नए मुख्यमंत्री-मंत्रिमंडल का पहला फैसला

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 हमारे नए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के मंत्रिमंडल का पहला निर्णय आया है इसलिए इस पर थोड़ा विमर्श बनता है. कहते हैं पहली बार कोई लिया गया निर्णय पहले प्यार की तरह होता है . वह सरकार की पहली पसंद भी कहीं जा सकती है इन निर्णय में जहां श्रमिकों के मनोबल देते हुए तेंदूपत्ता में प्रतिबोरी ₹4000 की कीमत बढ़ाई गई है वहीं वातावरण स्वच्छ रखने और स्वस्थ परिवेश बनाए रखने के लिए ध्वनि प्रदूषण तथा खुले में मांस विक्रय को प्रतिबंधित करने के लिए भी एक अच्छा कार्य हुआ है। जिसकी लंबी समय से मध्य प्रदेश में जरूरत थी. किंतु इसका दुरुपयोग ना हो इस पर सतर्कता क्रियान्वयन में ईमानदारी की जबरदस्त आवश्यकता है.

   कई लोग इसे मजहबी नज़र से देखने का प्रयास करते हैं किंतु वास्तव में खुले में मांस विक्रय उस वर्ग के लिए बहुत प्रताड़नादायक था जो मांस प्रेमी नहीं हैं। क्योंकि उन्हें अनावश्यक दृष्टि में और आसपास के वातावरण में तथा मांसभक्षी ना होने के बावजूद भी मांस को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से खाना पड़ता था। यह मानवी स्वभाव के उस अधिकार के खिलाफ था जिसे वह पसंद नहीं करता था। जो लोग मांस खाते भी हैं उनके लिए भी यह सुरक्षित और स्वस्थ परिवेश में होना अत्यावश्यक था। क्योंकि मांस खाने वालों के लिए सुरक्षित व संक्रमण रहित स्थान की अति आवश्यकता थी। अन्यथा मानव सभ्यता क्रम में हम पशुवत जीवन को आगे बढ़ा रहे थे। इसी तरह ध्वनि प्रदूषण भी हमारे मनो मस्तिष्क को आहत करता है, ना चाह कर भी उस ध्वनि के दबाव को हमें बर्दाश्त करना पड़ता था जिसे हम पसंद नहीं करते थे। और जो हृदय गति के लिए कंपायमान था, किंतु जो इसे पसंद करते हैं वह बंद कमरे में बिना किसी को आहत किया अगर उपयोग करते हैं तो वह उनकी व्यक्तिगत समस्या अथवा आनंद का विषय हो सकता है, दूसरे के लिए सिर्फ प्रताड़ना का विषय होता है। मोहन मंत्रिमंडल का यह संवेदनशील निर्णय निश्चय ही उनकी दिशा और कार्यप्रणाली को प्रदर्शित करता है कि मानवीय संवेदना के प्रति सतर्कता, स्पर्श के लिए वे प्राथमिकता से काम करेंगे, ऐसा कहा जा सकता है। उत्कृष्ट स्कूलों की तरह उत्कृष्ट महाविद्यालय का सपना मध्य प्रदेश के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। जिसमें शैक्षणिक गुणवत्ता को आगे बढ़ाया जा सकता है किंतु जिस प्रकार से नई शिक्षा नीति पर बात बढ़ाई गई है उसमें भी परिणाम दायक पर शिक्षा की दिशा दिख सकती है। इस तरह मोहन मंत्रीमंडल का निर्णय पूत के पांव पालने पर कहे जा सकते हैं।यह अलग बात है जिन बातों को चुनाव में बढ़-चढ़कर केगारंटी के रूप में प्रस्तुत किया गया था शुरुआत में इस पर कदम नहीं बढ़ाया है यानी यह भी कहा जा सकता है “पूत सपूत तो का धन संचय, पूत कपूत तो का धन संचय…? इस दिशा में मोहन मंत्रिमंडल कितना मनमोहन होगा इसके भी रास्ते खुल गए हैं


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