
पीएनजी अपनाओ या एलपीजी बंद: शहडोल के आदिवासी क्षेत्र के निवासी का पहला हक, या फिर नई साजिश?
हम आदिवासी क्षेत्र के निवासी हैं इसलिए आदिवासी भी हैं.., कह सकते हैं, इसलिए हमारे बुद्धि में यह बात बिल्कुल नहीं घुसती की डॉलर की कीमत 94 हो गई है.₹100 भी हो जाएगी.. तो हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता; जैसे पेट्रोल ₹60 से ₹100 हो गया तो भोग ही रहे हैं और आनंद से भोग रहे हैं ठीक उन् अंध भक्तों की तरह जिनका चरित्र और बेईमान बना दिया गया है पैसा देकर के और वह जोर से बोलते हैं वह अनुशासन प्रिय समाज के हिस्सा है ठीक इसी तरह को पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने स्पष्ट संदेश दिया—जहाँ पाइपलाइन बिछाने का काम पूरा हो चुका है, वहाँ घरेलू उपभोक्ताओं को तीन महीने के अंदर पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) अपनाना होगा, वरना एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति बंद कर दी जाएगी…सरकार का तर्क है कि यह एक ही ईंधन पर निर्भरता कम करने और पाइपलाइन नेटवर्क के विस्तार की कवायद है। लेकिन शहडोल (मध्य प्रदेश) जैसे पांचवी अनुसूची वाले अनुसूचित क्षेत्र में यह खबर “हम लोग” के लिए सिर्फ गैस की खबर नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों पर सीधा सवाल है….
———( त्रिलोकी नाथ )———–
इस खबर का शुद्ध शुद्ध संबंध “हम लोग” के द्वारा तैयार किया गया भारतके संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल क्षेत्र के लिए सुनिश्चित होता है. किंतु सवाल है कि यहां के तमाम आदिवासी और गैर आदिवासी वर्ग के निवासी में चेतना जिंदा भी है या नहीं.. की प्राकृतिक संसाधनों में पहला हक उनका है..
तो पहले समझ ले की विश्व व्यापी नकली तरीके से भारत में आई इस कोरोना( कॉविड19 )की तरह की आपदा में अवसर कहां ढूंढा जा और इस अवसर से कौन पूंजीपति को लाभ पहुंचाया जा रहा है। “आपदा ही अवसर है”यह नारा, व्यावसायिक सूत्र हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने हमें दिया था जब भारत में लाखों लोग मर रहे थे इस नारे का आगाज हुआ।जिन लोगों को पाइपलाइन के जरिए गैस उपलब्ध हो सकती है उनके सिलेंडर बंद हो सकते हैं…
शहडोल क्षेत्र संविधान की पांचवी अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्र घोषित है। यहां आदिवासी और गैर-आदिवासी निवासियों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक संविधान ने दिया है। कोयला, सीबीएम (कोल बेड मीथेन) गैस, जंगल, रेत और पानी से बिजली बनाने की अपार संभावनाएं यहीं हैं। आजादी से पहले हम इन संसाधनों के मालिक थे। आज भी शहडोल सीबीएम गैस का खजाना है, जो दुनिया को ऊर्जा देता है। फिर भी गांधी चौराहे पर गैस सिलेंडर के लिए लंबी लाइन लगती है। यह किल्लत नकली है। असली सवाल यह है—जब स्थानीय संसाधन यहीं हैं, तो पाइपलाइन कनेक्शन क्यों नहीं दिया जा रहा? और जब दिया जा रहा है, तो उसकी कीमत कौन चुकाएगा?
“आपदा ही अवसर है” का नारा हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सुना था। कोविड-19 की आपदा में भी यही सूत्र चला। अब पीएनजी नीति में वही सूत्र दोहराया जा रहा है। जहां पाइपलाइन पहुंच गई, वहां सिलेंडर बंद। जिन्होंने पहले ब्लैक में सिलेंडर खरीदे, अब पाइपलाइन के लिए नई रकम जेब से निकालनी होगी। प्रशासन का काम ट्रांसफर करना था, लेकिन धंधा गुजराती कंपनियों के हाथ में दिख रहा है। शहडोल से दिल्ली-चेन्नई तक गैस सिलेंडर पहुंच सकता है, लेकिन शहडोल में ही पाइपलाइन कनेक्शन क्यों नहीं हो पा रहा? क्या यही “व्यावसायिक सूत्र” है जो पांचवी अनुसूची वाले क्षेत्र में भी जेब में डाका डाल रहा है?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो स्वयं जनजातीय समाज की प्रतिनिधि हैं, शहडोल में आकर पांचवी अनुसूची के कानून PESA एक्ट को लालपुर हवाई अड्डे से लागू करने की घोषणा कर चुकी हैं। उन्होंने पूरे मध्य प्रदेश में दूसरी बार यह संदेश दिया। लेकिन जमीनी हकीकत में PESA का अमल कहां है? पार्षद से सांसद तक “नकली किल्लत” का राग अलाप रहे हैं। उपलब्ध कोयला, गैस और जंगल के संसाधनों का पहला हक स्थानीय निवासी को देने की बजाय वे दलाली और भ्रष्टाचार का रास्ता चुन रहे हैं। नेता जिनका जमीर मर गया है, वे “हम लोग” की चेतना को भी मरने नहीं देंगे।
प्राकृतिक गैस वितरण आदेश 2026 का उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा बताया जा रहा है। लेकिन शहडोल जैसे क्षेत्र में यह आदेश लागू होते ही सवाल उठता है—क्या यह आदेश पांचवी अनुसूची के संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है? जहां पाइप कनेक्शन तकनीकी रूप से संभव नहीं, वहां एनओसी पर एलपीजी जारी रहेगी। लेकिन शहडोल में तो संसाधन उपलब्ध हैं। फिर भी कनेक्शन देने में देरी क्यों? क्या यह जानबूझकर स्थानीय निवासियों को मजबूर करने की रणनीति है ताकि बाहर की कंपनियां मुनाफा कमाएं?
“हम लोग” जो संविधान बनाए थे, वे मूर्ख नहीं थे। पांचवी अनुसूची में स्पष्ट है—अनुसूचित क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय जनजातियों का अधिकार सर्वोपरि है। चेतना जिंदा है या नहीं, यह सवाल आज हर आदिवासी और गैर-आदिवासी शहडोलवासी को पूछना चाहिए। पीएनजी सुविधाजनक है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन जब तक स्थानीय संसाधनों का हक पहले स्थानीय निवासी को नहीं मिलता, तब तक यह नीति “ऊर्जा सुरक्षा” नहीं, बल्कि “स्थानीय असुरक्षा” का नया रूप लगेगी।
शहडोल की मिट्टी कोयला और गैस की खान है। यहां की चेतना को जिंदा रखना हमारा संवैधानिक कर्तव्य है। यदि सरकार वाकई ईंधन विविधीकरण चाहती है, तो पहले शहडोल जैसे क्षेत्रों में स्थानीय निवासियों को मुफ्त या न्यूनतम लागत पर पीएनजी कनेक्शन दे। PESA एक्ट को सख्ती से लागू करे। अन्यथा यह खबर सिर्फ गैस की खबर नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की नई लूट की कहानी बन जाएगी।
हम लोग तैयार हैं। सवाल जिंदा है। जवाब भी जिंदा होना चाहिए। अब दूसरा पहलू देख लेते हैं मान ले की गैस सिलेंडर वालों को तकलीफ होने वाली है अगर वहपाइपलाइन के जरिए गैस नहीं प्राप्त करते हैं तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए की जिन्होंने पहले से कनेक्शन ले चुका है उसे सिर्फ पाइप लाइन के जरिए गैस पाने के लिए ट्रांसफर करने का काम किस प्रशासन का है कि पहले ब्लैक के जरिए गैस सिलेंडर में पैसा आगी लगाया अब पाइपलाइन के जरिए कनेक्शन लेने के लिए ग्राहक के जेब मैं डाका डाला जाएगा..? अगर यह छोटी बात हम आदिवासी स्तर के निवासी जनों के समझ में आती है तो इन ऊर्जा स्रोतों में जिनका व्यापकभंडार शहडोल मी उपलब्ध है उन्हें पाइप लाइन के जरिए हस्तांतरित कर कनेक्शन क्यों नहीं दिया जा रहा है। यह बड़ा प्रश्न है क्योंकि पाइपलाइन के जरिए कनेक्शन देने का धंधा किसी गुजराती के हाथ में है और शासन इन गुजरातियों की दलाली करतीनजर आ रही है। अगर पेट्रोलियम पदार्थ एक गैस सिलेंडर का स्थानांतरण शहडोल से दिल्ली या चेन्नई हो सकता है तो शहडोल में ही सिलेंडर का कनेक्शन का स्थानांतरण पाइपलाइन के जरिए क्यों नहीं हो सकता तो क्या यही व्यावसायिक सूत्र के जरिए आपदा को अवसर बनाकर पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में भी निवासियों के जेब में डाका डाला जाएगा…? यह प्रश्न जिंदा लोगों के लिए जिंदा है किंतु नेता जो भ्रष्टाचार के जरिए राजनीति में कब्जा कर लिए हैं उनके जमीर मर गईहै…? शायद इसीलिए पार्षद से लेकर सांसद तक आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल में व्यापक भंडार वाले गैस कि नकली किल्लत बताकर उसे बढ़ावा देते नजर आ रहे हैं बजाए उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का पहला हक स्थानीय निवासी को दिलाने के ऐसा क्यों नहीं समझ जाना चाहिए तब “हम लोग” भारत का संविधान जो बनाए थे वह मूर्ख बनाने का धंधाहै क्या यह प्रश्न हमारे गरीब मन में उठता है और कोई बात नहीं….

