
3 तारीख तक को रिजल्ट आया .3 राज्यों में और 13 तारीख तक भाजपा ने अपने शतरंज की विषात पर चिड़ी के गुलाम बैठा दिए.
अमूमन राजनीत में जो भी खिलाड़ी होते हैं वह शतरंज की खेल पर विश्वास करते हैं और यह इतिहास साक्षी रहा है की तमाम राजाओं ने शतरंज को ही अपना खेल चुना है भारत में लोकतंत्र 20वीं सदी में आयाऔर 21वीं सदी में नया अवतार 2014 में जन्म लिया इसका प्रचार सबसे ज्यादा कंगना रनौत फिल्मी नायिका ने किया जिसे बाद में पद्मश्री अवार्ड भी देकर सम्मानित किया गया . राजनीति में जब भी जुआ खेला गया है उसने महाभारत का युद्ध कराया है यह अनुभव गम्य है.21वीं सदी में इंडियन पॉलिटिकल इंडस्ट्री अपने कॉर्पोरेट सिस्टम के माध्यम से नैतिकता और विश्वास की तिलांजलि देती ही नजर आ रही है.
…………………….( त्रिलोकी नाथ )……………………..
कम से कम तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव के रिजल्ट के बाद यह कहा जा सकता है कि जो प्रयोग मोदी-शाह की भारतीय जनता पार्टी के दौर में संगठन के जरिए कम उम्र के जिला अध्यक्षों को बनाकर किया गया उसमें शायद उन्होंने अपने मूल्यांकन में सफलता देखी होगी..उनकी राजनीति के आधार पर सफलता प्राप्त की है अब वही प्रयोग 60 वर्ष से कम उम्र के नौ सीखिए मुख्यमंत्री बनाकर नया प्रयोग करने जा रही. कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री अगर इस प्रयोग में सफलता हासिल करती है तो इस देश का प्रधानमंत्री अगर भविष्य में अमित शाह का पुत्र जय शाह बना दिया जाए तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए……क्योंकि जय शाह ने उस क्रिकेट बॉर्ड पर अपना सिक्का चलाने का प्रयास किया है ,जिसमें कभी राजनीति के दिग्गज खिलाड़ी स्वयं को बैठा देखना चाहते थे;अलग बात है की ऑस्ट्रेलिया-भारत से किन परिस्थितियों में हार जाती है….लेकिन ऐसी हार भी “हार की जीत” की संभावना के तौर पर देखा जाता है.यही कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री की रहस्यमई रोग है .
कॉर्पोरेट पॉलीटिकल सिस्टम में सबसे बड़ा उदाहरण सहारा श्री सुब्रत राय, सहारा ग्रुप केचर्चित प्रमुखकी मौत के बाद देखने को मिला है…की नैतिकता की दुनिया में पिता को मुखाग्नि देने के लिए पुत्रों और पत्नी ने स्वयं को कष्ट नहीं दिया यानी वह भारत ही नहीं लौटकर नहीं आए.अलग बात है कि उसके व्यक्तिगत कारण थे या आपराधिक कारण थे.अन्य कोई रहस्य में कारण थे…किंतु यह परिणाम स्पष्ट रहा की सुब्रत राय सहारा को उनकी उपस्थिति के बिना इस दुनिया से विदाई लेनी पड़ी. क्रिकेट की प्रचार की दुनिया में पहला नाम सहारा ग्रुप का ही आता है.एक तरीका है जिंदगी को जीने का वह सहाराश्री ने हमें अपने सफल पॉलिटिकल कॉर्पोरेट सिस्टम में बताया .
भारत की राजनीति में कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री की स्थापना के बाद जो क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहे हैं उसमें युवाओं के प्रयोग के नाम पर जिन अनुभवी लोगों का अपमान हो रहा है उसमें राजा-महाराजा से लेकर जमीन से उठे समर्पित हिंदुत्व की विचारधारा वाले18 साल मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह भी एकव्यक्ति हैं.रमन सिंह, छत्तीसगढ़ और वसुंधरा राजे ,राजस्थान तो इस अपमान को शराब की घूंट की तरह पीने का प्रयास किया किंतु जमीन का आदमी शिवराज सिंह अपने लोकतंत्र यानी बची-खुची देश की पत्रकारिता का सहारा लेकर अपनी भावनाओं को पत्रकार वार्ता के जरिए सार्वजनिक कर दिया .शिवराज सिंह ने तो यहां तक संदेश दिया कि उसका जमीर जिंदा है या फिर वास्तव में इस अनुभवी खिलाड़ी को लोकतंत्र ने जीवित रहने का अधिकार दे रखा है.और वह उसी की चेतावनी अपने आला कमान को दे रहे थे.पत्रकार वार्ता के जरिए.क्योंकि पत्रकारिता ही भड़ास निकालने का एक अंतिम अस्त्र लोकतंत्र में कथित तौर बचा रह गया है.लेकिन कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री संगठन में जो अनुभव प्राप्त हुआ है उससे सिस्टम को मालूम है कि यह सिर्फ फड़फड़ाहट है,जो समय रहते खत्म हो जाएगा..यही उनके गुरु लालकृष्ण आडवाणी के साथ हुआ था.सब जानते हैं कैसे भाजपा का वह लोहपुरुष मोम की तरह पिघल कर रह गया था.
बहरहाल हम बातचीत करते हैं की क्या राजनीति में इन मार्गदर्शक नेताओं का कोई रोल नहीं होना चाहिए…? क्या राजनीति शतरंज की खेल की तरह न होकर ताश के जुए की तरह हो गई है…..जिसमें चरित्र मोहरे ना होकर चिड़ी के गुलाम… हो गए हैं,और इसका क्या फर्क पड़ने वाला है….तो एक बात अवश्य जानना चाहिए की अनुभव बताता है अगर इन अनुभवी राजनेताओं को सही ठिकाना नहीं मिला तो यह एक होकर कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री पर कोई बड़ा प्रहार करने वाले हैं ताकि आडवाणी जी की तरह पिघल ने मौत तमाशा ना बन जाए..जैसा की घुट घुट कर जी रहे राजनेताओं को हम देख रहे हैं…और दूसरी बात क्या अनुभव और वैभव प्राप्त करने के बाद कोई भी जिंदा राजनेता स्वयं के आत्महत्या की इजाजत स्वयं को दे सकता है…? कम से कम शिवराज सिंह की पत्रकार वार्ता से यह बात साफ होती दिखाई देतीहै; उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी से मांगने वाले नहीं है….
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चौहान ने कहा कि मुझे रोज पेड़ जरूर लगाने दे, इसके लिए मुझे कहीं सरकारी जमीन दी जाए, ताकि में पर्यावरण को बचा सकू।शिवराज सिंह ने चौहान ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि मुझे दिल्ली जाकर मांगना पसंद नहीं है। अपने लिए कुछ मांगने से बेहतर मरना पसंद करूंगा। शिवराज ने यह भी कहा की वह मध्य प्रदेश छोड़कर नहीं जाएंगे, वो यहीं रहेंगे।
इस तरह शिवराज ने हाईकमान को अपने संदेश दे दिया है की “मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहूं” सवाल यह है कि बूढ़े हो रहे इस राजनेता के को क्या हाईकमान स्वीकार करेगा अथवा उसे भी सत्ता की चार दिवारी पर कैद कर दिया जाएगा…? यह भविष्य की गणित में छिपा हुआ है. जिसे हम देखेंगे….
फिलहाल 2024 का लोकसभा चुनाव है,इसलिए कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री यह जोखिम नहीं लेगी, ऐसा लगता है. किंतु लोकतंत्र में जीत जाने का भरोसा कितना ताकतवर है उसे पर आलकमान को कितना घमंड है,इस बात पर निर्भर करता है. की जीत तो उनकी मुट्ठी में है ऐसे में इन बूढ़े हो रहे अथवा बूढ़े हो गए नेताओं को वह कितना तवज्जो देती है…?या फिर उन्हें अपने गुलाम के जरिए कितना सताती है …? इसलिए भी कहा जा सकता है की शिवराज,रमन सिंह और वसुंधरा राजे तथा ना दिखने वाले उनके जैसे भारतीय जनता पार्टी के अंदर बूढ़े हो चुके राजनेताओं को थका हुआ नहीं मानना चाहिए रहकर ही सही अथवा समय रहते हुए यानी 2024 के लोकसभा चुनाव के आर-पार इन्हें संतोषजनकपद परबैठाया जाएगा अन्यथा यह छत्रप मिलकर कॉर्पोरेट पॉलीटिकल सिस्टम इंडस्ट्री को तबाह कर सकते हैं…
.क्योंकि इन्हें यह साबित भी करना पड़ेगा कि उनके जमीरजिंदा है इसलिए भी क्योंकि उनके अपने बच्चे भी हैं वे उमा भारती नहीं है जो जो नाराज होकर गंगा की लहरों में आनंद लेने कासंदेश दें .उमा भारती को भी देखा है कि वह जब परेशान हो जाती थी तो शराब की दुकानों में पत्थर फेंकने लगती थी…क्योंकि ये नेता इतने बूढ़े नहीं हुए हैं कि किसी चार-दिवारी पर कैद कर दिए जाएं…तो देखते चलिए आगे होता है क्या-क्या…? किंतु इससे चिड़ी के गुलाम…देश की राजनीति को कहां ले जाएंगे कुछ कहा नहीं जा सकता जैसे एकनाथ के भरोसे महाराष्ट्र के फडणवीस पर फड़पड़ा रहे हैं…आजादी के लिए..? वैसे भाजपा के अंदर यह फड़फड़ाहट कितनी देर तक जिंदा रहेगी कुछ कहा नहीं जा
सकता…? वैसे जो परिस्थितियों है उसमें तो यही कहा जा सकता है की इन राजनेताओं को अपने मुख्यमंत्री के अधीन राज्य मंत्री भी बनाया जाता है तो उसे पूरी उत्साह का प्रदर्शन करते हुए सच को स्वीकार कर लेना चाहिए आखिर इन्हीं लोगों ने तो इस प्रकार की राजनीति को पकने का अवसर दिया था….?और कोई बात नहीं..क्योंकियह उमा भारती की तरहशराब दुकानों में पत्थर भी नहीं मार सकते….

