
बाणगंगा मेला: परंपरा, आस्था और बढ़ती चुनौतियाँ
बाणगंगा मेला क्षेत्र को बचाने में शहडोल की आदिवासी सांसद हिमाद्री सिंह की चिंता कितनी प्रभावी साबित होगी?
शहडोल (मध्य प्रदेश) में बाणगंगा मेला एक ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व रखने वाली परंपरा है, जो दशकों से चली आ रही है। यह मेला मकर संक्रांति के अवसर पर शुरू होता है और सात दिवसीय होता है। विराट मंदिर, बाणगंगा कुंड और आसपास का क्षेत्र धार्मिक आस्था का केंद्र है, जहाँ दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं। मेले में लोक संस्कृति, व्यापार और सामाजिक एकता का अद्भुत संगम दिखता है।
इस वर्ष 2026 मेले का उद्घाटन 14 जनवरी को शहडोल सांसद श्रीमती हिमाद्री सिंह ने किया। उन्होंने फीता काटकर, ध्वजारोहण कर और माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर मेले का शुभारंभ किया। सांसद ने मेले की ऐतिहासिकता, भव्यता और पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती परंपरा की सराहना की तथा आने वाले समय में इसकी भव्यता बरकरार रखने की बात कही। मेले में विधायकगण, कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और अन्य अधिकारी भी उपस्थित रहे।मेले का स्थान बदलना भी व्यावहारिक नहीं, क्योंकि विराट मंदिर, बाणगंगा कुंड आदि को नए स्थान पर स्थानांतरित करना असंभव है। जनसंख्या वृद्धि और व्यापार बढ़ने से हर वर्ष भीड़ बढ़ रही है, जिससे हादसे का खतरा बढ़ता जा रहा है।सांसद हिमाद्री सिंह की चिंता और वास्तविकताउद्घाटन के अवसर पर सांसद हिमाद्री सिंह ने मेले की स्थिति पर चिंता जताई। यह सराहनीय है कि उन्होंने सार्वजनिक मंच से इस मुद्दे को उठाया। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उनकी चिंता केवल शब्दों तक सीमित रहेगी या ठोस कार्रवाई होगी?
21 जनवरी को स्थिति और भीड़ का दबाव
21 तारीख को मेले में भारी भीड़ उमड़ी। अनुमान है कि इस बार 4 लाख से अधिक श्रद्धालु और दुकानदार आए। मेले का क्षेत्र इतना संकुचित हो चुका है कि भीड़ सड़क तक पहुँच गई। पुलिस और प्रशासन ने बिजली काटकर मेले को समाप्त करने का प्रयास किया, किंतु भीड़ और दुकानदारों ने अनुशासित तरीके से इसका पालन नहीं किया। परिणामस्वरूप भीड़-व्यवस्था बिगड़ी रही और स्थिति अनियंत्रित-सी हो गई।
भूमि माफिया और संकुचन का मुख्य कारण
मेले के क्षेत्र की मूल भूमि का बड़ा हिस्सा राजनेताओं और भू-माफियाओं के कब्जे में चला गया है। अवैध अतिक्रमण, निर्माण और कब्जे के कारण मेले का प्रांगण सिकुड़ता जा रहा है। नगर पालिका परिषद में भी माफिया-प्रभावित व्यवस्था ने इस प्रक्रिया को बढ़ावा दिया है। पालिका ने खुद मेले के क्षेत्र में बारात घर जैसे अवैध निर्माण कराए हैं। आसपास के श्मशान भूमि, जल स्रोत और पुरातात्विक महत्व वाली जगहें भी खतरे में हैं। भू-माफिया बाहरी ताकतों से समर्थित होकर प्राकृतिक और धार्मिक महत्व की भूमि को नष्ट कर रहे हैं।
नगर पालिका परिषद और प्रशासन में माफिया-प्रभावित तंत्र मजबूत है…?
भाजपा के कुछ स्थानीय पदाधिकारी भी कथित तौर पर इस व्यवस्था में शामिल दिखते हैं (जैसे पुराने स्टेज पर कब्जा)।
यदि प्रशासन चाहे तो मेले के क्षेत्र का विस्तार, भूमि अधिग्रहण, अतिक्रमण हटाना या पुरातात्विक महत्व वाली जगहों की सुरक्षा संभव है। लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं दिखा।यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो बढ़ती भीड़ में भगदड़ या हादसे की आशंका बढ़ेगी, जिससे लाशों की संख्या बढ़ सकती है। वैकल्पिक रूप से, कोविड जैसी स्थिति में मेले को स्थायी रूप से बंद करना पड़ सकता है, जो आस्था और परंपरा के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा।
इसलिए आवश्यक है कि नगर पालिका और जिला प्रशासन मिलकर मेले के क्षेत्र को सुरक्षित करें। अवैध कब्जे हटाएँ, भूमि अधिग्रहण करें या जायज हकों को मान्यता दें।
पुलिस अपराधिक गतिविधियों को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करे। सांसद हिमाद्री सिंह अपनी पार्टी और प्रशासन पर दबाव बनाएँ ताकि उनकी चिंता क्रियान्वित हो। अन्यथा, सांसद की चेतावनी मात्र औपचारिकता बनकर रह जाएगी और भविष्य में होने वाली किसी दुर्घटना का जिम्मा प्रशासन, पालिका और जनप्रतिनिधियों पर भी होगा।
निष्कर्ष
शहडोल की आदिवासी सांसद हिमाद्री सिंह की चिंता सकारात्मक शुरुआत है, लेकिन इसे बचाने के लिए ठोस प्रशासनिक इच्छाशक्ति, माफिया पर नियंत्रण और भूमि संरक्षण की जरूरत है। यदि यह नहीं हुआ तो बाणगंगा मेला का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। समय रहते कदम उठाना ही एकमात्र समाधान है—वरना परंपरा की बलि चढ़ जाएगी। क्योंकि उत्साह भीड़ बढ़ने के लिए प्रचार तंत्र में प्रयागराज कुंभ के मेले की अव्यस्था को हमने एहसास किया है कैसे सैकड़ो लोग अराजकता की आलम में हत्या के शिकार हो गए और उत्तर प्रदेश के संत मुख्यमंत्री आदित्यनाथ झूठ बोलने में लाशों को छुपाने का काम किया। शहडोल इतना बड़ा मेला तो कभी नहीं हो सकता किंतु जनसंख्या और भीड़ के तथा क्षेत्र के दबाव में ऐसी घटना को निमंत्रण दिया जा रहा है इसमें कोई शक नहीं…. (त्रिलोकी नाथ गर्ग)

