भारत की आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रेम प्रवाह का कोई विकल्प नहीं… ( त्रिलोकीनाथ )

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भारत की आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रेम प्रवाह का कोई विकल्प नहीं 

साम्राज्यवादी ताकतों कारण तिब्बत से निर्वासित पूरा तिब्बती समाज का राजधानी दिल्ली में केंद्र “मजनू का टीला”जहां पर 10-12 मार्च को विद्रोह दिवस के रूप में आध्यात्मिक ऊर्जा को जगाए रखने का काम किया जाता है। यह हमें देखने को मिला, मन में एक शांति हुई की आध्यात्मिक ऊर्जा को जैसे भी हो उनके अपने रास्ते पर उनकी निष्ठा बाजारबाद से प्रभावित नहीं है। कोई प्रतियोगिता नहीं है कब्जा करने की कोई चाहत भी नहीं है।किंतु आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र भारत में अपने ही देश में उनके अपने ही सत्ताधीशों के स्वार्थ में सनातन आध्यात्मिक ऊर्जा के कई मार्ग हैं जिसका व्यवसायीकरण हो गया है सभी आध्यात्मिक केंद्रों को पूंजीपतियों और बाजारों के लिए सरकारों ने उन्हें खोल दिया है। पैसे का बोलबाला हो गया है। और आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र के स्थान पर वर्तमान में जो टीआरपी बाजारीकरण व्यवस्था को नियंत्रित करती है वह भोग विलास की वस्तु बन गई है।                                        (त्रिलोकी नाथ)

इस कारण प्रयागराज का आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र महाकुंभ जो हर 12 वर्ष में हिंदू सनातन परंपरा को एक मत होने के लिए एकत्र करता है वह बाजारबाद के सोशल मीडिया टीआरपी का केंद्र बनकर रह गया। उसका परिणाम भी देखने को मिला हांसिल आई शून्य के तर्ज पर निष्कर्षत: आईआईटी बाबा और मोनालिसा उभर कर आए…। जो इस महाकुंभ की विसफलता है‌। इस क्षेत्र में राज्य के मुख्यमंत्री गोरखनाथ पीठ के प्रमुख महंत आदित्यनाथ ने भी इसका बजारीकरण के रूप में उपयोग किया और आध्यात्मिक धनाढ्य साधुसंतों और आम व्यक्तियों के संगम को प्राथमिकता मिले, उसकी जगह है कुछ निमंत्रित किए गए और कुछ हायर किए गए पेड आमंत्रित लोगों संपूर्ण प्राथमिकता सुरक्षा कवच से देकर उसका इवेंट बनाया गया और व्यवस्था तथा अराजकता का आलम यह हुआ, जिसका परिणाम सबके सामने आया दिल्ली से लेकर प्रयागराज तक आम आदमियों के लाशों के ढेर लग गये। टीआरपी काउंट करने के युग में डिजिटल कैमरे धरे के धरे रह गए। वे लाखों-करोड़ों की संख्या की भीड़ को बताते रहे लेकिन जो आम आदमी इस अराजकता में दुर्घटना का शिकार हुआ वह मर गया उसकी पहचान भी मुख्यमंत्री आदित्यनाथ उसे नहीं दिला पाए जो उसका मानवीय हक था।

  कारण चाहे जो भी हो किंतु सच बात यह थी की गंगा यमुना और सरस्वती के इस विशाल महाकुंभ में झूठ का साक्षीकरण पारदर्शी तरीके से किया गया। और यह सिद्ध किया गया की भीड़ की भेड़ चाल में अगर वह आध्यात्मिकता की भीड़ है तो भी वहां झूठ का बोलवाला ही रहना चाहिए। कुंभ तो चला गया अभी उसके धमक गाहे बगाहे जब तक राजनेता बजाते रहेंगे क्योंकि उन्हें मालूम है कि इसका नशा बजाने से वह जनता खुश हो जाती है। जो उसका वोट बैंक है।
इन सबसे हटकर दूर इसी उत्तर प्रदेश के वृंदावन में भक्ति मार्ग के पथिक प्रेमानंद जी महाराज का संकल्प रहा कि वह “श्रीधाम” के 84 कोश अलावा किसी अन्य जगह नहीं जाने का संन्यास ले रहे हैं.. उनकी प्रेम-धारा इस कलयुग में आश्चर्य जनक तरीके से प्रबल प्रवाह से बह रही है. वास्तविक आध्यात्मिकता का बड़ा मेला । जब बेशर्म राजनीति लोगों की धार्मिक भावना को लूटकर उसका ध्रुवीकरण करके अपना वोट बैंक तलाश रही है। तब भक्तिमार्ग के पथिक चेतना के प्रकाश पुंज बने हुए हैं और लोगों को वास्तविक आध्यात्मिक जीवन का अर्थ न सिर्फ बता रहे हैं बल्कि व्यक्तिगत तौर पर आम आदमी अनुभव भी कर रहे हैं। लोग उस अनुभव जिसका संज्ञा में नाम “राधा राधा राधा” है को धमक भारत भूमि ही नहीं विश्व की तमाम देशों के लोग अपने जीवन के अर्थ को समझने में लगे हैं। और आध्यात्मिक जीवन के उत्थान में प्रेम के आनंद को संग्रहित कर रहे हैं। तथा उसको स्वीकार भी रहे हैं। जिससे मानवता को जबरदस्त लाभ मिल रहा है। और मनुष्य होने का अर्थ प्रकृति के रूप में उसकी जिम्मेदारी को समझना के प्रयास भी हो रहे हैं। “जियो और जीने दो…” के सिद्धांत पर प्रेमानंद का प्रेम प्रवाह इस कदर एक कमरे के अंदर से अध्यात्म के आनंद के प्रेम स्त्रोत कुंड के रूप में प्रवाहित होता है जिसका आनंद लोग तलाश करके लेना चाहते हैं. जिसे भी मालूम है वह आध्यात्मिक आडंबर के बवंडर से मुक्त होकर बस उसी भक्तिमार्ग “राधा राधा राधा” में महामंत्र के कलयुग केवल नाम अधारा पर अपने जीवन के अर्थ खोजने लगता है।
निश्चित तौर पर वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था से प्रभावित गुलाम हो चुकी राजनीति इस आध्यात्मिक ऊर्जा के विकास से भयभीत है क्योंकि वह इसी धार्मिक उन्माद को उभार कर उसका ध्रुवीकरण करके हिंसा और नफरत के सहारे अपने सत्ता की संभावना को बनाए रखना चाहती है। फिर चाहे राजनीति का कोई पक्ष क्यों ना हो वह इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। इसलिए उन्होंने अपने अपने साधु संतों की भीड़ न सिर्फ पैदा किया बल्कि इसकी मार्केटिंग भी वह बड़े स्तर पर करते रहे हैं। फिर इसमें राष्ट्रपति का उपयोग हो या प्रधानमंत्री का उसका कोई अर्थ नहीं, जो हाल में हमने देखा है।
भलाईप्राचीनतम आध्यात्मिक केंद्र अमरकंटक जैसे केंद्र भी पर्यटन क्षेत्र में बाजारीकरण की व्यवस्था में क्यों नष्ट हो जाएं… और यह हो भी रहा है। ऐसा नहीं है कि इसका विरोध नहीं हुआ है जैन संत आचार्य विद्यासागर के नेतृत्व में शिखरजी पर्वत को बचाने के लिए जैन समुदाय ने देश भर में एक बड़ा शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया और उसमें उन्होंने कुछ सफलता भी हासिल की। किंतु वह सिर्फ शिखर जी के लिए था अमरकंटक वह अन्य भारतीय आध्यात्मिक केंद्रों के मामले में में वह निरर्थक साबित हुआ।
    इस तरह की व्यवस्था में अध्यात्म को बाजारवाद की उद्योग की वस्तु बना देने के लिए जो संपूर्ण समर्पण दिखाई देता है । उसका प्रतिरोध वृंदावन की एक छोटी से कमरे के अंदर बैठकर एक भक्तिमार्ग की बाबा प्रेमानंद पूरे पाखंड के पहाड़ को ध्वस्त करते नजर आ रहे हैं। ऐसे में उनका यदाकदा विरोध भी होना स्वाभाविक है। नए नए आध्यात्मिक अनुसंधानों के लिए भीड़ को इकट्ठा करके आम धार्मिक भावना में अपने को देवत्व प्रदान करने वाले कई साधु संत नुमालोग बाबा प्रेमानंद से नाराज भी हैं। क्योंकि वह उसे पाखंड को ध्वस्त करते हैं जिसने भारत की आध्यात्मिक ऊर्जा को बाजारीकरण का विषय वस्तु बना दिया है। ऐसे बाजरियो को ऐसा भी लगने लगा है कि उनकी दुकान शायद भविष्य में खत्म न होने लगे, उनके अपने-अपने देवी देवता हैं जिनका उन्होंने अपना ट्रेडमार्क बना रखा है।किंतु इस सबसे बेखबर प्रेमानंद का प्रेमरस प्रवाह किसी बड़े जल स्रोत की तरह गंगा की तरह अविरल रूप से प्रवाहित हो रहा है। और लोगों के कल्याणकारी अनुभव के रूप में व्यक्त हो रहा है। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनको अपने सत्य के प्रयोग पर और आध्यात्मिक की निष्ठा पर पूरा भरोसा है और जो सत्य भी है क्योंकि वही हर आत्मा का आधार है इसमें कोई शक नहीं।

 


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