चुनाव आचार संहिता में प्रकट हुये शहरी बाहुबली राज में हुई दुलारचंद हत्या;कहानी नहीं हकीकत है बिहार की- (त्रिलोकी नाथ-G)

Share

चुनाव आचार संहिता में प्रकट हुये शहरी बाहुबली राज में चुनावी आचार संहिता में हुई दुलारचंद यादव हत्या । कहानी नहीं हकीकत है बिहार की-
    बिहार की राजनीति हमेशा से ही तलवार की धार पर चलती रही है। जहां एक ओर लोकतंत्र की पवित्रता का दावा किया जाता है, वहीं दूसरी ओर बाहुबलियों की दहशत और दबंगई की कहानियां किंवदंतियों की तरह घूमती रहती हैं। नब्बे के दशक को ‘जंगल राज’ कहा जाता था, जब अपराध और राजनीति का गठजोड़ आम हो गया था। अपहरण, हत्या और वसूली की घटनाएं रोजमर्रा की खबरें बन गईं। फिर आया सासन ‘सुशासन बाबू’ के नाम से जाना गया। करीब दो दशकों में बिहार ने सड़कें, बिजली और कानून-व्यवस्था में प्रगति देखी। लेकिन क्या वाकई जंगल राज खत्म हो गया? या यह बस भूमिगत होकर चुनावी मौसम में ही सिर उठा लेता है? हालिया घटना—मोकामा विधानसभा क्षेत्र में जन सुराज पार्टी समर्थक दुलारचंद यादव की निर्मम हत्या—इस सवाल को फिर से उछाल रही है। यह हत्या न सिर्फ एक व्यक्ति की जान ले गई, बल्कि बिहार के जंगल राज की जड़ें फिर से बाहुबलियों का उदय नए सिस्टम से दिख रही हैं।
——————————————————————त्रिलोकी नाथ-G———————-

बिहार में बाहुबली शब्द कोई साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि हकीकत का आईना है। 1990 के दशक में, जब राजनीतिक अस्थिरता चरम पर थी, तो अपराधी तत्वों ने विधानसभाओं में कदम रखा। ये बाहुबली न सिर्फ अपराध के सौदागर थे, बल्कि वोट बैंक के मालिक भी। वे चुनाव जीतते, विधायक बनते, और फिर संसद तक पहुंच जाते। जंगल राज का मतलब था कि कानून की किताबें धूल खातीं, और बंदूकों की जुबान बोलती।
फिर भी, ये कथाएं किंवदंतियां नहीं बनीं। वे जीवित हैं, खासकर चुनाव के मैदान में। वेब सीरीज और बॉलीवुड फिल्में तो इन्हें रोमांचक बनाती हैं, लेकिन बिहार की मिट्टी में ये यथार्थ हैं। निष्पक्ष चुनाव के नाम पर चुनावी आचार संहिता के दौरान भी पारदर्शी तरीके से गैर कानूनी काफिलों में घूमती लग्जरी कारें और जीपें, जो चुनाव आयोग की नजरों मैं खुलेआम गैर कानूनी काम करते हैं—ये कोई सिनेमा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विडंबना है। केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) ने बिहार में ढील दी है, ताकि ग्रामीण इलाकों में अभियान चल सके। लेकिन यही ढील बाहुबलियों के लिए खुला मैदान बन जाती है। गाड़ियों के काफिले कानूनी खामियों का फायदा उठाते हैं, और आयोग की चुप्पी इसे वैधता दे देती है।

दुलारचंद यादव: एक ठेठ देहाती का अंत
मोकामा विधानसभा क्षेत्र बिहार का ऐसा कोना है, जहां राजनीति और अपराध का मेला लगा रहता है। यहां पूर्व सांसद अनंत सिंह का नाम बाहुबली का पर्याय है। अनंत सिंह, जो जेडीयू के टिकट पर लड़ रहे हैं, पर विवादों से घिरे रहते हैं। इसी मोकामा में 30 अक्टूबर 2025 को जन सुराज पार्टी (JSP) के समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या हो गई। दुलारचंद कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं थे। वे खुद एक पुराने बाहुबली थे—1980-90 के दशक में ताल क्षेत्र के दबंग नेता, जो लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे बड़े नेताओं के करीबी रहे। उन्होंने मोकामा से चुनाव भी लड़ा था। लेकिन हाल के वर्षों में उन्होंने पाला बदल लिया और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी से जुड़ गए। वे JSP उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के लिए तारतार गांव में प्रचार कर रहे थे, जब हमला हुआ।
घटना की डिटेल्स खौफनाक हैं। JSP काफिले पर हमला हुआ। 15-20 लोग लाठी-डंडों से हमला करने लगे। 3-4 राउंड गोली चली। दुलारचंद को पहले पैर में गोली मारी गई, फिर एक कार से कुचल दिया गया। उनकी मौत के बाद पोस्टमॉर्टम के लिए मेडिकल बोर्ड गठित किया गया, लेकिन इलाके में तनाव फैल गया। JSP उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी ने अनंत सिंह और उनके साथियों पर आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “हमारे 30 वाहनों का काफिला था, लेकिन पीछे के 10 वाहनों पर हमला हुआ। दुलारचंद ने सबसे पहले हाथ उठाया विरोध में।” अनंत सिंह ने इनकार किया और काउंटर एफआईआर दर्ज कराई,

चुनाव आयोग की भूमिका: सुशासन या साजिश?
यह घटना बिहार चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। ECI ने मांग की है—पटना के डीईओ और बिहार DGP से अलग-अलग रिपोर्ट मांगी गई है। लेकिन क्या इससे कुछ बदलेगा? इतिहास गवाह है कि ऐसी घटनाओं पर कार्रवाई दुर्लभ होती है। RJD नेता तेजस्वी यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी: “चुनावी कोड ऑफ कंडक्ट लागू है, फिर भी लोग बंदूकों के साथ घूम रहे हैं। पीएम पुरानी बातें करते हैं, लेकिन 30 मिनट पहले की घटना पर चुप हैं।” प्रशांत किशोर ने इसे ‘नया बिहार’ का संकेत बताया, लेकिन सवाल वही है—क्या यह अप्रत्यक्ष रूप से ‘नया सुशासन’ घोषित कर देगा? जहां हिंसा को नजरअंदाज कर वोट गिनती पर फोकस हो। डिजिटल युग में भी बाहुबली जीवित हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो जाते हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं। शायद यह बिहार की लोक संस्कृति का हिस्सा हो—जहां चुनाव बाहुबल के इर्द-गिर्द घूमते हैं। देहाती नेता दुलारचंद जैसे लोग , जो हिंसा की भेंट चढ़ जाते हैं।
लोकतंत्र की परीक्षा
दुलारचंद यादव की हत्या बिहार के सुशासन की परीक्षा है। अगर ECI सख्ती दिखाएगी, तो शायद जंगल राज की जड़ें कटेंगी। वरना, यह घटना सिर्फ एक और किंवदंती बन जाएगी—फिल्मों और वेब सीरीज के लिए। बिहार को अब जरूरत है सच्चे सुशासन की, जहां वोट बंदूकों से न डरें। फिलहाल, मोकामा में तनाव बरकरार है, पुलिस हाई अलर्ट पर। देखना होगा कि क्या न्याय मिलेगा, या यह चुनावी हिंसा का एक और अध्याय साबित होगा। 


Share

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

राशिफल

- Advertisement -spot_img

Latest Articles