24 के सभी खट्टे-मीठे सपने, रजत जयंती में सुखद बहार ले आएंगे.. ( त्रिलोकी नाथ )

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    कल के सुबह हम 21 में सदी के रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर जाएंगे.. 2024 का अंतिम दिन हमें अवश्य विचार करना चाहिए की शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में क्या विशेष हो पाया…? हर व्यक्ति को यह मंथन करना ही चाहिए । क्योंकि हम सिर्फ कीड़े मकोड़े पेड़ पौधे नहीं है..
 शहडोल नगर की दृष्टिकोण से देखें तो सार्वभौमिक नगरीय व्यवस्था लगभग चलती का नाम गाड़ी रही। तालाबों का संरक्षण विनाश की दृष्टिकोण से हुआ सड़कों का विकास सिर्फ भ्रष्टाचार के लक्ष्य प्राप्ति तक ही सीमित रहा और नगर पालिका के मुख्यमार्ग में भ्रष्टाचार की खेती सड़कों पर अतिक्रमण करती शहडोल स्तर की गगनचुंबी इमारतें  उत्तम फसल के लिए बोई गई। अगर निर्माण के वक्त ही सड़कों को सुरक्षित नहीं किया जा सकता है तो निश्चित रूप से वह अधिकारियों और नेताओं की भ्रष्टाचार की खेती के रूप में उनकी प्यास बुझाता रहेगा।तो अच्छे काम भी होने ही चाहिए अगर चिन्हित हो तो अवश्य शेयर करना चाहिए। पूरा कशम कश सिर्फ स्वयं को जिंदा रखना की कयावद पर निर्भर रहा।

——————( त्रिलोकी नाथ )————-
किंतु जो बेहतर हुआ उसमें नई परंपराओं में शहडोल के निर्माता शंभूनाथ जी शुक्ल की मूर्ति के सामने उनकी स्मृतियों में बेहतर प्रदर्शन करना एक अच्छी परंपरा रही लेकिन पंडित शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय में शहडोल के निर्माता के लिए उनके दृष्टिकोण में शहडोल की संभावनाओं पर कभी भी विचार होता नहीं देखा गया, यह वैचारिक शून्यता विश्वविद्यालय की स्थिति को प्रदर्शित करता है कि आम “ट्राईबल हॉस्टल” की तरह विश्वविद्यालय भी स्वयं को चलाने में लगा हुआ है। इससे कम अमरकंटक विश्वविद्यालय में भी कुछ ऐसा युवा विचार प्रस्तुत नहीं किया, जिससे उसकी उपयोगिता शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र के संदर्भ में उसके विकास में उसके निर्माण में सुनिश्चित हो सके। ऐसा प्रदर्शन देखने को नहीं मिला..।
     एक बड़े सपने के रूप में “सरसी -आईलैंड”बाणसागर में पर्यटन का आकर्षण का केंद्र रहा… चर्चा तो यह भी है कि सपनों का संसार इसी व्योहारी क्षेत्र में “फिल्म सिटी क्षेत्र” के रूप में विकसित होगा…. जहां बिना क्षेत्र की साहित्य और कला को पंख लगेंगे किंतु उसमें भी उससे प्रभावित व्यक्तियों को मुआवजा अभी तक में मिलने की शिकायतें भी आई हैं.
खबर तो यह भी है की गंगा अब सोन में आकर मिलेगी.. यानी बाणसागर से पानी शहडोल लाया जाएगा ताकि लोगों की प्यास बुझ सके… यह पानी अमरकंटक कब जाएगा यह भविष्य की गणित में छुपा हुआ है.. लेकिन प्रकृति प्रवाह के विरुद्ध विकास की अवधारणा में|
हालांकि हमने क्या खोया, क्या पाया.. बीते वर्ष में इसके लिए बिंदुवार इसलिए भी नहीं सोचा जा सकता क्योंकि अब शासन अथवा प्रशासन की तरफ से उस स्तर की पत्रकार वार्ता नहीं होती है.. जिसमें इन पर चर्चा हो।
यह अवश्य कह सकते हैं कि बीते 15 नवंबर को जब महामहिम राज्यपाल और मुख्यमंत्री बाण गंगा में आए तब ऐसा जरूर कुछ हुआ कि वह सार्थक अभिव्यक्ति होते हुए भी निरर्थक व दमन का स्रोत बनकर रह गया। इसमें कोई शक नहीं कि पत्रकारों की बात को जब नहीं सुना गया तब उन्होंने सहज आदिवासी क्षेत्र के निवासी होने के नाते अपनी लोकतंत्रिक अभिव्यक्ति प्रदर्शित की। उसके परिणाम भी तात्कालिक तौर पर देखे गए। किंतु इस आदिवासी विशेष क्षेत्र में उस पत्रकारिता को मजबूत करने का काम लोकतंत्र के तीन स्तंभ के द्वारा नहीं किया जाएगा तो यह सब होता ही रहेगा…21वीं सदी की रजत जयंती में पत्रकारिता का दमन अथवा विकास इसी पर निर्भर करता है। कि वह क्या परिणाम देती है।

बीते वर्ष जनजाति क्षेत्र में पेसा एक्ट को लेकर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की प्रतिबद्धता बार-बार प्रकट हुई है किंतु जनजाति समाज की राष्ट्रीय राजनीतिक मुख्य धारा में सहभागिता देखने को लगभग नहीं मिली… माफिया नुमा सिस्टम राजनीति में हावी रहा. शहडोल क्षेत्र की जिला पंचायतों ने ऐसा कुछ नहीं किया जिसमें “पेसा एक्ट” जो जनजाति समाज के अथवा क्षेत्र के हित के लिए बना है वह मजबूत होता दिखाई दे…. यह अलग बात है कि इसके बनने के दो दशक बाद एक बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने और दूसरी बार राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने लागू करने का संकल्प दोहराया… इसे राजनीतिक इच्छा शक्ति कितनी कमजोर है वह भी प्रमाणित हुई है। क्योंकि परिणाम ही प्रतिफल को प्रमाणित करता है।अब यह अवधारणा भी जब मजबूत हो रही है की जो भारतीय जनता पार्टी का सदस्य नहीं है वह वास्तव में भारतीय नागरिक हक पाने का स्वतंत्र अधिकारी भी नहीं है.. इसके बावजूद जो आदिवासी आरक्षण को छोड़ दें, भाजपा के सदस्य हैं वह भारतीय जनता पार्टी की शहडोल क्षेत्र में सांगठनिक इकाई में उभर कर आते नहीं दिख रहे हैं… दो दशक बीत जाने के बाद भी आदिवासी नेतृत्व भाजपा के संगठन में लगभग मरा हुआ है…, यह राजनीतिक शून्यता संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित शहडोल क्षेत्र के आदिवासियों को कितना पीछे ले जाएगी अथवा इसके क्या परिणाम होंगे यह तो भविष्य बताएगा… किन्तु निश्चित रूप से देश की 75 साल बाद भी आदिवासियों की राजनीतिक नेतृत्व की दुर्दशा शहडोल के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा कर पाने में असफल प्रमाणित हुआ है.
21वी सदी में जब 25 वर्ष के रजत जयंती में हम प्रवेश करेंगे तब शहडोल मैं औद्योगिक उत्थान का संभावनाकी उड़ान के लिए में “रीजनल इंडस्ट्रियल कांक्लेव”क्षेत्रीय औद्योगिक सम्मेलन”धरातल पर होगा।अभी से कह सकते हैं 100% की शहडोल का ही नहीं देश का भी एक भी आदिवासी मूल प्रकृति का व्यक्ति देश की 75 साल की आजादी के बाद इसमें भाग नहीं लगा…. यह सुनिश्चित है ।उसके द्वारा इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट की कल्पना अभी भी हजारों साल दूर है बावजूद इसके की हजारों साल से आदिवासी समाज, आदिवासी क्षेत्र की समस्त प्राकृतिक संपदाओं का मालिक रहा है… और लगातार बाहर के इन्वेस्टर अंग्रेजों की तरह इस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदाओं का दोहन करके लूट कर चले जाते रहे हैं.., जनजाति समाज के हिस्से में सिर्फ यही लूटपाट की जूठन देखने को मिली...

अगर 75 साल बाद भी देश की आजादी इतनी ही गुलाम है कि उसके अपने घर में जब “रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव” हो तो उसमें वह अंतिम पंक्ति में अंतिम व्यक्ति के रूप में भी खड़ा ना मिले इससे आजादी के प्रणेता महात्मा गांधी का वह सपना अभी भी सपना ही है की अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति को न्याय कब मिलेगा..? यही हालत कांग्रेस पार्टी या अन्य राजनीतिक दलों में राजनीतिक चेतना की है… इससे कम नहीं… और भारत के संविधान में सुरक्षित आदिवासी विशेष क्षेत्र की स्थिति “गौरवपूर्ण संविधान की 75 साल की यात्रा” का चित्रण हम गृहमंत्री के उसे वक्तव्य की “अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर ,अंबेडकर ,अंबेडकर, अंबेडकर.. इतना कहा होता तो सात जन्मों का स्वर्ग मिल गया होता..” की तरह अभी भी आदिवासी विशेष क्षेत्र में पूरी तरह से काल्पनिक है।स्वाभाविक है इसके परिणाम सुखद नहीं होंगे।
बावजूद इसके उपलब्धियां को अस्वीकार नहीं किया जा सकता शहडोल से खेल में राष्ट्रीय मुख्य धारा में पहचान बनाने वाले तमाम खिलाड़ी संभावनाओं का सूरज उगाते हैं वह प्रदर्शित करते हैं कि अगर खेल में प्रतिभा प्रकट होती है तो राजनीति में प्रशासन में अथवा पत्रकारिता में प्रतिभाएं क्यों प्रकट नहीं हो पा रही हैं..?अगर सिर्फ जीना-खाना और मर जाना.. जिंदगी है तो आजादी के पहले भी यह जिंदगी खासतौर से आदिवासी विशेष क्षेत्र में सुरक्षित रही है.. यह हमेशा हमें याद रखना चाहिए। क्या दमन, आजादी के पूर्व अच्छा था अथवा आजादी के बाद….? इस पर भी चिंतन सार्वजनिक होना चाहिए।

shahdol tiger killed woman   जंगल का बाघ शहडोल के बूढ़ी देवी के आसपास दिखा भी और एक महिला को भी खा गया जो हमको यानी शहडोल संभागीय मुख्यालय को भी जंगल में रहने का प्रमाण पत्र देता है.. अब इसमें गर्व करना है तो गर्व करिए और शर्म करना है तो शर्म भी कर सकते हैं कि हम विकास की किस अवधारणा में जी रहे हैं.. यह अलग बात है की करने में मुआवजा भी मिलने का प्रावधान हैजबकि धान के बड़े-बड़े स्टोरेज अभी भी वन क्षेत्र में खुले में रहते हैं और कुप्रबंधन के कारण किसान की मेहनत की कीमत पैसे में भ्रष्टाचार के लिए पानी में भिगो दी जाती है.

2025 का सूरज हमें सुखद अनुभूतियों का ऊर्जा प्रदान करेगा.. इसकी शुभकामना हम करें, इसी अनुभूति के साथ 2024 के सभी खट्टे-मीठे सपने सुखद परिवर्तन का बहार लेकर आएंगे वही हमारे सपने होंगे इन्हीं शुभकामनाओं के साथ 2025 की हार्दिक शुभकामनाएं…

 

 


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