरिकों के लाशों की ढेर छुपाने का वर्ष रहा है, 2026 की शुरुआत में भी चाहे एंजेल चकमा की लाश हो या फिर भारत के सबसे स्वच्छ शहर में सिविल लाइन के प्रदूषित पानी पीने से पांच माह के बच्चों की लाश हो इससे अभी तक तो मंत्री कैलाश का सिंहासन नहीं हिला है, ना ही मुख्यमंत्री के मोहनी मुस्कान में कोई कमी आई है.. कुछ चिरकुटे अधिकारी कर्मचारी को बलिदान देने के बारे में सोचा जा रहा है ऐसे में शहडोल जैसे आदिवासी शहर में बिक रही सीवर लाइन मैं अब तक दो लाशें बलिदान हो चुकी हैं पूरे शौक के साथ सत्ता पक्ष के नेताओं ने₹6 लाख उसकी कीमत लगाई थी कंपनी के प्रतिनिधि बनकर मामले को दबाने के लिए क्या यह शगुन है उसे भविष्य के विनाश का जो शहडोल में अराजक प्रशासन में सीवर लाइन की पानी से करने वाले भविष्य के नागरिकों की लाशों का जरुर सोचते रहिए क्योंकि कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री ने हमें जिंदा लाश बना दिया है हम सोच नहीं सकते कभी प्रदूषण विभाग शहडोल का मेहरा 7 पहन के अंदर से अफसरी चलता था यानी लेनदेन करता था शहडोल के विनष्ट हुए और प्रदूषित हो गए तालाबों पर एक शब्द नहीं लिखा लिखना भी कैसा आखिर उसे घंटा सरकार ने किसी और काम के लिए बैठा रखा था और हमारी घंटा पत्रकारिता ऐसे मेहरा को पालती रही। अभी कुछ नहीं बदला है शहडोल में प्रदूषण आम बात होती जा रही है बस प्रदूषित पानी पीकर करने की तैयारी जरूर करना चाहिए आखिर ओरिएंट पेपर मिल का प्रदूषण हमारे सिस्टम में हमें प्रदूषण प्रूफ कर ही दिया है अब तो अवैध रूप से चलने वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रदूषण की बारी है सोचते रहना चाहिए शायद हमारा भी जमीर जिंदा होजाए….?

उमा भारती कोयला मंत्री थी, शहडोल में पत्रकार-वार्ता सर्किट हाउस में हुआ… एक पत्रकार ने उनकी जमात से आए “फंडा” शब्द का उपयोग किया। पहले तो उमा भारती उत्तर देते हुए आगे निकल गई.. अचानक बैक लगाईं और अभी के पत्रकार अनुराग की तरह गुस्सा कर पत्रकार से पूछा “ये फंडा क्या होता है…”, पत्रकार भी थोड़ा सकपका गए। वह दौर था, जब “घंटा-पत्रकारिता” ने जन्म नहीं लिया था …. नदी समाज के कार्यक्रम में नर्मदा तट पर तब के पर्यावरण मंत्री दवे ने कहा था “पत्रकार हमारे मित्र नहीं है…”शायद इसीलिए लोकतंत्र में दिखाने का पत्रकार समाज पैदा किया गया और उसे हजारों करोड़ रुपया का विज्ञापन देकर उनकी जमीर खरीद कर “घंटा-पत्रिकारिता” कराया जा रहा है… इस बीच में जहां घंटा-पत्रकार प्रति सेकंड घंटा बजाते हो, वहां पर पत्रकार अनुराग को  मर चुकी ndtv में रहते हुए पत्रकारिता दिखाना उसे कितना महंगा पड़ेगा हमें देखना होगा| नए वर्ष में  घंटा-पत्रकारिता (अघोषित) 2026 के नववर्ष में बहुत शुभकामनाएं…. हम आशा कर सकते हैं कोई एंजिल इस रामराज्य में आये और हमें चकमा न दे जाए… भगवान राम से ही प्रार्थना है। अगर वह मुक्त हो जाए तो देशमुक्त हो जाए…।


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