अपनी ही पार्टी के नवागत जिला कांग्रेसी अध्यक्ष स्वागत रैली में भी बदबूदार प्रवाह नहीं की सफाई.. कांग्रेस की गंदगी कैसे होगी साहब….?

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अपनी ही पार्टी के नवागत जिला कांग्रेसी अध्यक्ष के स्वागत रैली के लिए भी बदबूदार प्रवाह प्रदूषण कि नहीं की सफाई.. कांग्रेस की गंदगी कैसे होगी साहब….? 
    शहडोल, मध्य प्रदेश का एक ऐतिहासिक शहर, जो अपनी सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, आज एक बदबूदार और प्रदूषित तालाब के कारण चर्चा में है। यह तालाब, जो कभी शहर की शान हुआ करता था और गहरीकरण की योजना के तहत सुरक्षित करने का दावा किया गया था, आज बदबू और गंदगी का पर्याय बन चुका है। हाल ही में जिला कांग्रेस कमेटी के नवागत अध्यक्ष अजय अवस्थी की स्वागत रैली और केशरवानी समाज की प्रस्तावित रैली के दौरान यह तालाब न केवल शारीरिक असुविधा का कारण बन रहा है, बल्कि यह शहर की प्रशासनिक और राजनैतिक विफलता का प्रतीक भी बन गया है। यह स्थिति न केवल शहडोल के आम नागरिकों के लिए शर्मिंदगी का सबब है, बल्कि यह प्रश्न भी उठाती है कि क्या हमारी नेतृत्व और प्रशासनिक व्यवस्था वाकई में जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशील है?
तालाब की बदबू: एक सामाजिक और प्रशासनिक विफलता
शहडोल का यह तालाब, जो नर्मदा गैस एजेंसी के पास जेल बिल्डिंग के निकट स्थित है, अपनी बदबू और प्रदूषण के कारण राहगीरों के लिए परेशानी का सबब बन गया है। सड़क पर बहता गंदा पानी और उससे उठती दुर्गंध न केवल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि यह शहर की छवि को भी धूमिल कर रही है। यह तालाब, जो गहरीकरण की योजना के तहत संरक्षित किया गया था, आज उसी योजना की विफलता का जीवंत उदाहरण है। आखिर वह कौन सी कमियां थीं, जिनके कारण यह तालाब अपनी मूल गरिमा खो बैठा?इस तरह नगरपालिका ने अपने नागरिकों को गंदी नाली के कीड़े की जिंदगी अपने प्रमुख मार्ग में जीने को विवश कर रहा है या उसने स्वीकार कर लिया है की आम नागरिक की एक हैसियत इससे ज्यादा कुछ नहीं…?

कांग्रेस और नगर पालिका: जिम्मेदारी से पलायन?

  शहडोल नगर पालिका के अध्यक्ष घनश्याम जायसवाल, जो कांग्रेस पार्टी से ताल्लुक रखते हैं, इस स्थिति के लिए जिम्मेदार माने जा सकते हैं। जब जिला कांग्रेस कमेटी के नेता और केशरवानी समाज के लोग इस तालाब के पास से निकलें, तो क्या उन्हें इस बदबू से कोई फर्क नहीं पड़ता? क्या यह संभव है कि नगर पालिका अध्यक्ष को इस गंभीर समस्या की जानकारी ही न हो? पिछले एक महीने से इस तालाब की बदबू और प्रदूषण की शिकायतें सामने आ रही हैं, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या हमारे नेता और प्रशासक आम नागरिकों की समस्याओं को गंभीरता से लेते हैं?

दलित बस्ती की गंदगी: एक अनदेखी सच्चाई

शहडोल की दलित बस्ती, जो गांधी चौक से बुढार रोड के बीच गुरु नानक चौक के पास स्थित है, भी गंदगी और उपेक्षा का शिकार है। आजादी के बाद से स्थापित इस नगर पालिका ने इस बस्ती की सफाई और विकास के लिए कोई ठोस योजना लागू नहीं की। यह स्थिति यह सवाल उठाती है कि क्या शहडोल का प्रशासन और नेतृत्व केवल उच्च-प्रोफाइल आयोजनों, जैसे मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के आगमन के समय ही सक्रिय हो उनके स्तर योग्य मार्ग तैयार करके देता है शेष नागरिक गंदी नाली के कीड़े की तरह जीते ही रहते हैं ऐसा मानता है क्या? यदि ऐसी गंदगी और बदबू को किसी बड़े नेता के दौरे के लिए तुरंत ठीक किया जा सकता है, तो आम नागरिकों, कांग्रेस नेताओं, या केशरवानी समाज मैं निकलने वाले के लिए यह तात्कालिक उपाय क्यों नहीं अपनाया जाता?

गंदी मानसिकता का परिणाम..

यह केवल तालाब की बदबू या गंदगी का मसला नहीं है; यह एक गंदी मानसिकता का परिणाम है। नेतृत्व की वह सोच, जो केवल वोट बैंक और सत्ता की राजनीति तक सीमित है सिर्फ भ्रष्टाचार के लिए ऐसे नेताओं का जन्म होता है और भ्रष्टाचार उनका लक्ष्य होता है शायद इसीलिए पिछले एक महीने से इस गंभीर बदबू को जो बीमारी का कारण बन सकता है बनाकर रखा गया है, आम नागरिकों की मूलभूत समस्याओं को नजरअंदाज कर देती है। जब जिला कांग्रेस के नेता और समाज के प्रबुद्ध लोग इस बदबूदार तालाब के पास से गुजरते हैं, तो क्या यह उनके लिए शर्मिंदगी का विषय नहीं होना चाहिए? क्या यह उनके लिए एक अवसर नहीं है कि वे इस समस्या को उठाएं और इसका समाधान करें? इसके बजाय, यह देखकर दुख होता है कि नगर पालिका और स्थानीय नेतृत्व इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है।
समाधान की दिशा में
इस समस्या का समाधान केवल प्रशासनिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर भी जरूरी है। कुछ सुझाव इस प्रकार हो सकते हैं:
तात्कालिक सफाई अभियान: नगर पालिका को तालाब की सफाई और प्रदूषण नियंत्रण के लिए तुरंत एक विशेष अभियान शुरू करना चाहिए। इसके लिए विशेषज्ञों की एक टीम गठित की जा सकती है।
सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदाय, विशेष रूप से केशरवानी समाज और अन्य सामाजिक संगठनों को इस अभियान में शामिल किया जाए। रैलियों और पदयात्राओं का उपयोग जागरूकता फैलाने के लिए भी किया जा सकता है।
प्रशासनिक जवाबदेही: नगर पालिका अध्यक्ष और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। नियमित निरीक्षण और प्रगति रिपोर्ट जनता के सामने प्रस्तुत की जाए।
दलित बस्ती का विकास: गुरु नानक चौक के पास की दलित बस्ती की गंदगी को दूर करने के लिए एक दीर्घकालिक योजना बनाई जाए, जिसमें स्वच्छता, जल निकासी, और बुनियादी सुविधाओं का प्रावधान हो।
जागरूकता और नेतृत्व: कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों को इस मुद्दे को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह केवल एक तालाब की समस्या नहीं, बल्कि शहर की गरिमा और नागरिकों के स्वास्थ्य का सवाल है।

शहडोल का यह बदबूदार तालाब और दलित बस्ती की गंदगी केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि यह हमारे नेतृत्व और प्रशासन की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाती है। जब तक हमारी सोच और मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा आम नागरिकों को सिर्फ कीड़े मकोड़े की तरह जीने को दिवस करने की सोच से मुक्त होने की जरूरत है जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ऐसी समस्याएं बनी रहेंगी। यह समय है कि शहडोल के नेता, चाहे वे कांग्रेस के हों या किसी अन्य दल के, इस बदबूदार तालाब को न केवल एक समस्या के रूप में देखें, बल्कि इसे एक अवसर के रूप में लें—एक स्वच्छ, सुंदर, और स्वस्थ शहडोल के निर्माण का अवसर। क्या हम इस दिशा में कदम उठाएंगे, या फिर यह बदबू हमारी मानसिकता का हिस्सा बनकर रह जाएगी? यह सवाल हर शहडोलवासी और हर जिम्मेदार नागरिक को सोचने के लिए मजबूर करता है।


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