प्रदूषण; शुद्ध हवा का आखिरी झोंका – केशवाही में एक संक्षिप्त ठहराव.. (त्रिलोकीनाथ गर्ग)

शुद्ध हवा का आखिरी झोंका – केशवाही में एक संक्षिप्त ठहराव
पिछले 50-60 वर्षों से ओरिएंट पेपर मिल का प्रदूषण पेड़-पौधे, नदी-तालाब और हवा में महसूस हो रहा है। जब यह इकलौता उद्योग था, तब बोर्ड उसकी गोद में रहा। संभाग बनने के बाद कई बड़े उद्योग आए, प्रदूषण बढ़ा। बोर्ड अब लल्लू चौक के पास नई जगह पर है, जहाँ वह चुपचाप सील-मोहर लगा रहा है।शहडोल में आम नागरिक सुबह-शाम विकास की लाश की गंध, आँखों में मिर्ची और जहरीली हवा महसूस करता है। ट्रैफिक जाम में पेट्रोल-डीजल का धुआँ गैस चैंबर बनाता है। AQI मापने का कोई साधन आमजन के पास नहीं। (त्रिलोकीनाथ गर्ग)
लंबे समय बाद संगठन के कार्य से अनूपपुर जिले के कोतमा जाना पड़ा। कार्य जल्दी समाप्त हो गया, इसलिए लौटते समय मैंने अपने संगठन के ही गिरवा क्षेत्र के छोटी अमलई निवासी साथी काशी प्रसाद शर्मा जी के घर जाने का निर्णय लिया। उनके पुत्र का असमय दुखद निधन हुआ था। दुख में उनकी साथी बनने की मेरी आत्मिक पीड़ा थी।दुख या सुख में कोई किसी की भागीदारी नहीं करता, किंतु मानवीय संबंध हमें सहजता प्रदान करते हैं। हम सामाजिक प्राणी हैं, इसलिए सहानुभूति और उपस्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है। हमने राष्ट्रीय राजमार्ग के बजाय केशवाही-गिरवा-छोटी अमलई वाला पुराना रास्ता चुना। रात के समय इस मार्ग से गुजरते हुए समय का पता नहीं चलता। रास्ते में पान खाने के लिए केशवाही में रुके। कार चला रहे अग्रज अनिल शुक्ला जी और बी.पी. द्विवेदी कार से नहीं उतरे, क्योंकि जल्दी चलना था। दया शंकर शुक्ला, बद्री प्रसाद तिवारी और मैं बाजार में उतरे। पान खाते हुए एक आभास हुआ – केशवाही में अभी हवा शुद्ध और जीवंत है।
शुद्ध हवा का अनुभव और तुलना
तुलनात्मक रूप से शहडोल मुख्यालय, राष्ट्रीय राजमार्ग और राज्य मार्ग बुरी तरह वायु प्रदूषण के शिकार हो चुके हैं। केशवाही में सांस खुलकर ली जा सकती है। वहाँ दमघोंटू जैसा वातावरण नहीं है।
यहाँ का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) शहडोल, बुढ़ार, धनपुरी, कोतमा, उमरिया, पाली जैसे सड़क मार्ग से लगे शहरों से कहीं बेहतर है। मैंने दया शंकर जी और बद्री प्रसाद जी से कहा भी कि “यहाँ हवा और पर्यावरण अभी काफी शुद्ध है।” उन्होंने बताया – केशवाही के चारों ओर अभी जंगल बाकी हैं, इसलिए हवा में जहरीले तत्व नहीं घुल पाए हैं, जैसा शहडोल और आसपास की शहरी सभ्यता में हो चुका है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वास्तविकता और आलोचना
शहडोल में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड है, किंतु उसकी निगरानी नाममात्र की है। पूर्व अधिकारी मेहरा सात पर्दों में अपनी नस्लीय भावना के अवसाद में सुरक्षित रहते थे। आम आदमी से उनका कोई लेना-देना नहीं था। उनके समय जिला अस्पताल के सामने एक AQI यंत्र लगा था, जो अब नहीं दिखता – शायद “मर” गया। संभाग मुख्यालय में ही यंत्र जीवित नहीं रख पाते, तो आदिवासी क्षेत्र में “मोर नाचा किसने देखा” वाली स्थिति है।यह विभाग कागजी खानापूर्ति करता है। अनापत्ति प्रमाणपत्र देने के बदले ठेकेदारों-उद्योगपतियों से उगाही करता है और आकाओं तक पहुँचाता है। पर्यावरण संरक्षण की सर्वोच्च जिम्मेदारी होने के बावजूद यह विभाग चुप है। मेहरा के बाद नए अधिकारी भी उसी राह पर चल रहे हैं।मीडिया में 150-200 पत्रकारों से मिलने-बात करने के बाद भी इस विभाग की कोई सक्रियता नहीं दिखी।
ओरिएंट पेपर मिल और बढ़ता औद्योगिक प्रदूषण
पिछले 50-60 वर्षों से ओरिएंट पेपर मिल का प्रदूषण पेड़-पौधे, नदी-तालाब और हवा में महसूस हो रहा है। जब यह इकलौता उद्योग था, तब बोर्ड उसकी गोद में रहा। संभाग बनने के बाद कई बड़े उद्योग आए, प्रदूषण बढ़ा। बोर्ड अब लल्लू चौक के पास नई जगह पर है, जहाँ वह चुपचाप सील-मोहर लगा रहा है।शहडोल में आम नागरिक सुबह-शाम विकास की लाश की गंध, आँखों में मिर्ची और जहरीली हवा महसूस करता है। ट्रैफिक जाम में पेट्रोल-डीजल का धुआँ गैस चैंबर बनाता है। AQI मापने का कोई साधन आमजन के पास नहीं। इंदिरा चौक से बस स्टैंड तक 16 मीटर चौड़ी सड़क क्यों? गुरु नानक चौक से कमिश्नर बंगला तक चौड़ी सड़क क्यों नहीं? सड़क निर्माण और चौड़ीकरण में भ्रष्टाचार होता है, जिससे चुनावी फंड वसूला जाता है।प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ट्रैफिक दबाव और प्रदूषण पर कोई मार्गदर्शन नहीं देता। तालाब-नदियाँ नष्ट हो रही हैं, लेकिन चर्चा नहीं।सांसद-विधायक के फंड में 10% कटौती की बात आम है, लेकिन AQI यंत्र लगवाने में रुचि नहीं।
शुद्ध हवा का अंतिम क्षण और भविष्य की चिंता
केशवाही में पान खाते हुए शुद्ध हवा ने तात्कालिक सुख दिया, किंतु यह घमंड नहीं करना चाहिए। कोलरियाँ, पावर प्लांट्स, तीसरी रेल लाइन – सब आदिवासी क्षेत्र में प्रदूषणकारी उद्योग लाने के लिए हैं। नेता बोल नहीं पाते, दलाल सोचने नहीं देते। अधिकारी “चिड़िया रैन बसेरा” की तरह लक्ष्य पूरा करते हैं। चाटुकार उनका समर्थन करते हैं।जल्द ही बचा-खुचा शुद्ध हवा का क्षेत्र भी जहरीला हो जाएगा। शहडोल पहुँचते-पहुँचते शुद्ध हवा का झोंका सुनहरे सपने की तरह ओझल हो गया।हम गर्व से कह सकते हैं – हम प्रदूषित होते शहडोल के निवासी हैं……।
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