आखिर शहडोल में अपराधी क्यों नंगा नाच करता है…? (त्रिलोकी नाथ)

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शहडोल  कलेक्ट्रेट के सामने जय स्तंभ चौक में एक सब्जी वाले ने एक व्यक्ति के ऊपर लोहे के वाट से हमला कर दिया और मारपीट किया ‌ वहां पर उपस्थित यातायात पुलिस ने हस्तक्षेप किया पुलिस को सूचना दी पुलिस अपने हिसाब से जब फुर्सत मिली तब वह कलेक्ट्रेट के सामने जैसे संवेदनशील जगह में आराम से पहुंची । बुढार रोड स्थित एक किराना दुकान के सामने खुलेआम गाली गलौज व मारपीट की घटनाएं हुई आमतौर पर यह घटनाएं होती रहती हैं । सवाल यह है की कानून व्यवस्था जिस चीज से आपराधिक मानसिकता नियंत्रित होती है उसको स्थापित करने की और कानून का भय अपराधियों के मस्तिष्क में भरा रहे इसके लिए हमारी पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था क्या चुस्त दुरुस्त है…? शायद नहीं।

                                           ————-(त्रिलोकी नाथ)————–

यह भी देखा गया है की शहडोल शहर में आमतौर पर युवा वर्ग नशा करके शराब गांजा ड्रग्स लेकर के खुलेआम मोटरसाइकिल में राजीव गांधी, नरेंद्र मोदी और सम्मानित अन्य स्थानीय नागरिकों के खिलाफ जोर-जोर से चिल्ला चिल्ला करके गाली देते हुए घूमते रहते हैं‌। पुलिस का कहना है कि वह नशे में है, तो क्या ऐसे नशा करने वाले लोगों पर नियंत्रण रखना पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है ..? अथवा पुलिस इस बात का इंतजार करती है कि अपराधी जब अपराध को अंजाम देगा तब पुलिस प्रकरण दर्ज करेगी और दर्ज प्रकरण में भ्रष्टाचार की संभावना को तलाशना प्रारंभ करेगी…?क्योंकि समान रूप से यदि शांति और व्यवस्था बन जाती है तो भ्रष्टाचार की संभावना लगभग खत्म हो जाती है।
धारणा सरकारी कर्मचारियों की यह हो चुका है कि उनका और उनके परिवार का पेट सरकारी तनख्वाह से नहीं पालता है बल्कि जब अपराधी अपराध को अंजाम देता है तब जो है उससे जो राशि आती है जिसे भ्रष्टाचार कि आय कहा जा सकता है सरकारी कर्मचारियों का पेट इसी आमदनी से भरता है और उनके परिवार भी इसी आमदनी पर गर्व करता है….?
अन्यथा क्या कारण है की कम से कम शहडोल मुख्यालय में आपराधिक मानसिकता पारदर्शी तरीके से निर्भय होकर अपराधों को अंजाम देने का काम करती है । वह एक आतंक का वातावरण बनाकर रखती है और पुलिस उसे नजरअंदाज करती रहती है। यह मानसिकता सिर्फ छुटेभैया रोड छाप अपराधियों में नहीं है बल्कि नेतागिरी और अपने पद के अहंकार में पल रहे लोगों ने तो इस व्यवसाय बना लिया है। क्योंकि उन्हें इस भ्रम पर विश्वास हो गया है पुलिस की औकात भ्रष्टाचार के पैसे पर टिक चुकी है। और कुछ मामलों में ऐसा अनुभव में देखा भी गया है ।

यही कारण है कि पहले रेत का माफिया अपने अहंकार में एक सरकारी पटवारी की कुचल करके हत्या कर देता है और बाद में एक पुलिस अधिकारी की हत्या कर देता है क्योंकि उसे मालूम है की कानून व्यवस्था नपुंसक हो चुकी है उसका पूरा पुरुषार्थ सभ्य समाज को प्रताड़ित करने का रह गया है.. क्योंकि मुकदमे भी दिखाने पड़ते हैं किंतु हाल में मध्य प्रदेश के अधिकारी दो शासकीय सेवकों की हत्या के बाद थोड़ा चिंतित दिखे..

प्रमुख सचिव खनिज निकुंज श्रीवास्तव के नेतृत्व में शहडोल में एक गोपनीय बैठक हुई हालांकि लोकतंत्र में ऐसी गोपनीय बैठक का प्रावधान कम ही है अगर वह सार्वजनिक तौर पर हो रही है। क्योंकि इस बैठक में पत्रकारिता से संबंध रखने वाला सरकारी तंत्र जनसंपर्क विभाग को अछूत बनाकर रखा गया। तो क्या अब सरकारी कर्मचारी पर भी उच्च अधिकारियों को भरोसा नहीं रह गया है। यह बड़ा प्रश्न है और उससे बड़ा प्रश्न यह है कि जिस दिन शहडोल में प्रमुख सचिव स्तर का अधिकारी उपस्थित रहा उस वक्त आपराधिक मानसिकता का एक आम सब्जी वाला पूरी पारदर्शी तरीके से अपने अपराध का जय स्तंभ चौक में खुलेआम वारदात को अंजाम दिया।
कहने के लिए पुलिस का प्रशासन तंत्र दुरुस्त है जिसने 2016 के फरार लोकप्रिय वारंटी किशोरी लाल चतुर्वेदी को 2024 में गिरफ्तार कर लिया रास्ते में पकड़ लिया और उस पर खूब वाह वाही लूटी। इसे सिर्फ यह साबित होता है यदि पुलिस चाहेगी तो अपराधी कहीं पर भी हो तत्काल पकड़ लिया जाएगा और यदि पुलिस नहीं चाहेगी तो आपराधिक मानसिकता शहडोल में जगह-जगह नंगा नाच करती रहेगी।
पंडित किशोरी लाल चतुर्वेदी इस प्रकार से सम्मानित व्यक्ति हैं जैसे कभी कोई विधायक या पदाधिकारी होता है वह जिला पंचायत शहडोल के उपाध्यक्ष भी रहे कहा तो यहां तक जाता है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए कभी वह काम करते थे । इसलिए उन्हें यहां पर तथाकथित संरक्षण मिलता था। इसे ऊंचे लोगों की ऊंची पसंद कहा जा सकता है।

बहरहाल हम बात कर रहे थे शहडोल में आपराधिक मानसिकता के बड़े हुए टुच्चे मानसिकता के लोगों की.. कि इनको आखिर कौन बढ़ावा देता है आखिर क्या कारण है की पुलिस और प्रशासन का भय आम नवजात आपराधिक मानसिकता के नशाखोर लोगों को बिल्कुल नहीं है.. वह कभी भी दिन हो या रात नशे की हालत में नंगा नाच करता रहता है… यदि उसके खिलाफ शिकायतें भी होती हैं तो उन्हें कानूनी दृष्टिकोण से नजरअंदाज किया जाता है। अथवा सलाह दी जाती है कि न्यायपालिका में मैं कोई आर्डर हो तो नियंत्रित किया जाए। इस हालत में अन्य आपराधिक मानसिकता पर संक्रमण हो जाता है यह धारणा प्रबल हो जाती है की कानून व्यवस्था जब इन अपराधियों के नंगे नाच पर नियंत्रण नहीं कर रहा है तो साफ है कि अपराधियों का मनोबल बढ़ाते ही चला जाना। उसी का परिणाम रहा हाल में शहडोल की घटनाओं का सरे आम हो जाना किंतु क्या पुलिस और प्रशासन इसके लिए सतर्क है…?

क्योंकि देखा गया है कि दो हत्याओं के बाद प्रमुख सचिव आए भी तो बंद कमरे में चीजों का निराकरण कर रहे थे आखिर क्या भूमिका है लोकतंत्र में या फिर वह कुछ और करने आए थे जिस किसी को पता ना चले और काम भी हो जाए अगर ऐसा होता है तो आदिवासी क्षेत्र में अभी कुछ और बड़ी घटनाएं सामने आ सकती हैं । यह बड़ी बात नहीं।लेकिन कम से कम शहडोल मुख्यालय में कानून व्यवस्था बनाकर रखने वाला चाहिए क्योंकि यहां पर उच्च अधिकारी वर्ग हैं कभी भी कोई भी आम जनता की तरह कहीं भी शिकार हो सकता है इसलिए कानून और व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक रूप से अवमनना करता है खासतौर से आपराधिक मानसिकता का व्यक्ति खुलेआम करता है उसे सार्वजनिक रूप से वैसे ही दंडित करना चाहिए जैसे की किसी गंभीर अपराधी को दंडित किया जाता है देखते हैं प्रशासन और पुलिस कितनी सक्षमता से अपनी योग्यता का प्रदर्शन करती है अथवा पूरी योग्यता आम सभ्य शहरी के लिए बनाई गई है अपराधियों के लिए नहीं यही साबित होगा……


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