
“अरबों की लागत से बने मेडिकल कॉलेज शहडोल अंगूठा छाप डॉक्टरों की पोस्टिंग विगत दिवस मेरी कार दुर्घटना के कारण दाहिने पांव हड्डी में मामूली फ्रैक्चर हुआ और नौ पसलियों में भी मामूली फैक्चर हुआ जिस कारण मैं मेडिकल कॉलेज शहडोल में भर्ती हुआ तो पहले तो मुझे क्रिटिकल केयर के द्वारा मेडिसिन वार्ड में भर्ती कर दिया गया बाद में पता चला यह अस्थि रोग संबंधी विभाग का मरीज है तो ऑर्थो वार्ड में भर्ती किया गया वहां पर पदस्थ डॉक्टरों ने एक्सरे कराया और कहा कि कोई फ्रैक्चर नहीं है
2 दिन तक भर्ती रहा उसके बाद छुट्टी की गई किंतु जब मैंने बाहर जांच कराएं और अपनी जांच रिपोर्ट डॉक्टर मुकुंद चतुर्वेदी को दिखाया तो उन्होंने सिटी स्कैन कराया और बताया कि आपकी नौ पसलियों में फैक्चर है और दाहिने पैरकी हड्डी में भी मामूली फैक्चर है जिसका इलाज चल रहा है इस प्रकार यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि अरबों की मेडिकल कॉलेज में अंगूठा छाप डॉक्टरों की पोस्टिंग है”
_____(त्रिलोकीनाथ )_______
बिरसा मुंडा कॉलेज किस संबंध में यह पोस्टिंग मेरी नहीं है, एक ऐसे अधिवक्ता की है जो प्रखर होकर बोलते हैं यह प्रखरता का खंडन अभी तक मेडिकल कॉलेज की तरफ से नहीं आया है..? जिससे यह तो साफ होता है कि जो कहा गया है उसमें बड़ी सच्चाई है .अब सवाल यह है कि सब्जी मंडी की तरह चिकित्सा का धंधा करने वाले विक्रेता-गण यानी चिकित्सक की मोरल वैल्यू क्या रह गई है या फिर वह सिर्फ पैसा कमाने की एक मशीन रह गया है..?
शायद मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर भी यह जानते हैं कि आदिवासी क्षेत्र का बिरसा मुंडा कॉलेज यथा नाम तथा गुण के तहत अपनी शुरुआत में ही बहुत गंदा मैसेज दे गया था … बिना संसाधन के कोविड-19 हालात में उसे एक इमरजेंसी आइटम की तरह है आम जनता के लिए खोल दिया गया और बहुत ज्यादा भारतीय जनता पार्टी की वोट बैंक मशीन बढ़ाने के नाम पर इस कॉलेज को गाहे-बगाहे गाना गाया जाता रहा कि शहडोल में मेडिकल कॉलेज खुल गया है …लेकिन क्या मेडिकल कॉलेज, कॉलेज की गुणवत्ता के हिसाब से सक्षम है…? या फिर उसमें जैसा कि अधिवक्ता रमेश त्रिपाठी ने कहा है की अंगूठा छाप डॉक्टरलोगों की जमात यहां बैठी हुई है क्या यह भीड़ मेडिकल कॉलेज में बढ़ती जा रही है और वह अपनी संख्या बल के आधार पर इतने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को सिर्फ यूज एंड थ्रो के आइटम के हिसाब से काम कर रहे हैं…? अथवा जो चिकित्सक निकल रहे हैं वह इसे भी जिला अस्पताल की तरह सिर्फ एक बुकिंग सेंटर के रूप में रखना चाहते हैं…?
किसे नहीं मालूम शहडोल मेडिकल कॉलेज नाम की चिकित्सा का नया बुकिंग सेंटर, नए डॉक्टर बनाने की एक प्रयोगशाला है क्या जो नए डॉक्टर बनाए जा रहे हैं वह भविष्य में इसी प्रकार की ट्रेनिंग लेकर आम जनता को सिर्फ पैसा कमाने का माध्यम बनकर नागरिकों के बीच में फेंक दिए जाएंगे… सब जानते हैं कि को कोविड-19 के कार्यकाल में किस प्रकार की बड़ी लापरवाही के कारण 20 से 25 लोग आपात मौत के शिकार शहडोल मेडिकल कॉलेज की भयानक लापरवाही के कारण हुआ मेडिकल कॉलेज की टीम की यह सफलता थी कि इतनी बड़ी एकमुश्त मौतों को वह पचा गई… इसमें एक भी व्यक्ति दोषी नहीं ठहराया गया.
मान लेते हैं कि वह एक दौर था जिसमें गंगा मे लासे बहती थी इस हालात में अगर आदिवासी क्षेत्र के इस बिरसा मुंडा के डॉक्टर से या उसकी टीम लाशों की श्रृंखला निकाल दी है तो उसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए कितनी बड़ी दुर्घटना के बाद क्या शहडोल मेडिकल कॉलेज ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर अपनी गुणवत्ता और अपनी पब्लिक से समन्वय यानी मरीज परिवार से समन्वय अता सद्भावना कि विकास का कोई रास्ता खुला है…?
एक आईएएस अधिकारी जब यहां पर कंट्रोलर के रूप में बैठ गए तब डॉक्टरों को जमीर जैसे जिंदा हो गया और उस आईएएस अधिकारी को वहां से हटाना पड़ा जिसमें शायद देखने सुनने और समझने की शक्ति जन भावना के अनुरूप पैदा हो सकती थी..? इसके बाद मेडिकल कॉलेज लगातार चर्चा के केंद्र में रहा कभी संसाधन नहीं हैं तो कभी डॉक्टरों की अपनी तानाशाही इस पर हावी रही गाहे-बगाहे मूर्खतापूर्ण घटनाएं डॉक्टरों के बीच में जिस प्रकार से बढ़ गई और संख्या बल के कारण परिस्थितियों लाम बंदियां हुए उससे मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर तानाशाही की भाषा बोलने समझने और समझाने लगे हैं. चिकित्सा सेवा का धर्म शायद उनसे दूर चला गया है और उसी परिस्थिति को अधिवक्ता रमेश त्रिपाठी जो मौत का युद्ध लड़ कर एक बड़ी दुर्घटना से बचकर किसी तरह मेडिकल कॉलेज आए वहां पर उन्हें बेहद निराशा हाथ लगी …आशा तो यह थी कि उन्होंने यह टिप्पणी की है, उसका खंडन मेडिकल कॉलेज अपनी तरफ से करेगा और अगर वह नहीं करता है तो जिला प्रशासन या संबंधित प्रशासन इसका खंडन करेगा लेकिन इस प्रकार नहीं होने से दोषी डॉक्टरों का मनोबल बढ़ता चला जाएगा और मेडिकल कॉलेज सिर्फ एक मात्र गिरोह की शक्ल में उलझ जाएगा…? जहां पर मरीज डॉक्टर को भगवान समझ कर जाता है वहां पर वह मौत का शिकार भी हो सकता है.. क्या इन सब परिस्थितियों के लिए जो प्रखरता की बातें धोखे भी धोखे बाहर आ जाती हैं उनकी छानबीन कराया जाना समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है विधायक और सांसद तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई लेना-देना ही नहीं है यह बड़ा दुखद हालात हैं और आशा करनी चाहिए कि करोड़ों अरबों रुपए के इस बिरसा मुंडा के नाम पर जो पत्थर की बिल्डिंग खड़ी की गई है उसमें थोड़ा सा दर्द पैदा हो और वह आदिवासियों के लिए और अन्य लोगों के लिए भी हमदर्द साबित हो…

