
उन्होंने मंदिर की ही करोड़ों रुपए के शहर के महत्वपूर्ण 33 डिसमिल जमीन पर भ्रम पैदा कर काम किया बल्कि उसे पुरानी आरजी को तोड़फोड़ कर उसकी संपत्ति गायब कर नया कंस्ट्रक्शन कर दिया और अब बता दे मोहन राम मंदिर के मामले में अब तक आपने पढ़ा की किस प्रकार से वर्तमान एसडीएम अरविंद शाह और उसके पहले प्रगति वर्मा और उसके पहले धर्मेंद्र मिश्रा ने बकायदे हाई कोर्ट का प्रभार के संबंध में पत्र जारी किए लेकिन चूंकि मंदिर का प्रभार जिसके लव कुश और उसके साथियों पास है वह इसलिए नहीं देना चाहते क्योंकि उन्होंने मंदिर की ही करोड़ों रुपए के शहर के महत्वपूर्ण 33 डिसमिल जमीन पर भ्रम पैदा कर एक फर्जी संस्था “राम जानकी धार्मिक संस्था” के नाम पर न सिर्फ कब्जा करने उस पर लाखों रुपए का किराया वसूल कर अपने परिवार को वहां बैठा दिया है। यानी मोहन राम मंदिर की प्रॉपर्टी को खुर्द-बुर्द करने का काम हुआ और लव कुश तथा उसके साथियों ने मिल बाटकर इस भ्रष्टाचार को अंजाम दिया क्योंकि वह मंदिर के अंदर कब्ज़ा करके गैर कानूनी तरीके से बैठा है।हम इस पर बाद में आएंगे की चित्रकूट क्षेत्र का रहने वाला लवकुश शहडोल में अपने साथियों समेत कैसे भ्रम फैलाकर कब्जा कर रहा है और उनके साथी फिलहाल कौन है जो ट्रस्टी बने, जिन्हें हाई कोर्ट ने हटाकर ‘स्वतंत्र कमेटी’ को मंदिर का प्रबंध तब तक सौंपने का काम दिया जब तक की लंबित प्रकरण का निराकरण नहीं हो जाता।फिलहाल हम “स्वतंत्र कमेटी” के गठन और उसके बाद 12 वर्षों में जो घटनाएं घाटे उसे पर फोकस में इसलिए रहेंगे ताकि पता चले कि आखिर मंदिर संपत्ति की चोरी में कौन-कौन शामिल है और उसकी चोरी किस-किस प्रकार से हो रही है और लवकुश के इस अपराध में उनके साथ कौन दे रहे हैं इस सीरियल के पांचवें क्रम में भी इस पर ही चर्चा करेंगे।
—————( त्रिलोकी नाथ )——————
शहडोल में मोहन राम मंदिर के मामले में अब तक आपने पढ़ा होगा की किस प्रकार से वर्तमान एसडीएम अरविंद शाह और उसके पहले प्रगति वर्मा और उसके पहले धर्मेंद्र मिश्रा ने बकायदे मंदिर का प्रभार के संबंध में पत्र जारी किए लेकिन चूंकि मंदिर का प्रभार जिसके लव कुश और उसके साथियों पास है वह इसलिए नहीं देना चाहते क्योंकि उन्होंने मंदिर की ही करोड़ों रुपए के शहर के महत्वपूर्ण 33 डिसमिल जमीन पर भ्रम पैदा कर एक फर्जी संस्था राम जानकी धार्मिक संस्था के नाम पर न सिर्फ कब्जा करने का काम किया बल्कि उसे पुरानी आरजी को तोड़फोड़ कर उसकी संपत्ति गायब कर नया कंस्ट्रक्शन कर दिया और अब बता दे उस पर लाखों रुपए का किराया वसूल कर अपने परिवार को वहां बैठा दिया है। यानी मोहन राम मंदिर की प्रॉपर्टी को खुर्द बुर्द करने का काम हुआ और लव कुश तथा उसके साथियों ने मिल बाटकर इस भ्रष्टाचार को अंजाम दिया क्योंकि वह मंदिर के अंदर कब्ज़ा करके गैर कानूनी तरीके से बैठा है।
शहडोल का मोहन राम मंदिर: धार्मिक विरासत पर साजिशों का काला साया
शहडोल जिले का मोहन राम मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह पंडित मोहन राम पांडे की दानशीलता और सनातनी परंपरा का जीवंत प्रतीक है। 130 वर्ष पुराना यह मंदिर, आज यह विरासत भ्रम, कब्जे और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है। एक ओर जहां अयोध्या का राम मंदिर आंदोलन ने सनातन धर्म को नई ऊंचाइयां दीं, वहीं शहडोल के इस छोटे से मंदिर पर राजनीतिक साजिशें और अवैध कब्जे सनातनी मूल्यों को कुचल रहे हैं। यह आलेख उस गहन विवाद को उजागर करता है, जो दस्तावेजों, न्यायिक प्रकरणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित है।
पुरानी लंका ट्रस्ट का भ्रम: एक सुनियोजित धोखा
चित्रकूट स्थित ‘पुरानी लंका ट्रस्ट’ का नाम पंजीकृत ट्रस्ट के रूप में दर्ज है, जो वर्ष 6 अप्रैल 1968 न्यास पंजीकरण कार्यालय में रजिस्टर्ड है।
सतना जिले के एक न्यायिक प्रकरण में प्रस्तुत दस्तावेजों से स्पष्ट होता है कि इसका वास्तविक नाम ‘पुरानी लंका ट्रस्ट गांव कामता चित्रकूट’ है। इस ट्रस्ट के दस्तावेजों में शहडोल में 25 कोठों के किराए का उल्लेख है, जिनसे प्रतिमाह 300 रुपये की आय होती है। लेकिन इन संपत्तियों का कोई स्पष्ट विवरण नहीं—न तो मोहन राम मंदिर से जुड़े पुराने कमरों का, जो पुरानी बस्ती,जेल बिल्डिंग रोड या अन्य गांवों में स्थित संपत्तियों का। 
यहां भ्रम पैदा करने वाली केंद्रीय कड़ी है ‘राम जानकी धार्मिक संस्था पुरानी लंका चित्रकूट’। यदि पुरानी लंका ट्रस्ट ही राम जानकी धार्मिक संस्था के रूप में जाना जाता, तो वह स्वयं अपना नाम ‘राम जानकी धार्मिक संस्था पुरानी लंका ट्रस्ट’ क्यों न रखता? स्पष्ट है कि चित्रकूट में कोई ‘राम जानकी धार्मिक संस्था’ नामक ट्रस्ट पंजीकृत नहीं है। यह भ्रम शहडोल की
खसरा नंबर 138 पर स्थित 33 डिसमिल जमीन और मकान पर कब्जे के लिए रचा गया। यह जमीन डायवर्सन के माध्यम से मोहन राम मंदिर की तत्कालीन कमेटी (पांडे जी के नेतृत्व में) को सौंपी गई थी। प्रकरण नंबर 857, दिनांक 25 सितंबर 1965 के दस्तावेज मकान निर्माण के लिए भू-परिवर्तन की पुष्टि करते हैं। लेकिन पुरानी लंका ट्रस्ट, जो 6 अप्रैल 1968 को सतना में पंजीकृत हुई, में इसका कोई उल्लेख नहीं।
यह
नामांतरण एक फर्जी संस्था के नाम पर किया गया, जिसे कथित तौर पर ‘लव कुश’ ने कराया। दस्तावेजों से सिद्ध होता है कि यह पांडे जी मोहन राम मंदिर की जमीन थी, न कि पुरानी लंका चित्रकूट की। यदि यह पुरानी लंका की होती, तो 1968 के पंजीकरण में इसका जिक्र क्यों न होता? यह साजिश धार्मिक भावनाओं का शोषण करती है, जहां चित्रकूट की पवित्र गद्दी का नाम लेकर स्थानीय संपत्तियों पर कब्जा किया जाता है।
लव कुश की साजिश: तोड़फोड़, चोरी और राजनीतिक संरक्षण
हाल ही में जब लव कुश ने इस संपत्ति पर कब्जा करने की कोशिश की—तोड़फोड़ कर मरम्मत का बहाना बनाया—तो नगर पालिका परिषद शहडोल में प्रस्तुत दस्तावेज वही थे, जो मोहन राम मंदिर से चोरी किए गए थे। ये दस्तावेज पांडे जी मोहन राम मंदिर से जुड़े थे, जो लव कुश ने नाजायज कब्जे के दौरान हथिया लिए। भाजपा से जुड़े नेताओं के सहयोग से ये दस्तावेज
नगर पालिका से गायब कर दिए गए। इसके परिणामस्वरूप तहसीलदार सोहागपुर ने खसरा नंबर 138 की 33 डिसमिल जमीन पर लव कुश के खिलाफ स्थगन आदेश जारी किया। आवेदन स्वतंत्र कमेटी ‘रघुनाथ जी राम जानकी शिव पार्वती मोहन राम मंदिर ट्रस्ट’ की ओर से था, जो गैर-कानूनी कब्जे के खिलाफ लड़ी।
लेकिन यह साजिश यहीं थम नहीं।
स्टे ऑर्डर के बाद तहसीलदार कार्यालय से पूरा प्रकरण फाइल आज तक गायब है। तहसीलदार, जो स्वयं स्वतंत्र कमेटी के सदस्य हैं, ने रहस्यमय चुप्पी साध रखी है। अकेले चित्रकूट से आए लव कुश और उसके सहयोगी इतना दबाव नहीं डाल सकते; इसमें राजनीतिक सत्ता का हाथ साफ दिखता है। फाइल या तो ठंडे बस्ते में डाल दी गई या जड़ से मिटा दी गई। यह केवल एक प्रकरण नहीं—मंदिर के सामने लव कुश द्वारा चलाई जाने वाली दूध डेरी के ठीक सामने, मृत किराएदार रामखेलावन की संपत्ति पर डबल स्टोरी पक्का मकान बनवाया गया। लाखों रुपये के भ्रष्टाचार का बंटवारा लव कुश और सहयोगियों ने किया। यदि मृत किराएदार का प्रभार स्वतंत्र कमेटी को न सौंपा जाए, तो कैसे पता चलेगा कि कौन किराएदार मृत हो चुका है या कौन अवैध निर्माण कर रहा है? यह मंदिर की संपत्तियों की लूट का नंगा नाच है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मेरी भूमिका और मंदिर की विरासत
मोहन राम पांडे के वंशज स्वर्गीय हर प्रसाद पांडे जी के साथ मैंने भी मंदिर व्यवस्था में भूमिका निभाई। 1998 में, हर प्रसाद पांडे के कहने पर तत्कालीन कमेटी अध्यक्ष और एन. भास्कर राव (1950 के दशक के अध्यक्ष) के साथ मिलकर हमने मंदिर परिसर को व्यवस्थित किया। चित्रकूट की पुरानी लंका से वंशानुगत स्वामीजी की गद्दी का सम्मान करते हुए, हमने सनातनी विश्वास पर आधारित जिम्मेदारी निभाई। मंदिर का व्यापक क्षेत्र कटनी तक फैला था—जमीनें, मकान, तालाब, पहाड़—सब पंडित मोहन राम पांडे की दानशीलता से। अमरपाटन (सतना) के मूल निवासी मोहन राम पांडे 19वीं सदी के अंत मेंचित्रकूट के गुरु महाराज के शिष्य थे, जो शहडोल आते थे।
16 दिसंबर 2011 को जिला न्यायालय ने मंदिर ट्रस्ट सुधार के लिए आदेश दिया—एन. भास्कर राव और हर प्रसाद पांडे के वंशज मिलकर नया ट्रस्ट गठित करें। लेकिन तभी से लव कुश और साजिशकर्ताओं ने अपराधों का सिलसिला शुरू किया।
2012 में ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया में लव कुश और उसके साथियों ने तत्कालीन एसडीएम गजेंद्र सिंह के साथ मिलकर जिला न्यायालय के आदेश के विरुद्ध गठन की प्रक्रिया को अंजाम दिया जिसको लेकर विवाद हाई कोर्ट में पहुंचा और हाईकोर्ट ने विवाद निराकरण तक के लिए स्वतंत्र कमेटी का गठन करने कानिर्देश कर दिया हाईकोर्ट का यह आदेश 12 वर्ष बाद भी लागू नहीं हुआ, क्योंकि शहडोल प्रशासन विफल रहा। इन 12 वर्षों में लूटपाट और भ्रष्टाचार चरम पर पहुंचा। भाजपा से जुड़े मंदिर पदाधिकारियों का मानना “यह अब भारतीय जनता पार्टी का मंदिर है, न कि मोहन राम पांडे का…? पुरानी लंका ट्रस्ट और राम जानकी धार्मिक संस्था के भ्रम से 33 डिसमिल जमीन की लूट की गई। स्वतंत्र कमेटी को प्रभार न देने का पूरा प्रयास भाजपा को बदनाम करने का हिस्सा लगता है।
भाजपा का दुर्भाग्यपूर्ण मोड़: राम आंदोलन से अभिशाप तक
राम मंदिर आंदोलन ने भाजपा को सत्ता का राजयोग दिया, लेकिन शहडोल में वही भाजपा, मोहन राम मंदिर के लिए अभिशाप सिद्ध हो रही है। ऐसे तत्व, जो मंदिर लूटने में लिप्त हैं, भाजपा को बदनाम करने में कसर नहीं छोड़ रहे। हाईकोर्ट के आदेश का पालन हो, तो स्वतंत्र कमेटी को प्रभार मिलेगा—यह भाजपा शासन में संभव क्यों न होगा….? यह सवाल सनातनियों के मन में कौंध रहा है। शहडोल का मोहन राम मंदिर सनातनी संघर्ष का प्रतीक है। दस्तावेजों और न्यायिक साक्ष्यों से सिद्ध है कि यह लूट का षड्यंत्र है। समय आ गया है कि प्रशासन जागे, हाईकोर्ट आदेश लागू हो और मंदिर की विरासत हाईकोर्ट के आदेश पालन में स्वतंत्र कमेटी को सौंपी जाए।और यह दुर्भाग्य जनक रहा कि जिस भारतीय जनता पार्टी पर राम मंदिर आंदोलनके जरिये सत्ता का राज योग बना वही भाजपा शहडोलके राम मंदिर के लिए बरदान की जगह अभिशाप सिद्ध हो रही है। ऐसे तत्व जो राम मंदिर लूटने औरलुटवाने शामिल है वह भाजपा को भी बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे । क्योंकि यह किसीभी हालत में स्वीकार नहीं है की हाई कोर्ट के आदेश का पालन की मोहन राम मंदिर स्वतंत्र कमेटी को सौंपी जाए भाजपा के शासनकाल में संभव हो जाए।