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पेसा मोबिलाइजर्स का भविष्य अधर में: आरजीएसए योजना समाप्ति के बाद आदिवासी क्षेत्रों में चिंता

    पंचायत राज व्यवस्था को मजबूत करने और विशेषकर अनुसूचित क्षेत्रों  में पेसा एक्ट (Provisions of the Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996) के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नियुक्त पेसा मोबिलाइजर्स वर्तमान में गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के पंचायत राज संचालनालय द्वारा जारी हालिया आदेश ने शहडोल, उमरिया, अनूपपुर, डिंडोरी, मंडला जैसे आदिवासी बहुल जिलों में कार्यरत हजारों युवाओं की आजीविका पर सवालिया निशान लगा दिया है।
पृष्ठभूमि: पेसा और मोबिलाइजर्स की भूमिका
पेसा एक्ट 1996 में लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में पारंपरिक ग्राम सभाओं को शक्तिशाली बनाना और स्थानीय संसाधनों, परंपराओं तथा स्वशासन पर उनका नियंत्रण सुनिश्चित करना था। मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों ने इसे लागू करने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर पेसा मोबिलाइजर्स (Gram Sabha Mobilizers) की नियुक्ति की।
ये मोबिलाइजर्स मुख्य रूप से ग्राम सभाओं को सक्रिय करना, पेसा कानून की जागरूकता फैलाना योजनाओं का प्रचार-प्रसार और ग्रामीणों को जागरूक करना, पंचायत बैठकों का समन्वयआदिवासी समुदायों में स्थानीय शासन को मजबूत करना कार्य करते थे: मध्य प्रदेश में लगभग 4,650 से 5,000+ (कुछ रिपोर्ट्स में 4,824 या 4,850) पेसा मोबिलाइजर्स कार्यरत थे। राज्य पेसा क्रियान्वयन में अग्रणी माना जाता है। अन्य राज्यों में भी नियुक्तियां हुईं — छत्तीसगढ़ में 5,632, महाराष्ट्र में पहले लगभग 3,000 । राष्ट्रीय स्तर पर कुल संख्या सार्वजनिक रूप से पूरी तरह संकलित नहीं है, लेकिन ये मोबिलाइजर्स पेसा राज्यों में ग्रामीण स्वशासन की रीढ़ बन चुके थे।
संकट का कारण: आरजीएसए योजना की समाप्ति
राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA)  — की अवधि 1 अप्रैल 2022 से 31 मार्च 2026 तक थी (XV वित्त आयोग के साथ समाप्त)। विभागीय पत्र में स्पष्ट किया गया है कि योजना समाप्त होने के कारण ग्राम पंचायतों के माध्यम से चयनित पेसा मोबिलाइजर्स की सेवाएं निरंतर जारी रखना संभव नहीं है। जिला पंचायत सीईओ को निर्देश दिए गए हैं कि तत्काल प्रभाव से मोबिलाइजर्स को सेवामुक्त करने की सूचना दी जाए। हालांकि, केंद्र सरकार से आगामी दिशा-निर्देश मिलने तक की स्थिति स्पष्ट की जाएगी।
युवाओं की चिंता और वास्तविकता
जब भर्ती हुई थी, तब पेसा एक्ट के क्रियान्वयन को स्थायी और भविष्योन्मुखी माना जा रहा था। राष्ट्रपति के शहडोल सहित विभिन्न कार्यक्रमों ने बाजार गर्म किया था। युवाओं ने इसे सरकारी नौकरी जैसा समझकर अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। अब अचानक सेवामुक्ति के आदेश ने आर्थिक संकट पैदा कर दिया है।
मुख्य मुद्दे:
कई युवाओं को समय पर मानदेय भी नहीं मिला।
कोई स्पष्ट पुनर्वास या वैकल्पिक रोजगार रोडमैप नहीं।
पंचायतें अब योजनाओं का जमीनी समन्वय कैसे संभालेंगी?
हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित।
क्या योजना वाकई समाप्त हो गई या जिम्मेदारी टाली जा रही है?
आरजीएसए योजना निश्चित रूप से 31 मार्च 2026 को समाप्त हुई, लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि पेसा जैसे महत्वपूर्ण कानून के क्रियान्वयन के लिए मानव संसाधन को अचानक क्यों छोड़ा जा रहा है? पेसा राज्य रैंकिंग 2024-25 में मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर रहा (महाराष्ट्र पहले), जिसमें पेसा वर्कफोर्स की डिप्लॉयमेंट एक महत्वपूर्ण इंडिकेटर था।
कुछ जिलों में पंचायतें स्वयं इन मोबिलाइजर्स की उपयोगिता स्वीकार कर रही हैं। उद्योगपतियों या अन्य क्षेत्रों में संसाधनों के दुरुपयोग की आशंकाओं के बीच, इन युवाओं को “हराम का खा रहे हैं” जैसे आरोप लगाना अनुचित लगता है, जबकि उन्होंने वर्षों ग्रामीण सेवा की है।
संभावित रास्ते और सुझाव
केंद्र-राज्य स्तर पर त्वरित निर्णय: नई योजना या विस्तार के तहत इन अनुभवी मोबिलाइजर्स को अवसर दें। उनके अनुभव का उपयोग PESA Gram Sabha को और मजबूत करने में हो सकता है।
पुनर्वास पैकेज: वैकल्पिक रोजगार, कौशल प्रशिक्षण या अन्य पंचायती राज योजनाओं में समायोजन।
राज्य स्तर पर फंडिंग: यदि केंद्र से तत्काल सहायता नहीं मिलती, तो राज्य अपने संसाधनों से कुछ पद बनाए रखे।पेसा मोबिलाइजर्स का मुद्दा केवल रोजगार का नहीं, बल्कि आदिवासी स्वशासन और पंचायती राज की जमीनी मजबूती का है। जब योजना चली, तब इन युवाओं से पूर्ण समर्पण मांगा गया; अब समाप्ति पर उन्हें बिना सुरक्षा के छोड़ना उचित नहीं। शहडोल जैसे क्षेत्रों में, जहां पेसा एक्ट को बड़े उत्साह से लागू किया गया, वहां इन युवाओं का भविष्य अधर में लटकना लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की भावना के विरुद्ध है। केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार से अपेक्षा है कि वे न केवल तत्काल राहत प्रदान करें, बल्कि पेसा क्रियान्वयन को दीर्घकालिक और स्थायी आधार दें। इन युवाओं की सेवा को व्यर्थ न जाने दें — वे गांव-गांव में पेसा के असली मोबिलाइजर साबित हुए हैं।

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