
26 जनवरी 1950 को देश की आजादी का संविधान लागू हुआ था 26 जनवरी 2026 को हम इसे फिर याद करेंगे यह सोचकर की कभी हमारे पूर्वजों ने इस गुलाम देश को जो अफगानिस्तान, पाकिस्तान ,तिब्बत, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका तक अछूत रहा वह जैसे ही गुलामी की जंजीरों से मुक्त हुआ टुकड़े-टुकड़े होकर छोटे बड़े राष्ट्र बनकर रह गया अब उसमें कुछ नागरिक अपना-अपना गेगवार अलग-अलग समूह चला रहे हैं कुछ जगह लोकतंत्र काम कर रहा है उनका अपना-अपना संविधान हैभारत एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक हम लोगों का राष्ट्र है। इसी आजादी के नजर रखकर चार दशक पहले अनुभव करते हुए संपूर्ण अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के साथ एक पद यात्री देवशरण मिश्रा भारत में अलग-अलग तरीके से सनातन अभिव्यक्ति प्रवाह के रूप से मूर्ति मान होकर आज भी हमें स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का संदेश देती नदियों एक नदी (स्त्रीलिंग) नर्मदा और एक नद (पुलिंग) सोन जो उत्तर और दक्षिण भारत को विभक्त करने का प्रयास करती है । इसी में “सोननद” जिसे प्रचलित भाषा में हम सोन नदी कहेंगे अमरकंटक से प्रवाहित होकर गंगा में अपना अस्तित्व विलय कर देता है। सोन के पुरुषार्थ कुछ समझने के लिए पदयात्रा में देवशरण सचमुच सोन के पुरुषार्थ में शरणागत हो जाते हैं। उनकी अमर कृति कथिततौर पर मध्य प्रदेश के हिंदी ग्रंथ अकादमी से प्रकाशित यह पुस्तक “सोन के पानी का रंग” अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना ही उसकी भ्रूण हत्या कर दी गई । श्री मिश्रा के अनुसंधान से ना तो इस नद के नाद को बचाने का काम हुआ न हीं इससे पल्लवित संस्कृति और सनातन को सुरक्षित करने पर कोई काम हुआ। जब यह पुस्तक ही किसी माफिया गिरी के चलते भारतीय स्वतंत्रता की गलियों में गायब कर दी गई तो इस पर काम क्या होगा..? स्वाभाविक है कुछ भी नहीं होना था नहीं हुआ…।
( त्रिलोकी नाथ)
इतना तो तय है कि हम अपने पुरुषार्थ से आधुनिक उपलब्ध तंत्र विज्ञान डिजिटल सिस्टम की सहायता से इस पर कितना भी काम करें वह देवशरण मिश्रा के मेहनत के आगे नाम मात्र का भी हो जाए इसमें मुझे शंका है। सोन के पानी का रंग लिखने के लिए जो अनुभव से मेहनत श्री मिश्र ने किया उसे भी मैं सोन के पुरुषार्थ से कमजोर नहीं समझता। किंतु वर्तमान में आजादी के नाम पर हमारा माफिया सिस्टम इस सोने की सनातन सुनहरी संस्कृति को हत्या करने में तुला हुआ है। ऐसे में देवशरण की लेखनी के देवत्व को स्वीकारना कमजोर मानो मस्तिष्क वाले मनुष्य समूह जो एक माफिया के रूप में विकसित हो चुका है थोड़ा संभव है क्योंकि उनके लिए आजादी का मतलब आर्थिक साम्राज्यवादी ताकतों के साथ गठबंधन उपलब्ध विरासत की विराट सनातन और उसके संसाधन को लूटने के अलावा और कुछ नहीं है। शुद्ध शब्दों में कहें तो यह एक ऐसा वायरस है जो हमारी सनातन की व्यवस्था को सनातन की रक्षा का नाम देकर उसमें जहर डाल रहा है।बहरहाल शुभ कार्य के लिए अशुभ को याद करने से मन मलिन ही होता है इसलिए हमें जनता के लिए जनता के द्वारा जनता का स्थापित गणतंत्र भारत को समर्पित इस प्रयास में एक संपूर्ण निष्पक्षता के साथ आगे बढ़ने का प्रयास करना होगा निश्चित रूप से इसमें संपूर्ण प्रेरणा सोन के पानी का रंग से रंगा होगा इस पुस्तक की भूमिका लिखते हुए विख्यात साहित्यकार विद्यानिवास मिश्र ने कहा था अगर मैं भी चाहता तो ऐसी पुस्तक नहीं लिख सकता।
चार दशक पहले सोन के पानी के रंग में लिखते हुए लेखक ने जो अनुभव किया उसका हूबहू वृतांत हम लिखना चाहेंगे इसलिए भी उसे उस समय जो पर्यावरण और परिस्थिति की थी वह चार दशक बाद कितनी बची है और इस सोन नदी के किनारे जो सरकारी तथाकथित औद्योगिक विकास का भयानक साम्राज्य की सोच विकसित हो रही है वह सोन नदी को और कितना नष्ट करेंगी.. कितना प्रदूषण करेगी इसका अनुमान भी हमें डरा देता है…. तो देखते हैं की लेखक श्री मिश्र ने तब क्या लिखा था। और हम उसे कितना बता पाते हैं अभी कितना अंतर आया है यह बताने का भी प्रयास करेंगे। हमारे शहडोल नगर जहां में निवास करता हूं उसके निकटम सोन का साम्राज्य रोहनिया गांव जो सोन के दक्षिण में है और उत्तर में सोनटोला, दियापीपर आदि है।
करीब चार पहले तो सब पहले देवशरण यहां आए थे वह लिखते हैंसोहागपुर-शहडोल से लगभग 15 किमी उत्तर है, सोनतटीय रोहनिया । यहीं मध्यउन्नीसवीं सदी का बना, सोन का पक्का पुल है । पड़ोसी उजड़े गाँव के नाम पर इसे कहा जाता है दियापीपर पुल । पहले यहाँ सोन पर एक रपटा था, जो वरसात के दिनों में, पानी में डूब जाने के कारण, आवागमन के उपयुक्त नहीं रहता था । अभी भी इस रपटा के अवशेष हैं । जो अभी भी बरकरार है इस नये पुल निर्माण के बाद अमरकंटक तक का बारहमासा पक्का मार्ग भी बना, जो सोहागपुर – अनूपपुर-वसनिया ( राजेद्रग्राम ) होकर जाता है ।वह लिखते हैं रोहनिया एक साधारण गाँव है, अधिकांश रूप में आदिवासियों की बस्ती । बीस एकघर कोल लोगों के हैं, 8-10 घर गोंड़ों के, 4-5 घर अहीरों और तीन घर ठाकुरों के ।कहाँ पूर्वमध्यकालीन मूर्तियाँ, कहाँ पौराणिक ऋषियों का युग ! हमें उनकी बात मैं रस नहीं आ रहा था। लेकिन, उस समय क्या पता था कि ठीक इसी तरह का दृश्य हम पुनः दो दिनों के बाद देखेंगे ।
रोहनिया-सोन के पार भी वे हमें ले गये । वहाँ भी अनेक उत्कीर्ण शिलाखंड पड़े हैं; प्रस्तर-अलंकरण तो हैं ही। अपने चिपटे डील-डौल के कारण वे रोहनिया की मूर्तियों से भिन्न जान पड़ती हैं । रोहनिया के देवी ( ? )-मन्दिर की मूर्तियों में जो सुघड़पन है, चिकनापन है, सफाई है, तराश का परिश्रम है, वह रोहनिया – सोन-पार की उन मूर्तियों या प्रस्तर-अलंकरण में नहीं है । पत्थर भी भिन्न प्रकार के हैं । दीयापीपर पुल के पार की बलुआ पत्थरवाली मूर्तियाँ तत्कालीन भारत की लोककला का प्रतिनिधित्व करती हैं-संभवतः मौर्योत्तर शुंगकाल की, जबकि रोहनिया-झोपड़ी ( देवी मंदिर ) की मूर्तियाँ उससे परवर्ती काल की जान पड़ती हैं । दो कला -शैलियों के उदाहरण बिलकुल पास-पड़ोस में प्राप्त होने के कारण यह भी संदेह होता है कि दोनों शैलियाँ समकालीन थीं और समानान्तर रूप के साथ-साथ पनप रही थीं । इस तरह की तक्षण कला के दो भिन्न रूपों के उदाहरण हमें बाद में वर्दी में भी देखने को मिले । संभव है, रोहनिया में प्राप्त काले पत्थर की पूर्वमध्यकालीन ( कलचुरिकालीन) मूर्तियाँ बाहर से ले आयी गयी हों। इस कारण भी ऐसे विश्वास को पुष्टि मिलती है कि पूर्वकाल में रोहनिया एक महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा ।
पहले से हम देखते चले आ रहे थे सोन का पाट । कुनुक-संगम के बाद से ही सोन चौड़ा होता गया है । दियापीपर पुल के पास उसकी चौड़ाई कुछ कम जरूर; है लेकिन वह फिर चौड़ा होकर आगे बढ़ने लगता है। रोहनिया स्वयं जंगल के बीच बसा है । वहाँ रीवा- शहडोल सड़क के बाद पश्चिम को यह जंगल बढ़ता चला गया है । डुमरिहा का घोर जंगल, पठार की ऊँची-नीची जमीन । जगह-जगह सोन के सहायक नाले । इन डुमरिहा जंगल के बीच कुछ ही दूर जाने के बाद एक पक्का मकान मिला । संभवतः पहले यह वन विभाग का डाक बँगला था । अच्छे मनोरम और शान्त स्थल पर बना था, जिसके सामने बरसात में चौड़ा सोन हिलोरें लेता होगा । लेकिन आजकल इस परित्यक्त डाकबँगले का छत उजड़ गयी है, दीवारें ध्वस्त हो गयी हैं । इस दुर्दशा का कारण सोन ही है –सोन का वर्तमान रूप, जिसका विषाक्त जल पीने के काम नहीं आ सकता । यह मनोरमस्थल, जिसे पहले तपोभूमि कहा जाता था, आज भूतों के रहने की जगह बन गया है ।
वहाँ से लगभग तीन मील पच्छिम सोन का नगदहा घाट है । सोन के पेट में एक पत्थर पर – यहाँ काफी दूर तक सोन का पेट पत्थरों का ही है- नागमूर्ति उकेरी-खोदी गयी है। आधुनिक कृति है । वस, घाट का नाम पड़ गया नगदहा घाट । घाट के किनारे खुला शिवालय है और उसके चारों ओर पूर्वमध्यकालीन, अलंकृत शिलाखंड सजाकर रखे हुए हैं। मध्यप्रदेश के इस भूभाग में नागपूजा का काफी अधिक प्रचलन है । एक छोटा नाला – भजिहा नाला—यहाँ सोन में आकर अपना जल भी उड़ेलता है । इस कारण इसे संगम का महत्व भी प्राप्त हो गया है। इन सारी स्थितियों का लाभ उठाकर किसी संन्यासी ने पत्थर पर नाग की प्रतिमा खोदने की व्यवस्था की होगी। लेकिन, जब से ऊपर के अमलई राजकीय आवास योजना के अन्तर्गत पास में एक नयी बस्ती बसायी जा रही है, धर्मपुरी । जो वहाँ बस गये हैं उनके लिये तो धर्मपुरी ही है; लेकिन जो वहाँ नहीं गये हैं उन्होंने उसका नामकरण किया है यमपुरी । यमपुरी-क्योंकि पानी की वहाँ कोई व्यवस्था नहींहै । आसपास के स्रोतों के निकट में गंदा पानी मिलता है । उसीसे धर्मपुरी में बसे हुए लोगों का काम चलता है ।
यमपुरी हो या धर्मपुरी, रोहनिया अत्यन्त प्राचीन स्थान है, इसमें संदेह नहीं है । यहाँ पुरापाषाण काल के उपकरण पाये गये हैं । और फिर मध्यपाषाण काल के भी । अर्थात्, सोन-तट का लाभ उठाते हुए पाषाणकालीन मानव, जो आहार संग्रह की चिन्ता में व्यस्त घुमन्तु प्राणी रहा होगा, यहाँ और उसके पास-पड़ोस में शरण अवश्य लेता था । इसके बाद की स्थिति अंधकार में लिपटी है । लेकिन, इतिहास के पूरे मध्यकाल की अनेक मूर्तियाँ यह बतलाती हैं कि रोहनिया के वे दिन उत्कर्ष के अवश्य रहे होंगे, यद्यपि इतिहास में उसका नाम हमें कहीं पढ़ने को नहीं मिलता ।
वास्तव में, रोहनिया के उत्कर्ष–कालीन दिनों का आभास गाँव के एक ठाकुर के चौतरे की किनारी देखकर हुआ था । वह किनारी थी अलंकरण गढ़े हुए पूर्व मध्यकालीन पत्थर की । यह पत्थर घिस गया था अवश्य, लेकिन अपनी वुलन्दी के दिनों का उपयुक्त उदाहरण था । पास–पड़ोस में पायी हुई मूर्तियों को दिखाने जव शुक्लजी शाला से कुछ दूर झुरमुटों के बीच खँडहर जैसे दीखनेवाले स्थान में ले गये तो रहा–सहा संदेह भी जाता रहा । एक निहायत मामूली झोपड़ी में, बाहर भी अनेक देवमूर्तियाँ – गणेश और गणिकाओंकी, रखी हुई थीं । हवन–कुण्ड, धूपदीप, पूजा किये जाने के समस्त चिह्न । एक देवमूर्ति— विष्णु की भो; लेकिन शुक्ल जी ने बताया, स्थानीय जनों के द्वारा उस विष्णुमूर्ति की पूजा देवीमूर्ति मानकर की जाती है । वहाँ अनेक उत्कीर्ण शिलाखंड तो हैं ही, कई स्थान वहाँ ऐसे भी हमने देखे जहाँ गड्ढे खोदे गये हैं– यानी खुदाई करके मूर्तियाँ निकाल ली गयी हैं । बची–खुची ये मूर्तियाँ पूर्वमध्ययुगीन तक्षणकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं ।
पूर्वमाध्यमिक पाठशाला के प्रधानाध्यापक राधेश्याम शुक्लजी ने हमें वहीं एक पक्का फर्श भी दिखलाया । वे बार-बार उस फर्श पर पैर पटकते और कहते—“आवाज पहचानिये । भद्-भद् आवाज; नीचे खोखली जमीन है । मालूम होता है, यहाँ पहले कोई गुफा रही होगी । ये खँडहर और मूर्तियाँ, जो देव-देवियों और गणिकाओं की हैं, प्राचीन दंवालय के अंग मालूम होते हैं । स्थानीय ऋषि इसी नीचे की गुफा में विश्राम करते होंगे या योग-साधन ।” शुक्लजी और भी कुछ दिखाने चले— “चलिये, सोन तट पर चलें ।” वहाँ देखी गयी सोन के पेट से काफी ऊँची, लेकिन तट की सीध से और अधिक गहरी जमीन के भीतर घुसी हुई जगह—गलीदार गहरी भूमि, जिसे हमलोग खरोह कहते हैं । इस खरोह में घनी हरियाली छायी हुई थी, मॅझोले कद की । उस खरोह में एक गुफा-जैसी खोखली जगह दिखी। शुक्लजी बोले, “ऋषि लोग सोन में स्नान करके कुछ समय यहीं ध्यान- चिन्तनकरते रहे होंगे । बड़ी शांत जगह है । चारों ओर फैली हरी वनस्पति एकान्त-प्रिय व्यक्ति के योग-साधन के बिल्कुल उपयुक्त है ।”
वास्तव में रोहनिया सुहागपुर जनपद के बरुका ग्राम पंचायत का एकगांव है जो सोनतट से जुड़ा हुआ है ग्राम पंचायत के सचिव राजू कुशवाहा कहते हैं वह सूर्य मंदिर अभी ग्राम सभा के अधीन है किंतु उसे हम शीघ्र ही पुरातत्व विभाग को सूचित करेंगे कि वह इसे संरक्षित करने का काम करें ता
कि यह क्षेत्र पुरातात्विक दृष्टिकोण से पर्यटन का केंद्र बन सके उनका कहना है जितना संभव है ग्राम पंचायत मंदिर और सोनतट को संरक्षित करने का काम करतीहै किंतु वह पर्याप्त नहीं है पुरातात्विक महत्व के स्थलों के संरक्षण के लिए विषय विशेषज्ञ को आगे आना चाहिए
आज बस यही तक क्योंकि शहडोल जिले के रोहनिया और दियापीपर ग्राम की मध्य बहने वाले सोन नद ही हमारे निकट में है क्योंकि मैं शहडोल में रहता हूं इसलिए यही से प्रारंभ करना उचित होगा क्योंकि यहीं पर उस प्राचीन महानगर के जो कभी यहां विकसित कला का स्वरूप लिए था जो रोहनिया में भगवान सूर्य की मंदिर जो अब झोपड़ी नुमा है आज भी उसकी कहानी को प्रकाशित करने का प्रयास करता है हमने उसे ही वंदना के लिए स्थल चुना। क्योंकि यही शिव की आराधना सोन टोला में करने का अवसर मिला मकर संक्रांति के इस अवसर पर। पहले अमरकंटक की तरफ जाएं तभी हमें सोन नदी की जन्म की कहानी उनकी जुबानी में और उसकी वर्तमान कहानी में हम समझ पाएंगे कितना कुछ विकास के नाम पर नष्ट किया जा रहा है एक नद के पुरुषार्थ को कैसे वर्तमान राजनीतिक खत्म करती है इस पर भी हम प्रयास करेंगे देखने का कि हमको और कितना वक्त लगेगा बची हुई पर्यावरण और परिस्थिति को इस गति में यदि हम विनाश करते हैं। क्योंकि सोननद के कल कल प्रवाह के नाद बचाने के लिए फिलहाल तो ना इस क्षेत्र का प्रशासन सुनिश्चित कर पा रहा है और ना ही तथा कथित प्रदूषण नियंत्रण विभाग अपना कोई पक्ष साप्ताहिक या मासिक प्रकाशित करके बताता है कि वास्तव में सोननद जल की गुणवत्ता का कितना पतन हुआ है। तो इस प्रकार की कल्पना निरर्थक नहीं है क्योंकि यह जमीन पर 40 दशक बाद कितना बदला है इसका मूल्यांकन करना ही चाहिए। 26-1-26


