
संविधान में संरक्षित आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल जिले में बाल सुरक्षा के लिए वह उनके अधिकारियों के लिए गठित बाल कल्याण समिति जो स्वयं को प्रथम श्रेणी न्यायिक में स्टेट की शक्तियां प्राप्त न्याय पीठ भी बताती है उसका पहला सार्वजनिक प्रयोजन वाला पारदर्शी राजनीतिक दल पर प्रयोग हुआ है दिलचस्प होगा की राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस किस प्रकार से इसका उत्तर देती है या अन्य राजनीतिक दलों अथवा अन्य शासकीय संस्थाओं गैर शासकीय संस्थान में यह न्यायपीठ बिना किसी भेदभाव के अपने कर्तव्यों का निर्माण इसी प्रकार से पारदर्शी तरीके से भविष्य में कैसे कर सकती है यह देखने लायक होगा बहरहाल जो नोटिस सामने आया है उसका लब्बोलुआब कुछ इस तरह का है
(त्रिलोकी नाथ)
दिनांक 10/02/2026 को दैनिक भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशित खबर सी०एम० के विरोध पर नाबालिक को जेल – 12 की परीक्षा छूटी, तथा अन्य समाचार पत्रों में लगभग यही शीर्षक लेख कर खबरप्रकाशित की गयी। किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 30 (xii) के प्रावधान के अंतर्गत प्राप्त शक्तियों के आधार पर समाचार पत्रों में प्रकाशित नाबालिक के विषय में मामले का स्वप्रेरणा से संज्ञान में लिया गया है। समाचार पत्र में किशोर की आयु 17 वर्ष 08 माह 19 दिन लेख की गयी है, समाचार पत्र के अनुसार मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश शासन डॉ० मोहन यादव जी पूर्व निर्धारित स्थान धनपुरी में वाटर पार्क के लोकापर्ण कार्यक्रम में शामिल होने शहडोल आये थे। दोपहर करीब 02 बजे मुख्यमंत्री जी का काफिला गोपालपुर तिराहे से लालपुर हवाई अड्डा की ओर जा रहा था इसी दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने काले झंडे दिखाने की कोशिश की गयी। कांग्रेस के इस प्रदर्शन की पूर्व सूचना पुलिस के पास नहीं थी। पर्याप्त फोर्स नहीं होने से कुछ देर के लिये अफरा-तफरी की स्थिति बन गयी। जिसके बाद 40 कार्यकर्ताओं को हिरासत
में लिया गया। जिसमें नाबालिक छात्र भी शामिल था। नाबालिक समेत 03 को रात 10 बजे बुढार जेल भेज दिया गया। जबकि नाबालिक कक्षा 12 का छात्र है तथा उसकी परीक्षा दूसरे दिन निर्धारित थी जेल में निरूद्ध होने से नाबालिक परीक्षा से वंचित रह गया है।
उक्त मामला किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 83 (2) के प्रावधान कोई वयस्क या कोई वयस्क समूह बालकों का व्यष्टि या किसी गैंग के रूप में अवैध कार्य कलापो के लिये उपयोग किया जाना के अंतर्गत प्रथम दृष्टिया प्रदर्शित होता है। जोकि अधिनियम की धारा का उल्लंघन है। अतः नाबालिक को विरोध प्रदर्शन में शामिल करने की वस्तुस्थिति तथा नाबालिक को ऐसे विरोध प्रदर्शन में शामिल करने पर कोई स्पष्ट सुरक्षा योजना अपके दल द्वारा तैयार की गयी थी सहित अपना पक्ष समिति के समक्ष 03 दिवस के अंदर प्रस्तुत करने का कष्ट करे।
शहडोल में बाल कल्याण समिति द्वारा जिला कांग्रेस अध्यक्ष को जारी नोटिस एक महत्वपूर्ण और विचारणीय घटना है। यह न केवल बच्चों के संरक्षण से जुड़े कानूनी दायित्वों की याद दिलाती है, बल्कि राजनीति में बच्चों के उपयोग की पुरानी प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाती है। जिसमें इस घटना की पृष्ठभूमि, सकारात्मक पक्ष, चुनौतियां और व्यापक निहितार्थ शामिल हैं।
हालांकि अभी तक कांग्रेस पार्टी की तरफ से कोई उत्तर नहीं दिया गया है किंतु जिलाअध्यक्ष अजय अवस्थी का एक फेसबुक संदेश अवश्य जारी हुआ है इसमें कहा गया हैयदि किसी नाबालिग छात्र की परीक्षा या भविष्य से जुड़ा कोई विषय सामने आया है, तो यह स्वयं प्रशासनिक विफलता का परिणाम है। हमारा उद्देश्य किसी भी छात्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना नहीं, बल्कि जनता की आवाज को लोकतांत्रिक तरीके से उठाना है।प्रदेश में युवाओं की बेरोजगारी, किसानों की समस्याएँ और स्थानीय मुद्दों पर शांतिपूर्ण विरोध करना हमारा संवैधानिक अधिकार है। सत्ता पक्ष अपनी विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए इस प्रकार के नोटिसों का सहारा ले रहा है, पर हम डरने या झुकने वाले नहीं हैं।कांग्रेस पार्टी बच्चों और युवाओं के भविष्य के प्रति पूरी तरह संवेदनशील है। यदि किसी स्तर पर कोई प्रशासनिक त्रुटि हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन लोकतांत्रिक आवाज़ को दबाने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा।
राजनीति में बच्चों का उपयोग: एक पुरानी समस्या और नई शुरुआत
भारतीय राजनीति में स्कूलों, बच्चों और नाबालिगों को विभिन्न बहानों से राजनीतिक मंचों पर लाने की प्रवृत्ति लंबे समय से देखी जाती रही है। रैलियां, प्रदर्शन, झांकियां या चुनावी सभाओं में बच्चों को आगे करके भावनात्मक अपील करना आम हो गया है। कभी-कभी यह निर्दोष लगता है, लेकिन अक्सर यह बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन करता है—खासकर जब वे नाबालिग होते हैं और उनकी सहमति या सुरक्षा की अनदेखी की जाती है।
शहडोल की बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee – CWC) ने हाल ही में जिला कांग्रेस अध्यक्षअजय अवस्थी को नोटिस जारी कर एक नाबालिग लड़के के कथित राजनीतिक उपयोग (एक तरह से गैंग के रूप में) पर स्पष्टीकरण मांगा है। यह कदम Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 के तहत समिति की शक्तियों का प्रयोग है, जो बच्चों के संरक्षण, देखभाल और उनके शोषण रोकने के लिए जिम्मेदार है। यह नोटिस राजनीतिक दलों के लिए एक चेतावनी है कि बच्चे राजनीतिक टूल नहीं हैं।
यह सुचिता और निष्पक्षता का संदेश देता है। राजनीति में बच्चों के उपयोग को रोकने का एक नया प्रयोग है। आदिवासी बहुल क्षेत्र (पांचवीं अनुसूची के तहत) में बच्चों की सुरक्षा को मजबूत करने का उदाहरण स्थापित कर सकता है। शहडोल जैसे क्षेत्र में जहां आदिवासी बच्चे अक्सर हॉस्टल, स्कूलों या अन्य संस्थानों से जुड़े होते हैं, वहां शोषण के मामले (गायब होना, यौन अपराध, बाल मजदूरी आदि) सामने आते रहते हैं। समिति का यह सक्रिय होना एक सकारात्मक शुरुआत है, भले ही इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल ( कांग्रेस) को निशाना बनाना हो। शुरुआत महत्वपूर्ण है—यह अन्य मामलों में भी कार्रवाई की नींव रख सकती है।
चुनौतियां और वास्तविकता:
बाल कल्याण समितियां सरकारी नियुक्ति पर आधारित होती हैं। इनमें अक्सर सदस्य राजनीतिक प्रभाव या लालच के कारण चुने जाते हैं। कई बार ये समितियां दलों की “टूल किट” बन जाती हैं—छोटे-मोटे लाभ के लिए पक्षपात करती हैं या चुप रहती हैं। सही है कि सड़कों, रेलवे स्टेशनों, बाजारों में भीख मांगते बच्चे, महिलाओं द्वारा भावनात्मक शोषण, नाबालिग लड़कियों पर यौन अपराध—ये रोजमर्रा की घटनाएं हैं। संबंधित थाना, तहसीलदार या क्षेत्रीय अधिकारियों को कितनी बार नोटिस जारी हुईं? शायद बहुत कम। आदिवासी क्षेत्रों में हॉस्टल से बच्चे गायब होने, सहायक आयुक्त कार्यालय में शिकायतें आने के बावजूद बड़ी कार्रवाई दुर्लभ है। अखबारों में खबरें छपती हैं, लेकिन समितियों से नोटिस या जवाबदेही कम दिखती है।
इसलिए, शहडोल की इस घटना को “चुनिंदा” कार्रवाई के रूप में भी देखा जा सकता है। अगर समिति वाकई बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, तो उसे सभी मामलों में समान रूप से सक्रिय होना चाहिए—चाहे कोई भी दल हो या कोई भी अधिकारी।यह नोटिस एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कांग्रेस अध्यक्ष कितनी गंभीरता से जवाब देते हैं। समिति अन्य राजनीतिक दलों, संस्थाओं या अधिकारियों पर भी समान कार्रवाई करती है या नहीं।
आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों के शोषण (हॉस्टल, बाल मजदूरी, यौन अपराध) पर निरंतर निगरानी और कार्रवाई होती है।
राजनीति में बच्चों को “एपस्टीन फाइल” जैसी फाइलों में बदलने की बजाय, उन्हें सुरक्षा का विषय बनाना चाहिए। बाल कल्याण समितियों को प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल होना चाहिए—न कि राजनीतिक हथियार में मिसाल बने अगर यह घटना अन्य जिलों और राज्यों में मिसाल बने, तो बच्चों के अधिकार मजबूत होंगे। शहडोल बाल कल्याण समिति को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने शुरुआत की। अब बारी है कि यह शुरुआत निरंतर, निष्पक्ष और प्रभावी बनी रहे। बच्चों की सुरक्षा राजनीति से ऊपर है—यह सबकी जिम्मेदारी है।

