
पेसा अधिनियम के तहत सामुदायिक नेतृत्व वाले शासन का समारोह
22 DEC 2025 by PIB Delhi
मुख्य बातें
- पंचायती राज और जनजातीय मामलों का मंत्रालय हर साल 23 और 24 दिसंबर को संयुक्त रूप से पेसा महोत्सव मनाता है। अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों का विस्तार (पेसा)अधिनियम, 1996 की वर्षगांठ पर ये महोत्सव मनाया जाता है।पेसा अधिनियम जनजातीय समुदायों की अनुसूचित भूमि पर पंचायती राज के प्रावधानों को लागू करके उन्हें सशक्त बनाता है और उन्हें उनकी भूमि से बेदखल य़ा अलग किये जाने से बचाता ह 2025 का पेसा महोत्सव विशाखापत्तनम में आयोजित किया जाएग इसका उद्देश्य अधिनियम के बारे में जागरूकता फैलाना और अनुसूचित क्षेत्रों में स्थानीय निकायों की क्षमताओं को बढ़ाना है।
परिचय भारत में जनजातीय समुदाय की आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 8.6 प्रतिशत है। संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत,भारत के राष्ट्रपति द्वारा अधिक जनजातीय आबादी वाले क्षेत्रों को अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया जाता है ताकि जनजातीय लोगों का अपने स्थानीय संसाधनों,अपने विकास और सामाजिक जीवन पर नियंत्रण हो सके।1993 में, ग्राम, ब्लॉक और जिला स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं या स्थानीय शासन निकायों की स्थापना के लिए भारत के संविधान में संशोधन (73वां संशोधन) किया गया। इस संशोधन ने स्थानीय स्तर की संस्थाओं को शक्ति प्रदान की जिससे ग्रामीणों को अपने विकास और समुदायों से संबंधित निर्णय लेने का अधिकार मिला। हालांकि, 73वां संशोधन अधिनियम आदिवासी अनुसूचित क्षेत्रों पर अपने आप लागू नहीं हुआ।
1996 में, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम (पेसा) लागू हुआ,जिसने अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय समुदायों को स्वशासन के लिए समान शक्तियां प्रदान कीं। यह ऐतिहासिक कानून जनजातीय समुदायों के भूमि, जल, वन संसाधन, संस्कृति और शासन प्रणालियों पर उनके अधिकारों को बहाल करता है और उन्हें संरक्षण देता है। यह आदिवासी ग्राम सभाओं को सशक्त बनाकर जनजातीय समुदायों तक विकेंद्रीकृत लोकतंत्र का विस्तार करता है पेसा अधिनियम जनजातीय समुदायों की अलग पारंपरिक शासन प्रणालियों और विशेष विकास संबंधी आवश्यकताओं को भी मान्यता देता है जनजातीय अनुसूचित क्षेत्रों वाले दस राज्यों में से आठ ने अपने पेसा नियम बना लिए हैं, जबकि ओडिशा और झारखंड ने मसौदा नियम तैयार किए हैं।
| भारत में पंचायती राज — 73वां संवैधानिक संशोधन (1993)
3वें संवैधानिक संशोधन (1993) ने संविधान में भाग 9 और 11वीं अनुसूची को जोड़ा। संविधान का भाग 9 ग्राम और जिला स्तर पर स्थित संस्थाओं को शक्तियां प्रदान करता है जिन्हें पंचायत के नाम से भी जाना जाता है। ग्यारहवीं अनुसूची में 29 विषय सूचीबद्ध हैं जिन पर इन स्थानीय संस्थाओं को निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। इस संशोधन ने अधिक विकेंद्रीकृत लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त किया। संविधान संशोधन के भाग 9 ने पंचायती राज संस्थाओं की त्रिस्तरीय ढांचा स्थापित किया – ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायतें, मध्यवर्ती या ब्लॉक स्तर पर पंचायत समितियां (ग्रामों के समूह का प्रतिनिधित्व करने वाली) और जिला स्तर पर जिला परिषदें। इन तीनों निकायों के सभी सदस्य निर्वाचित होते हैं। इसके अलावा, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायतों के अध्यक्ष निर्वाचित सदस्यों में से अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। लेकिन ग्राम स्तर पर, पंचायत सरपंच का चुनाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से हो सकता है।पंचायत के प्रत्येक स्तर पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित होती हैं।ग्राम सभा ग्राम पंचायत क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले किसी भी गांव की मतदाता सूची में पंजीकृत सभी व्यक्तियों से मिलकर बनी एक संस्था है। ग्राम सभाओं की शक्तियां और कार्य राज्य विधानमंडलों द्वारा तय कानून के माध्यम से निर्धारित किए जाते हैं। |
1996 का पेसा अधिनियम
पेसा अधिनियम पंचायती राज व्यवस्था या 73वें संवैधानिक संशोधन के प्रावधानों का आदिवासी बहुल पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार करता है यह अधिनियम इन क्षेत्रों में ग्राम सभाओं और पंचायतों को उनकी पारंपरिक शासन प्रणाली को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त शक्तियां प्रदान करता है।पेसा अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं ग्राम सभाओं की बढ़ी हुई शक्तियां पेसा अधिनियम का मूल आधार हैं, जो जनजातीय समुदायों को अपने ग्राम शासन व्यवस्था पर अधिक अधिकार प्रदान करती हैं।यद्यपि पंचायतों और ग्राम सभाओं के लिए संवैधानिक नियम हैं,फिर भी पेसा अधिनियम उन्हें निष्प्रभावी कर देता है,और राज्य विधानमंडल इन नियमों का उल्लंघन करने वाला कोई भी पंचायत कानून नहीं बना सकता है।

