सोन का साम्राज्य-3; …सोन-साम्राज्य के गंधिया में विश्राम हुआ राम, सीता अनुज लक्ष्मण का ( त्रिलोकी नाथ)

Share

सोन का साम्राज्य-3; … ( त्रिलोकी नाथ)

              आज सरकारी प्रेस विज्ञप्ति में यह बात बताई गई है इसी रास्ते से आयोध्या से  चित्रकूट होते हुए दण्डकारण्य होकर श्री राम लंका गए थे जहां उन्होंने रावण का वध किया ऐसी मान्यता है शहडोल जिले का सीतामढ़ी धाम रामपथ गमन मार्ग में है। मुख्यमंत्री  मोहन यादव 08 फरवरी को जिले के जयसिंहनगर जनपद क्षेत्र में सीतामढ़ी धाम ग्राम गंधिया में माता सबरी की प्रतिमा का अनावरण किया । । इस यात्रा के दौरान 248 प्रमुख स्थलों में उन्होंने विश्राम किया था। शहडोल का गंधिया ग्राम भी इन 248 चिन्हित स्थानों में से एक है।    ऐसी मान्यता है कि दण्डकारण्य में प्रवेश से पूर्व  भगवान श्री राम माता सीता तथा अनुज लक्ष्मण भी का गंधिया ग्राम में विश्राम हुआ था। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे इस गांव में माता सीता की रसोई तथा भगवान श्रीराम मंदिर मौजूद है। जयसिंहनगर जनपद पंचायत के ग्राम पंचायत गंधिया में आयोजित कार्यक्रम में 767 करोड़ की लागत वाले निर्माण कार्याें का लोकार्पण एवं भूमिपूजन करेंगे। इन कार्याें में 633 करोड़ रूपए लागत वाले 82 निर्माण कार्यों का लोकार्पण किया ।

हम “सोन के साम्राज्य” का तीसरा खंड लिखने जा रहे हैं वस्तुत हम अभी शहडोल के इर्द-गिर्द ही हैं करीब 4 दसक पहले सोन के पानी के रंग लिखते वक्त लेखक देवशरण मिश्रा ने लिखा था सोन के बाएं तट पर मिलने वाली एक अन्य नदी है, मुड़ना; लगभग 80 किलोमीटर लंबी यह भी मटर सत्ता के पास मेंकल  आरक्षित वन से ही लगभग सभा 900 मीटर की ऊंचाई वाले एक सोते से प्रकट होती है कुछ दूर दक्षिण भाकर लगभग 20 मीटर का एक छोटा सा झरना बनाने के बाद पूर्व की ओर बढ़ती हुई धीरे-धीरे उत्तर का रुख लेना आरंभ करती है अंतरा झगरहा गांव को छोड़ती लोटना, गहिरा आदि अनेक नालों का जल समेटती उत्तर की ओर बाँकी चाल से चलती, भौंतरा गांव से लगभग दो किमी पूरब जंगल की निर्जनता के बीच सोन में मिल जाती है ।

  सोन-संगम से तनिक पहले इसपर रहिकला का एक साधारण-सा झरना है; जहाँ यह देखा जा सकता है कि जल-शक्ति कितनी प्रबल है, जो पत्थर को अपने ढंग से काटने में समर्थ है । यहाँ कलचुरिकालीन अवशेष बिखरे पड़े हैं । अन्तरा भी पूर्व मध्यकालीन अवशेषों की खान है, जहाँ तत्कालीन चण्डी(जिसे हम वर्तमान में कंकाली माता मंदिर के नाम से जानते हैं) है की खंडित प्रतिमा दर्शनीय है । मुड़ना और इसके सहायक नालों के अनेक तटीय गाँवों-टोलों (फतेहपुर,कल्याणपुर, बड़गाँव, बँधुआ(बंधवा बड़ा )आदि) के पास अनेक विभिन्न पाषाण कालीन उप- करण मिले हैं । इस नदी के पास ही बने हैं.

सोहागपुर और (जिले का मुख्यालय) शहडोल । इन दोनों स्थलों के मुड़ना-तट के पास भी पाषाण कालीन उपकरण मिले हैं। कहते हैं, सोलहवीं सदी में सोहागपुर के शहडोलवा अहीर ने यहाँ के जंगल-ज्ञाड़ साफ करके जो बस्ती बसायी, तनिक परिवर्तन से वही अब शहडोल कही जाने लगी है । करीब चार दशक पहले लिखते हैं 1911 में यहाँ की जनसंख्या तीन हजार थी, अब उन्नीस हजार से भी अधिक है । शहडोल नया नगर है | इस सदी के आरम्भिक वर्षो तक सोहागपुर के अन्तर्गत ही शहडोल की भी गणना की जाती थी । पूर्वमध्यकाल में यह सारा क्षेत्र ‘सहजोर देश’ नाम से प्रसिद्ध था, जिसकी राजधानी सहजोर थी । सोलहवीं सदी तक इसपर भर-राजाओं का अधिकार था, जिस राजवंश पर बाँधोगढ़-नरेश राजा वीरसिंह बघेल ने विजय प्राप्त की।(जितोभराणां नृपतिनृशंसः)

सहजोर..,सौभाग्यपुर…..,सोहागपुर….शहडोल 

शहडोल का स्वतंत्र विकास बढ़ते हुए यातायातवाले मार्ग-संगम पर स्थित होने, जिला-मुख्यालय और रेलवे स्टेशन के कारण है । शहडोल से सोहागपुर गाँव मुश्किल चार किमी उत्तर होगा । शहडोल नगर से बाहर निकलते ही एक पोखरा या बन्धा मिलता है; और, साथ-साथ सोहागपुर के मकान मिलने आरम्भ हो जाते हैं । सोहागपुर में ऐसे मकानों की कमी नहीं जिनमें पूर्वमध्यकालीन अवशेष काम में लाये गये हैं | सातवी-आठवीं सदी के जैन स्मारक— मंदिर, मूर्तियाँ, स्थापत्य के अन्य अवशेष तो यहाँ हैं ही; बाद के भी अवशेष यहाँ मिलते हैं—ग्यारहवीं सदी के, जब कलचुरियों का सूर्य प्रखर होता जा रहा
था । कहा जाता है कि उन दिनों यह सौभाग्यपुर नाम से प्रसिद्ध था, और त्रिपुरी के कलचुरियों के अधिकार-क्षेत्र में था । इसका नाम सौभाग्यपुर से सहजोर कब पड़ा, यह नहीं बताया गया है; और न यही कहा गया है कि सहजोर ने सोहागपुर नाम कब धारण किंया । हमारे अनुमान से, बिलहरी अभिलेख में उद्धृत कलचुरिकालीन सौभाग्यपुर कोई अन्य स्थल होना चाहिए; और वर्तमान सोहागपुर रहा होगा पूर्वमध्यकालीन भर-राजधानी सहजोर, जहाँ तत्कालीन भर-अवशेष प्रचुर मात्रा में मिले हैं । बाद में सोहागदेव बघेल के नाम पर यह सोहागपुर हो गया और ‘सहजोर’ नाम परिवर्तित होकर नये रूप में शहडोल हो गया । शहडोल में पूर्वमध्यकालीन स्थापत्य – अवशेष बिल्कुल नहीं मिलते; इसलिए शहडोल नाम सार्थक करने के लिए शहडोलवा अहोर की कहानी गढ़ ली गयी होगी ।
वास्तव में, यह सोहागपुर मध्य भारत के उत्तर-दक्खिन मार्ग का एक प्रमुख पड़ाव रहा है । सोलहवीं सदी के समाप्तिकाल में बघेल राजा बीरसिंह देव ने अपने पठान सहयोगियों (जौनपुर के शर्की सुल्तान ? ) के साथ इसी रास्ते से रतनपुर पर आक्रमण किया था और 18 वीं सदी में मराठा भोंसलों ने बुंदेलखंड होते हुए इसी रास्ते जाकर दक्षिण कोशल पर अपना अधिकार जमाया। सोहागपुर क्षेत्र का सामरिक महत्व जानकर ही भोसलों ने छत्तीसगढ़ के साथ इस पर भी अपना प्रभु स्थापित किया था। महत्वपूर्ण और अपेक्षाकृत सरल मार्ग पर स्थित होने के बावजूद अपने मुख्यालय के नाम से ही प्रसिद्ध सोहागपुर परगना रेल यातायात आरंभ होने से पहले तक ‘अझात’ और ‘अगम्य’ में माना गया जाता था यहां की जनसंख्या भी विरल थी। चार दशक पहले वह लिखते हैं आज भी सोहागपुर तहसील की जनसंख्या प्रति वर्ग मील प्राय 200 ही है और यह अनुपातिक हिसाब से शहडोल जिले की सभी तहसीलों में सबसे अधिक बताई जाती है।

अब वर्तमान मेंइस सबसे बड़े तहसील के प्रशासनिक व्यवस्था में कई बदलाव आ गए तहसील तो तहसील शहडोल जिले के तीन टुकड़े हो गए शहडोल की प्राकृतिक संसाधन इसके लक्ष्य में थी क्योंकि कोई सक्षम आदिवासी नेता या गैर आदिवासी नेता इस जिले में अपनी योग्यता के साथ इसे बचा पाने में योग नहीं था इसलिए भी जिले के वर्तमान मेंतीन टुकड़े हुए तब के 12 विकासखंड वाले शहडोल के तीन विकासखंड अनूपपुर, कोतमा और पुष्पराजगढ़ को मिलाकर अनूपपुर जिला बनाया गया तथा पाली और मानपुर तथा करकेली विकासखंड को मिलाकर उमरिया जिला बनाया गया अनूपपुर का मुख्यालय अनूपपुर और उमरिया का मुख्यालय उमरिया रखा गया। बदलते परिवेश में प्राकृतिक संसाधनों को भरपूर दोहन के लिए इन प्रशासनिक केंद्र का जमकर दुरूपयोग हो रहा

   हलां कि विकेंद्रीकरण के जरिए इस क्षेत्र के विकास को ही इसका बहाना बनाया गया लेकिन वास्तव में जमीनी धरातल बताता है की प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए कोई उपा नहीं किया गया। प्राकृतिक संसाधन ऑन खासतौर से कोयला रेत पत्थर और अन्य खनिज पदार्थ तथा वन संपदा के साथ करीब हजार मीटर नीचे 500 गहरे ट्यूब वेल्स (कुओं) के सहायता से कोयला आधारित गैस का एशिया का सबसे बड़ा खनिज उत्पादन शहडोल क्षेत्र में 2009 में निकलने की प्रक्रिया उद्योगपति मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज सीबीएम के द्वारा प्रारंभ की गई. नेतृत्व विहीन टुकड़े-टुकड़े हो चुका विकेंद्रीकृत शहडोल क्षेत्र में बिना किसी बैध खनिज अनुमति के इस क्षेत्र का गैस निकाल कर पाइपलाइन के जरिए इलाहाबाद वर्तमान में प्रयागराज स्थित राष्ट्रीय मुख्य पाइपलाइन के जरिए देश और दुनिया में बेची जा रही है. कहा जाता है गैस निकालने का सरकार के साथ जो समझौता हुआ वह 2029 तक पूर्ण होगा प्रथम चरण में इसके बाद नया समझौता किया जा सकता है.

लेकिन इसके लिए भी जो जमीन के नीचे से गैस निकालने का पारंपरिक खनिज अनुबंध है उसे ना तो शहडोल के प्रशासन ने और ना ही मध्य प्रदेश शासन ने या फिर भारत शासन ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ संपन्न कराया है अपने आप में स्पष्ट है कि इस क्षेत्र इस आदिवासी क्षेत्र सोन-साम्राज्य की विरासत में पहले प्राप्त हजारों साल की श्रृंखला से सुरक्षित जमीन के नीचे सीवीएम गैस को गैर कानूनी तरीके से हजारों करोड़ों रुपए के राजस्व क्षति के साथ उद्योगपति को एक माफिया के रूप में गैस निकालने का हमारा लोकतंत्र अपराधिक सहयोग भी कर रहा है इससे स्थानीय आम आदमी को कोई उत्पादन की एशिया महाद्वीप के महत्व वाली स्थिति की तुलना में कुछ भी विशेष लाभ नहीं है। और जो दुर्घटनाएं होती हैं उनकी भी सुनवाई स्वाभाविक है पुलिस प्रशासन नहीं करते,न ही करेगा. क्योंकि ऐसा माना जाता है की वर्तमान भारतीय जनता पार्टी सरकार को आंख मूंद कर जिन दो उद्योगपतियों को शोषण करने की अनुमति दी गई है उसमें मुकेश अंबानी एक हैं जिनका रिलायंस इंडस्ट्रीज यह गैस निकालने का काम कर रहा है। एक हास्य स्थिति यह भी है की जो खनिजविभाग यह कहता है की गैस हमारे दायरे में नहीं आता वह पेट्रोलियम एवं गैस मंत्रालय का हिस्सा है वही खनिज विभाग रिलायंस कंपनी के द्वारा उत्पादित की गई गैस का रॉयल्टी जो उद्योगपति द्वारा कृपा करके दे दिया जाता है विभाग को उसका न सिर्फ राजस्व एकत्र करता है उसका हिसाब रखता है बल्कि शासन को पैसा पहुंचाने का भी काम करता है किंतु यह यह भी कहता है कि यह हमारा काम नहीं है दूसरे विभाग का है…. जो शहडोल में अस्तित्व में नहीं है इस प्रकार पारदर्शी भ्रष्टाचार के जरिए अघोषित कानून का पालन मौखिक तौर पर हो रहा है।

और यह कोई नई बात नहीं है आदिवासी क्षेत्र में सबसे पहले 1965 में स्थापित ओरिएंट पेपर मिल बड़े उद्योग के रूप में आया और उसने भी इसी तरह गैर कानूनी काम करके पूरी सोन नदी का पानी उद्योग के लिए लेता रहा और उसके बदले वह प्रदूषित पानी नदी में डालता रहा जिससे कई किलोमीटर तक इस पानी के प्रदूषण कार्य तत्व न सिर्फ आदमियों को बल्कि जानवरों के लिए भी जानलेवा साबित होते रहे और पानी का राजस्व भी वह नहीं दिया, मैंने ही अपने प्रयास से बार-बार पत्राचार करके “1998 में प्राकृतिक जल स्रोतों पर पानी पर जलकर”के लिए तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार पर दबाव बनवाया जो 1992 से एक लंबी जद्दोजहद के बाद परिणाम पर आया। तब करीब 300 करोड रुपए पानी का बकाया जलकर पेपर मिल पर निकल गया… वर्तमान में कहते हैं उसमें भी बंदर-बांट हो गया, कई चीज छुपाई जाने लगी….

बहरहाल यह सब पारदर्शी भ्रष्टाचार का अघोषित कानून लागू होने का आदिवासी क्षेत्र में एक प्रमाण मात्र है। इसकी चर्चा इसलिए करना जरूरी है क्योंकि सोन का साम्राज्य इसके आसपास प्राकृतिक संसाधनों यानी पर्यावरण पर आधारित और निर्भर है अगर उसकी संरचना को बिना किसी व्यवस्था से सिर्फ शोषण के उद्देश्य से या लूटपाट के उद्देश्य से करने दिया जाएगा तो सोन नदी का अस्तित्व अमरकंटक श्रेणी से निकल कर शहडोल में ही अगर खत्म हो जाता है तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। तब सोन का सह-अस्तित्व नियम चरमरा जाएगा और यह सिर्फ एक मात्र पहाड़ी नाला बनकर रह जाएगा। जो हमारे वर्तमान लोकतंत्र के संविधान में संरक्षित इस आदिवासी संरक्षित पांचवी अनुसूची में शामिल क्षेत्र मैं स्वतंत्रता की सबसे बड़ी लूट के रूप में चिन्हित की जाएगी और एक बर्बाद प्रचुर प्राकृतिक संपदा सांस्कृतिक विरासत पर आक्रांत कारिर्यों के सामूहिक हमले के अलावा यह इतिहास में और कुछ नहीं कहलाएगा। कहा जा सकता है कि लोकतंत्र के चुने हुए जनप्रतिनिधि सांसद और विधायक क्यों चुप हैं …?इस पर टिप्पणी करना “भूसे में सुई ढूंढने जैसा “है बहरहाल हम आगे बढ़ते हैं। “सोन साम्राज्य -4” में इस पर विस्तार सेचर्चा करेंगे.. (त्रिलोकी नाथ)


Share

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

राशिफल

- Advertisement -spot_img

Latest Articles