
तो 20 साल शासन करने के बाद भाजपा की उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट आ गई इस तरह विधानसभा चुनाव की घोषणा
चुनाव आयोग ने चाहे किया हो या ना किया हो यह बात महत्वपूर्ण नहीं रहती सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी ने चुनाव की घोषणा कर दी है। इस लिस्ट में तीन केंद्रीय मंत्री सहित कई सांसद,विधायक पद के लिए उम्मीदवार बनाए गए हैं इसमें कोई शक नहीं की तीनों मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे.. कुछ अन्य नेता भी हैं जैसे कैलाश विजयवर्गीय यह विधायक बनने के लिए चुनाव नहीं लड़ेंगे। इनकी भी दावेदारी मुख्यमंत्री पद के लिए होगी इसमें कोई शक नहीं।
——————(त्रिलोकी नाथ)————
ऐसे में दो चीज सुनिश्चित होती हैं एक तो भारतीय जनता पार्टी को भली-भांति मालूम है कि वह चुनाव हारने जा रही है इसलिए उसने अपने सभी जोकर ताश के पत्ते में डाल दिए हैं। दूसरा यह की लालकृष्ण आडवाणी के द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रधानमंत्री के उम्मीदवार शिवराज सिंह चौहान की सत्ता के खिलाफ बगावत की घेर बंदी भी की गई है। की बस हो गया अब तुम मुख्यमंत्री नहीं रहोगे । स्वाभाविक है मध्य प्रदेश में राजनीति का जो तना-बना है सत्ता और विपक्ष के बीच में जो समन्वय दिखता है उसमें शिवराज सिंह का भारतीय जनता पार्टी में कोई विकल्प नहीं ठहराया गया है, ऐसे में इन नेताओं को जिसमें केंद्रीय मंत्री भी हैं उन्हें शिवराज सिंह के सामने खड़ा करके शिवराज सिंह की हैसियत का अंदाजा बताया गया है, कि तुम अब मध्य प्रदेश छोड़ दो। तथाकथित उन केंद्रीय मंत्रियों की ऐतिहासिक पद पर आ जाओ जहां पर व्यक्तिगत आभामंडल का कोई अस्तित्व ही नहीं है। “ओन्ली यस मैन” ।
कह सकते हैं इसमें क्या कमी है शिवराज सिंह में। शिवराज सिंह चाहे कितना भी अपना पाखंड रचे कि वह भी “शानदार यश मैंन” है किंतु जमीन से उठकर एक बड़े कॉर्पोरेट इंडस्ट्री की तरह यानी अडानी की तरह उन्होंने भाजपा के अंदर अपनी एक राजनीतिक पहचान पृथक से स्थापित की है। पैसे की कोई कमी नहीं है। किंतु वह पैसा “यस मेन” बनने के लिए पॉलिटिकल कॉरपोरेट सिस्टम खड़ा नहीं किया गया है। जो मोदी-शाह की जोड़ी को खटकता रहता है।
क्योंकि भाजपा के अंदर पॉलिटिकल कॉर्पोरेट सिस्टम सिर्फ एक ही हो सकता है और वह है “अडानी मॉडल” जिसके लिए 100 खून माफ। ऐसे मॉडल को कोई चुनौती दे यह मोदी-साह की जोड़ी को पसंद नहीं और इसीलिए शिवराज की सत्ता की घेरे बंदी के लिए दूसरी लिस्ट में कई प्यादे उतार दिए गए हैं। जिसमें आदिवासी, अनुसूचित जाति और ओबीसी भी हैं। इन मजबूत प्यादो को खड़ा कर स्पष्ट संदेश दे दिया गया है अबकी बार तुम नहीं ।
तो क्या यह कांग्रेस पार्टी को जो दिग्विजय और कमलनाथ की जोड़ी है उसे मोदी-शाह की तरफ से उपहार है..? स्वाभाविक है शिवराज नहीं तो कोई नहीं मध्य प्रदेश में। यही भाजपा की राजनीति का रंग है। तो क्या भारतीय जनता पार्टी अपनी अंदर की लड़ाई का महाभारत अपने चुनावी उम्मीदवारों की लिस्ट में घोषित कर रही है…? हां ऐसा माना जा सकता है।
और ऐसा हुआ भी है कांग्रेस के अंदर भी ….तब शहडोल जिले के पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे दलवीर सिंह कांग्रेस का बड़ा आदिवासी चेहरा रहे , प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे और एक सक्रिय
राजनीतिज्ञ थे । जिनमें काबिलियत थी कि वह पहले आदिवासीमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। यह बात कांग्रेस में कई नेताओं को हजम नहीं हुई। जब तक वह तथाकथित रेलवे स्टेशन में बीमारी के बाद उनकी मौत के रूप में बदल नहीं गई।
तो क्या यह खतरा अब शिवराज सिंह के लिए भी खड़ा हो गया है अगर वह आत्मसमर्पण नहीं करते हैं तो..? और स्वाभाविक है 20 साल की सत्ता के बाद कोई व्यक्ति गुलाम बनने के लिए काम तो नहीं कर रहा था… लेकिन उन्हें समझौता के तहत मोदी साहब से भविष्य में सम्मान कितना मिलेगा यह आर्थिक समन्वय की भागीदारी पर तय होगा और शिवराज सिंह क्या इसका बंटवारा करेंगे यह भी बड़ी बात है..?
क्योंकि बंटवारे की कीमत बहुत पहले लालकृष्ण आडवाणी ने लगा दी थी जब शिवराज सिंह को प्रधानमंत्री का दावेदार प्रस्तुत करने का काम किया था । बहरहाल अभी पिक्चर बाकी है चुनावी घोषणा हो या ना हो भाजपा के अंदर उसका-चुनाव-आयोग किस्तों में घोषणा कर रहा है, दूसरी किस्त में अपने मुख्यमंत्री के उम्मीदवारों की भी घोषणा मोदी-साह के द्वारा कर दी गई है। यह भाजपा की अपनी कार्यशैली है। कांग्रेस पार्टी फिलहाल भाजपा की इस कार्य शैली पर उदासीन दिखती है।क्योंकि उसे मालूम है भाजपा का आत्मसमर्पण ही कांग्रेस की जीत है ।बावजूद पूरा मध्य प्रदेश नीतिगत तरीके से पूंजीपतियों की लूट का अड्डा बना हुआ है ।
जमीनी धरातल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का गोद लिया हुआ शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र सड़कों में बड़े-बड़े गड्ढे बना दिए हैं। बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों जैसे मेडिकल कॉलेज इंजीनियरिंग कॉलेज आदि आदि जैसी संस्थाएं तो खड़ी कर दी गई है। किंतु उसमें गुणवत्तापूर्ण नियुक्ति के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। परिणाम स्वरूप अभी भी नागपुर की रेल गाड़ी की सेवा एक चमत्कार के रूप में पड़ोसी जा रही है और मुख्यमंत्री को भी लगता है कि नागपुर की रेलगाड़ी उन्हें वोट दिला सकती है तो फिर मेडिकल सुविधा के लिए बना मेडिकल कॉलेज क्या भ्रष्टाचार और लूट के लिए बनाया गया था की जो अभी भी पूरा आकर्षण नागपुर की स्वास्थ्य सेवाओं पर टिका है…? आदिवासियों की जमीनों पर भू माफिया, सरकारी खनिजों पर खनिज माफिया, निधड़क होकर अपने कार्य को अंजाम देता है. प्राकृतिक संसाधन पर स्थानीय व्यक्तियों का हक छीन लेना शहडोल में आम बात है अन्यथा कोयला वन से कुटीर उद्योग और नवीन सीबीएम गैस होने के बावजूद उसे सस्ती गैस का लाभ नहीं मिलना भी एक बड़ा मुद्दा है। ओरिएंट पेपर मिल्स का कागज जो दिल्ली में मिलता है इस रेट में शहडोल के यहां तक की फैक्ट्री के स्थान अमलाई के निवासियों को भी मिलता चला आ रहा है। उसके बदले पूरा सोन नदी का पानी से किसानों को लगभग प्रतिबंधित कर दिया गया था । अनूपपुर में तिपान नदी पर बनने वाले बांध को सिर्फ इसलिए निरस्त करके रखा गया ताकि पूंजी पतियों की गुलामी क्षेत्र का नसीब बन जाए। रिलायंस इंडस्ट्रीज जो गैस निकलती है वह बिना किसी अनुबंध के निकल रहा है, आदि आदि ढेर सारे मुद्दे अगर शहडोल में बिखरे पड़े हैं जिसमें बेरोजगारी और बेकारी इस प्रकार से फैल गई की धनपुरी की खदान के अंदर से कोयला चोरी के नाम पर चल रहा कुटीर तो कितनी लाशों को लील गया और कई लाशें उगल आए यह सब लोगों ने चुपचाप देखा है… फिर भी यह मुद्दे नहीं बनते, हाल में लगभगपूरे यात्री ट्रेनों को रद्द करके सिर्फ कोयले की गाड़ियों को निकलना क्या प्राकृतिक संसाधन की लूट का उदाहरण नहीं है..? या फिर “वंदे मातरम” जैसी महंगी ट्रेनों को मजबूरी में सुविधा के रूप स्थापित करने का काम मुद्दा नहीं है..? कमोबेश यही हालात मध्य प्रदेश में अलग-अलग जिलों में अलग-अलग मुद्दों के साथ जिंदा लाश के रूप में पड़े हुए हैं जिन्हें कोई राजनेता तवज्जो नहीं देता है .
किंतु कांग्रेस को भी मालूम है कि वह अपनी जीत के कारण नहीं जितती, वह जब भारतीय जनता पार्टी या उसका विकल्प चुनाव हारता है अपने करम से, तब वह चुनाव में जीत जाती है और यही सामंतवादी निष्ठा मध्य प्रदेश की राजनीति का मापदंड बन चुका है पिछले 70 साल में ।
इसीलिए भारतीय जनता पार्टी नए सिरे से मुख्यमंत्री का “पूरे जोकर का पत्ते “अपनी आंतरिक लड़ाई में फेंक दी है । अभी और भी जोकर आने बाकी हैं जोकर वह ट्रंप कार्ड होता है जो उपयोग करने के बाद किसी काम का नहीं होता। मध्य प्रदेश की राजनीति सिर्फ एक जुआ है राजनेताओं के लिए और कुछ नहीं। इसीलिए शोषणकारी राजनीतिक व्यवस्था में यही मध्य प्रदेश के नागरिकों का भाग्य है। अन्यथा भाजपा के अंदर चुनावी घोषणा हो जाने के बाद उनकी अपनी आचार संहिता की सबसे पहले हत्या कर दी गई है और वोटरों को पारदर्शी तरीके से नीतिगत तरीके से ब्यूरोक्रेट्स के जरिए खुला घूंस भी दिया जा रहा है ..अंतिम चुनावी पत्तों की तरह ताकि हाई कमान उनके ताश के पत्तों से भयभीत होना सीख ले। किंतु हाई कमान कोई ऐरा गहरा नहीं है वह अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी है जिसमें “अदानी-माडल” के नाम पर अरबों खरबों रुपए डूबा देने का साहस रखता है। ऐसे में मध्य प्रदेश की राजनीति में कितने समन्वय से राजनेता टिके रहेंगे यह भी देखने योग्य होगा। फिलहाल भाजपा का इस प्रकार से चुनाव की घोषणा करके केंद्रीय मंत्रियों को मुख्यमंत्री की भीड़ खड़ी कर देना सिर्फ शिवराज की सत्ता को भयभीत करना जैसा है… और अगर ऐसा नहीं है तो कमलनाथ और दिग्विजय की जोड़ी को उपहार देना भी है। तो देखते चलिए शोषणकारी व्यवस्था में और शोषण का आनंद लूटिए यही दूसरी सूची है तीसरी सूची और चौथी सूची औपचारिक हो सकती है । जब तक तथाकथित चुनाव आयोग अपनी घोषणा नहीं कर देता शोषणकारी नागरिकों को वोट डालने का अधिकार का…।

