
छिपी मुलाकातों की छाया और ऑपरेशन सिंदूर की अनकही कहानी
हम भारत की संविधान के पांचवी अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्र शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र के निवासी हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही घटनाओं को उतनी समझ नहीं रखते लेकिन जो सामान्य समझ है उसको जरूर विचार करते हैं इसलिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के भारत दौरे में भारत सरकार के साथ कोई मुलाकात ना होने और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय में उनके कार्यकारी अध्यक्ष 21वीं सदी के 12वीं पास नितिन नवीन की अनुपस्थिति में चीनी प्रतिनिधिमंडल का मुलाकात और इसके बाद भारत के गैर पंजीकृत गैर सरकारी संगठन(NGO) राष्ट्रीय स्वयं संघकी 1 घंटे चली पारदर्शी गुप्त मुलाकात में एक कहानी लिखने इच्छा जागृत होगई।
———————-( त्रिलोकी नाथ )——————-
15 जनवरी 2026 हम, पांचवीं अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्रों के निवासी, जंगलों और पहाड़ों के बीच रहते हैं। दुनिया की बड़ी-बड़ी खबरें हमें टीवी या फोन पर थोड़ी-बहुत ही मिलती हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बारीकियाँ हमें शायद पूरी तरह समझ न आएँ, लेकिन दिल की बात समझ आती है—जब कोई बड़ा खेल चल रहा हो, तो उसकी हवा हमें भी छूती है।
हाल ही में जो हुआ, वह हमें सोच में डाल गया। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) का एक प्रतिनिधिमंडल भारत आया। सरकारी स्तर पर कोई आधिकारिक मुलाकात नहीं हुई—न प्रधानमंत्री से, न विदेश मंत्रालय से। लेकिन सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के मुख्यालय में यह प्रतिनिधिमंडल पहुँचा। वहाँ 21वीं सदी के 12वीं पास पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन उस समय मौजूद नहीं थे। फिर भी, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उनसे बात की। इसे “शिष्टाचार भेंट” और “पार्टी-टू-पार्टी संवाद” कहा गया।
अगले दिन, यही प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के मुख्यालय पहुँचा। वहाँ सरसंघचालक मोहन भागवत दौरे पर थे, इसलिए नहीं मिले। लेकिन RSS के महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने एक घंटे तक उनसे मुलाकात की। यह मुलाकात “पारदर्शी” बताई गई, लेकिन न तो कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी हुई, न बिंदुवार निष्कर्ष बताए गए। बस इतना कहा गया कि संगठन की संरचना, इतिहास और समाज में काम के बारे में चर्चा हुई।
यह पहली बार नहीं है जब CPC के लोग भारतीय संगठनों से मिले हैं। पहले कांग्रेस के साथ भी ऐसे संपर्क हुए थे। लेकिन अब सत्ता में BJP-RSS की विचारधारा है, जो “हिंदू राष्ट्र” की बात करती है। फिर भी, चीन के साथ ये गुप्त-सी मुलाकातें क्यों? क्या कोई बड़ा समझौता हो रहा है? क्या भारत-चीन के बीच पुरानी तनातनी (गलवान जैसी) भूल गई?
हमारे मन में यह सवाल इसलिए भी उठता है, क्योंकि कुछ महीने पहले ही कश्मीर में एक भयानक घटना हुई थी। पहलगाम में धार्मिक पहचान पूछकर 26 निर्दोष नागरिकों (ज्यादातर पर्यटक) की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके जवाब में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया। शुरू में लगा कि यह पाकिस्तान और उसके आतंकी संगठनों (जैसे जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा) के खिलाफ है। मिसाइल हमले हुए, नौ आतंकी ठिकाने नष्ट किए गए। लेकिन बाद में हमारे सैनिकों और विशेषज्ञों ने संकेत दिए कि यह युद्ध परोक्ष रूप से चीन के साथ भी था। पाकिस्तान को इस्तेमाल किया जा रहा था, क्योंकि वहाँ चीनी हथियार, ड्रोन, PL-15 मिसाइलें, जे-10 लड़ाकू विमान सब इस्तेमाल हो रहे थे। चीन-पाकिस्तान की सैन्य साझेदारी इतनी गहरी है कि पाकिस्तान के हमले में चीन का हाथ साफ दिखता था।फिर वही चीन का प्रतिनिधिमंडल BJP और RSS से मिलने क्यों आया? क्या यह “दोस्ती” की नई शुरुआत है? क्या ऑपरेशन सिंदूर के बाद कोई गुप्त डील हुई? दुनिया भर में खलबली मची हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन मुलाकातों पर चिंता जताई है। अन्य देश भी सतर्क नजर रखे हुए हैं।
हम आदिवासी क्षेत्र के लोग साधारण सोचते हैं—जब कोई पड़ोसी देश हमारे साथ युद्ध लड़वाता है (चाहे छिपकर), तो उसके साथ इतनी नजदीकी क्यों? क्या यह आर्थिक साम्राज्यवाद की खेल है, जहाँ बड़े देश छोटे-मोटे मुद्दों पर एक-दूसरे से समझौते कर लेते हैं? क्या हमारी सीमाएँ, हमारे जवान, हमारे नागरिक सिर्फ बाजार का सामान हैं?
हम कोई बड़ा विश्लेषक नहीं हैं। लेकिन हमारी मिट्टी हमें सिखाती है—जो छिपाकर होता है, वह ज्यादातर सच्चाई से दूर होता है। सरकार और पार्टियों को चाहिए कि ऐसी मुलाकातों के बारे में जनता को खुलकर बताएँ। पारदर्शिता तभी संभव है जब प्रेस विज्ञप्ति आए, निष्कर्ष बताए जाएँ, और जनता को विश्वास हो।शहडोल के जंगलों से हम यही कहना चाहते हैं—भारत मजबूत बने, लेकिन उस मजबूती में छिपाव न हो। क्योंकि जब छिपाव होता है, तो संदेह बढ़ता है। और संदेह से राष्ट्र कमजोर होता है, न कि मजबूत।

