भगवान श्रीकृष्ण की विचारधारा और बांके बिहारी मंदिर पर सरकारी कब्जा…?: एक विमर्श

भगवान श्रीकृष्ण की विचारधारा और बांके बिहारी मंदिर पर सरकारी कब्जा: एक विमर्श
भारतीय समाज में धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन हमेशा से विवादास्पद रहा है। हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा श्री बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट विधेयक 2025 पारित किया गया है, जिसके तहत वृंदावन स्थित इस प्राचीन कृष्ण मंदिर को सरकारी ट्रस्ट के अधीन लाया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि मंदिर में बढ़ती भीड़, स्टांपेड जैसी घटनाओं और सुविधाओं की कमी को दूर करने के लिए यह कदम आवश्यक है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह कदम भगवान श्रीकृष्ण की मूल सामाजिक और राजनीतिक विचारधारा से मेल खाता है, खासकर जब अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाती है?
सबसे पहले, तुलना के बिंदु पर विचार करें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का नागपुर मुख्यालय एक गैर-सरकारी संगठन के रूप में स्वतंत्र रूप से संचालित होता है, बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के। इसी प्रकार, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गोरखपुर पीठ (गोरखनाथ मठ) एक धार्मिक संस्था है जो अपनी परंपराओं और प्रबंधन में स्वायत्त है। ये संस्थाएं सार्वजनिक महत्व की हैं, फिर भी इन्हें सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखा गया है। अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं जैसे विश्वविद्यालयों या सांस्कृतिक संगठनों को भी अक्सर स्वतंत्रता दी जाती है ताकि वे अपनी मूल भावना को बनाए रख सकें। तो फिर, बांके बिहारी मंदिर, जो कृष्ण भक्ति के रसिक संप्रदाय से जुड़ा है, को उसके पारंपरिक प्रबंधकों से छीनकर सरकारी ट्रस्ट में क्यों बदला जा रहा है?
भगवान श्रीकृष्ण की विचारधारा को समझने के लिए हमें भगवद्गीता और महाभारत की ओर देखना होगा। कृष्ण स्वतंत्रता के प्रतीक हैं – वे ‘परम स्वतंत्र’ हैं, जैसा कि उपनिषदों और पुराणों में वर्णित है। गीता में वे कहते हैं, “योगक्षेमं वहाम्यहम्” अर्थात् मैं अपने भक्तों की रक्षा और कल्याण करता हूं। उनकी राजनीतिक विचारधारा धर्म-आधारित शासन पर जोर देती है, जहां राज्य का दखल न्यूनतम हो और व्यक्ति या समुदाय की स्वायत्तता बनी रहे। महाभारत में कृष्ण ने पांडवों को सलाह दी कि अन्याय के खिलाफ लड़ें, लेकिन वे कभी भी धार्मिक संस्थाओं पर जबरन नियंत्रण की वकालत नहीं करते। बल्कि, वे भक्ति मार्ग को स्वतंत्र रखने पर बल देते हैं, जहां भक्त और भगवान का संबंध व्यक्तिगत और सामुदायिक होता है, न कि राज्य-संचालित।
सरकार का दावा है कि ट्रस्ट से मंदिर में बेहतर प्रशासन, भीड़ प्रबंधन और सुविधाएं आएंगी। लेकिन क्या यह सहयोग के बजाय कब्जे का रूप नहीं है? रसिक संप्रदाय के गोस्वामियों ने सदियों से मंदिर का प्रबंधन किया है, और अब इसे सरकारी हाथों में सौंपना उनकी परंपराओं का उल्लंघन हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अंतरिम समिति गठित की है, और विधेयक के खिलाफ याचिकाएं दायर हैं, जो दर्शाता है कि यह मुद्दा विवादित है। हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की परंपरा (जैसे तिरुपति या अन्य एंडोमेंट बोर्ड) अन्य धर्मों की संस्थाओं (मस्जिदों या चर्चों) से अलग है, जो स्वतंत्र हैं। यह असमानता कृष्ण की न्यायपूर्ण विचारधारा से मेल नहीं खाती, जहां सभी को समान अधिकार हो।
बांके बिहारी मंदिर पर सरकारी ट्रस्ट थोपना सहायता के नाम पर हस्तक्षेप लगता है। कृष्ण की विचारधारा स्वतंत्रता, धर्म और सामाजिक न्याय पर आधारित है। सरकार को चाहिए कि वह सहयोग करे, न कि कब्जा। अन्यथा, यह धार्मिक स्वायत्तता का हनन होगा, जो कृष्ण की लीला की भावना के विपरीत है। तब जबकि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लाल किले की प्राचीन से यह स्वीकार किया है कि विश्व की सबसे बड़ी अनुशासनिक सदस्यों वाली एनजीओ के रूप में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कार्य कर रही है ऐसे में उसे भारतीय संविधान की निगरानी में सरकारी नियंत्रण में लाना गलत नहीं होगा अगर भगवान श्री कृष्ण स्मृतियों को सरकारी नियंत्रण में उसकी लोकप्रियता के आधार पर व्यवस्था के नाम पर लाया जाता है तो आरएसएस और गोरखपुर पीठ को भी उसकी लोकप्रियता के आधार पर सरकारी नियंत्रण में रखना चाहिए ऐसा कहना गलत नहीं होगा
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