
शहडोल। आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल को भलाई राष्ट्रपति द्रोपति मुर्मू स्वयं शहडोल में आकर के यह परिचय दे गई हों कि यह भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में सुरक्षित क्षेत्र है लेकिन वास्तव में उनके कहीं घोषित की गई बातों को ना तो शासन और ना ही प्रशासन ऐसा लागू करने में प्रतीत नही होता दिखता है. परिणाम स्वरुप यह देखने में खुलेआम देखने लगा है कि किस प्रकार से शहडोल बुढार रोड के राष्ट्रीय राजमार्ग मुख्य मार्ग स्थित पड़ने वाले सभी गांव में आसपास आदिवासियों की जमीनों पर भू माफिया बेनामी तौर पर खरीदी बिक्री कर रहे हैं। आए दिन भू माफियाओं के द्वारा धुरवार विशेष गांव में जो कि अभी तक लगभग शांति प्रिय गांव था नव धनाड्य पूंजीपति आपराधिक मानसिकता का भू-माफिया अपनी सक्रियता व घुसपैठ बना रखा है। कई आदिवासियों की जमीन है बेनामी तौर पर खरीद ली गई है और इन जमीनों से लगे हुए अपने गैर आदिवासी क्षेत्र के प्लाट को भी सामान्य प्लाट के रूप में खंड-खंड बताकर प्लाटिंग करके विक्रय कर रहे हैं। उनके पास ना तो कॉलोनाइजर के तहत कोई अनुमति होती है और ना ही इन्हें कोई रोकने रोकने वाला नेता दिखाई देता है। रही अधिकारियों की बात तो हर पटवारी और तहसीलदार और गांव का सचिव इनके फेके गए भ्रष्टाचार के टुकड़े में अपना जीवन यापन करना सिद्धांत बना लिया है।
धुरुवार गांव के किसान समाजसेवी सुशील कुमार शर्मा का मानना है यदि आपराधिक मानसिकता को बढ़ावा देने वाले इन भूमाफियाओं को शीघ्र नियंत्रित नहीं किया जाता है तो उनके द्वारा अवैध रूप से जो बेनामी संपत्तियों खरीदी और विक्रय की जा रही हैं उसे इस क्षेत्र में कभी भी खूनी वारदात का जंग देखने को मिल सकता है। जिसमें अनावश्यक आम आदमियों को पीसना पड़ेगा।श्री शर्मा का मानना है की शहडोल को संभागीय मुख्यालय तो बना दिया गया किंतु उसके आसपास के जितने भी गांव हैं विशेष का धुरबार गांव जो बुढार रोड के नेशनल हाईवे से मिलता है जिसका बड़ा भू भाग हथियाने की होड़ में भू माफिया आए दिन विवाद करता रहता है। टुकड़े-टुकड़े गैंग के रूप में वह माफियाओं ने इस क्षेत्र में आम किसानों का जीना दूबर कर दिया है।
लोगों को नशा पत्ती खिला-खिला कर पटवारी और तहसीलदार से मिलकर के आदिवासियों की जमीनों को यह आश्वासन देकर खरीदा जाता है कि पैसा मिलने पर पैसा दे दिया जाएगा इसके बाद भी उन्हें पूरा पैसा नहीं मिलता। ऐसा ही एक मामला ग्राम गोरतरा के संसतिया बैगा का हुआ था जहां भू माफिया सोनी ने बेनामी तौर पर जमीन को खरीद लिया और पूरा पैसा भी संसदीय को नहीं दिया बाद में पटवारी से मिलकर जमीन अपने बेनामी त्रेता आदिवासी के नाम पर कर दिया। आज भी मामला फंसा हुआ है और संसदीय बैग और उसका परिवार सड़क में आने को मजबूर हो गया है और वह भू माफिया के चंगुल में फंस जाते हैं।ग्राम गोरतरा में सिंन्हा परिवार ने सरकारी अभिलेखों में हेराफेरी करके जमीनों को बिक्री कर दिया है राष्ट्रीय राजमार्ग में तमाम आदिवासियों की जमीन पर या कांग्रेस के अथवा डॉक्टर परिवार हो या वकील हो माफिया के रूप में अवतरित हुए हैं कुछ मामले खुलकर सामने भी आए हैं किंतु कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं दिखाई दे है जिसमें आदिवासियों का हित सुरक्षित हो.
सुशील कुमार शर्मा का मानना है कि जब तक कोई विशेष टीम इस क्षेत्र में वह माफिया को चिन्हित करके उन पर नियंत्रण पूर्ण कार्यवाही नहीं करती यह पूरा क्षेत्र अपराधी पृष्ठभूमि के के भूमाफियाओं का अड्डा बन जाएगा और जो अपराध अभी चोरी छुपी हो रहे हैं वह सार्वजनिक तौर पर हिंसक रूप में सामने आ जाएंगे।
देखा भी गया है कि भू माफिया पहले भ्रष्टाचार के जरिए प्रशासनिक अमले के साथ मिलकर नूरा-कुश्ती करता है बाद में वह किसी पटवारी या पुलिस वाले की हत्या करने में भी जरा भी संकोच नहीं करता है। हालांकि प्रशासन ने इन दो हत्याओं के बाद कुछ हरकत उच्च अधिकारियों द्वारा दिखाई गई है किंतु अभी उसका असर जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं दे रहा है जिसका परिणाम ग्राम धुरवार,गोरतरा,जमुई, कंचनपुर हरि में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है जहां की भूमिया राजस्व निरीक्षक और पटवारी से मिलीभगत करके मनमानी तरीके से जमीनों का हेरफेर कर रहे हैं. जिससे आम ग्रामीण निवासी बुरी तरह से परेशान है. ग्राम कंचनपुर में मुख्य मार्ग से लगी जमीनों पर पटवारी द्वारा किसी के जमीन ,किसी के हिस्से में नापी जा रही है.. जो विवाद का कारण बन रहा है ऐसा नहीं है कि उच्च अधिकारी निर्देश नहीं दे रहे हैं किंतुराजस्व निरीक्षक और पटवारी लोगअपने भ्रष्टाचार के चलते समस्याओं को नजरअंदाज करते हैं. कंचनपुर निवासी सेवानिवृत्ति शंभू नाथ द्विवेदी का कहना है एक तो कई मामलों में सीमांकन और नक्शा तरमीन किया नहीं जा रहे हैं जो किया जा रहे हैं उसमें भूमिया हिंत में काम किया जाना देखा जा रहा है सरकारी कर्मचारियों को ईमानदार तरीके से ग्रामीण क्षेत्र में जमीनों का नाप करना चाहिए अन्यथा उनके कारण ग्रामीणों में आपस में मतभेद पैदा होता है जो हिंसा का कारण बनता है..

