
नई दिल्ली, 12 अप्रैल।आदिवासी क्षेत्रों में सूदखोरी यानी महाजनी के जरिए छुपी सूदखोरी को संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित विशेष आदिवासी क्षेत्रों में प्रतिबंधित किया गया है इसके बावजूद भी खुलेआम बैंकर्स प्राइवेट फाइनेंस कंपनी के नाम पर या माइक्रो फाइनेंस कंपनी के नाम पर खुलेआम शहडोल जैसे क्षेत्रों में लूट का सूट सरकारी तंत्र के संरक्षण में जमकर कर रहे हैं ..औपचारिकता के नाम पर कुछ कार्यवाही प्राइवेट सूदखोरों के खिलाफ हो जाती है किंतु सिंडिकेट माफिया जो प्राइवेट फाइनेंस कंपनी के नाम पर खुली लूट मचाए हुए हैं… उस पर सरकारी तंत्र या तो लाचार है अथवा वह इसमें भ्रष्टाचार की भारी सफलता के साथ संरक्षण दे रहा है.. बहरहाल इस भयानक दौर में बहुत दिनों बाद लोकतंत्र कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की तरफ से एक सुखद नीतिगत फैसला आया है जिससे सूदखोरी के भाषा चक्रवृद्धि ब्याज पर कुछ तो रोक लगेगी ही इस आशय की एक खबर दैनिक समाचार पत्र में कुछ इस प्रकार से आई है…
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने कहा है कि बैंक ऋण चूक पर लगाए गए दंडात्मक शुल्क का.. पूंजीकरण नहीं कर सकेंगे। इसका मतलब है कि इस शुल्क को अलग से वसूला जाएगा और इसे बकाया मूलधन में जोड़ा नहीं जाएगा।
केंद्रीय बैंक के इस कदम से ऋण चूक की स्थिति में ग्राहकों पर लगने वाले अतिरिक्त व्याज को रोकने में मदद मिलेगी। आरबीआइ ने ‘निष्पक्ष उधारी गतिविधियां – ऋण खातों में दंडात्मक शुल्क’ पर अपने मसविदा परिपत्र में कहा कि दंडात्मक शुल्क की मात्रा चूक/ऋण समझौते के महत्त्वपूर्ण नियमों और शर्तों का एक सीमा तक पालन न करने के
अनुपात में होनी चाहिए। आरबीआइ के मौजूदा दिशानिर्देशों के तहत कर्जदाताओं के पास दंडात्मक शुल्क की वसूली के
लिए बोर्ड द्वारा अनुमोदित नीति को लागू करने की आजादी है। केंद्रीय बैंक ने अब इन गतिविधियों को सुव्यवस्थित करने के लिए मसौदा जारी किया है। मसविदे के मुताबिक दंडात्मक शुल्क लगाने का मकसद कर्ज लेने वालों के बीच ऋण अनुशासन की भावना पैदा करना और ऋणदाता को उचित मुआवजा दिलाना है। दंडात्मक शुल्क, अनुबंधित व्याज दर केअतिरिक्त कमाई करनेका साधन नहीं है।( sabharजनसत्ता )

