
बापू हम शर्मिंदा हैं,….
भारत हम शर्मिंदा हैं…….
शंकराचार्य हम शर्मिंदा है……
सनातन हम शर्मिंदा हैं…………..
आज 30 जनवरी है, एक हिंसक विचारधारा ने जिसका चेहरा नाथूराम गोडसे बना, सुनहरे भारत का सपना देखने वाला महात्मा गांधी कि आज हत्या कर दी गई थी, 30 जनवरी 1948 को. भारत को अंग्रेज की गुलामी से आजाद हुए स्थिरता से सोचने ही नहीं मिला कि वह कैसे किस दिशा में आगे बढ़ेगा.. आजादी नाम की चिड़िया हाथ तो लग गई थी, तंत्र का “स्व” समा जाने की स्वतंत्रता अभी आंख ही खोल पाई कि सपना देखने वालों का प्रथम सूत्रधार की हत्या कर दी गई. एक असुर के द्वारा स्वतंत्रता के सुर की हत्या को जायज ठहराने वाले या फिर उसकी निंदा न करने वाले दोनों अमृत काल में आजाद घूम रहे हैं. तो यह तो होना ही था क्योंकि धर्म स्वतंत्रता का वाहक होता है वह धीरे-धीरे अस्तित्व को खोता जा रहा था क्योंकि उसकी पहचान विकास की अंधाधुंध रफ्तार में खोती जा रही थी.
( त्रिलोकी नाथ )
मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी तक की यात्रा के पक्ष. हे राम.., कहकर स्वप्न दृष्टा का निधन हो गया था। फिर भारत मे आध्यात्मिक विविधता पर चिंतन और मंथन किए बिना उसको संविधान में सुरक्षित आधार दिए बिना वह विकास की आंधी रफ्तार में चल पड़ा… स्वाभाविक है ऐसा विकास ठोकर लगता हुआ गिरता पड़ता हुआ आगे बढ़ रहा था,. किंतु असुर जो मरा नहीं था अमृतकाल तक आते-आते कालनेमि राक्षस बनकर हनुमान की यात्रा को रोकने के लिए रावण ने भेज दिया। मजे की बात यह है कि वह खुद अपना परिचय प्रयागराज तीर्थ मे उन शंकराचार्य को बता रहा था जिन पर आदि शंकराचार्य ने भारत की भूमि पर सनातन धर्म के प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी।
भारत की स्व-तंत्रता में कानून ही उसका ब्लड बोन है और कानून मजाक बना हुआ है “जिसकी लाठी उसकी भैंस…” के तर्ज पर कानून चलता है। संविधान की इस कमजोरी को असुर पहचान गया था, वह नाथूराम गोडसे की मृत शरीर को छोड़कर एक ऐसे शरीर को ढूंढ रहा था जो पावरफुल हो और सत्ता को नियंत्रित करने का उसकी ताकत असीम हो। वह आर्थिक साम्राज्यवाद का नकाब पहनकर भारत के साधु संतों आध्यात्मिक विरासत उसकी विविधता के तमाम धार्मिक केंद्रों पर वह कब्जाकरना चाहता। फिर चाहे वह मंदिर हो, गुरुद्वारा हो, मस्जिद हो, गिरजाघर हो या फिर भारत की विभिन्न भाषा शैली मे रचा बसा हिंदू सनातन धर्म के रचे बसे विभिन्न संप्रदाय और जीवन शैली ही क्यों न हो; असुर, ऐसा ही उसने सकारात्मक या फिर नकारत यानी प्यार से या फिर नफरत से वह उसका उपयोग किया।
अनुभव में भारतके संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल में औद्योगीकरण इसका बड़ा चेहरा बनकर आया। जबपांचवी अनुसूची नहीं लगी थी पूर्ण रूप से तब एक अकेली संस्था ओरिएंट पेपर मिल आर्थिक साम्राज्यवाद का चेहरा था उसने जल जंगल और जमीन तीनों को ही नष्ट किया क्योंकि उसकी उतनी ही ताकत थी, भारत के तब तक के कृषि विकास दर में शहडोल की भूमिका नगण्य रही..क्योंकि तब शहडोल में अनूपपुर जिला और उमरिया जिला भी शामिल रहा।औद्योगिक विकास नामक असुर ने पहला काम जिले को तोड़कर विकेंद्रीकरण के नाम पर किया। उसने अपने हिंसक विचारों के जरिए संविधान में सुरक्षित इस आदिवासी क्षेत्र की प्राकृतिक क्षमता संसाधनों को नष्ट-भ्रष्ट करने और उसे लूटने में 25 वर्ष के अंदर ही अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। शहडोल क्षेत्र (शहडोल ,अनूपपुर और उमरिया) में असुर ने पूरी नदियों का सुनहरी रेत पूरी ताकत से खत्म करने का काम किया तमाम जमीन के अंदर छुपे प्राकृतिक खनिज संसाधनों को नीलाम कर लुटेरो के लिए छोड़ दिया यह औद्योगिक आर्थिक साम्राज्यवाद का असुर है। यह चाणक्य की उसे सिद्धांत को लात मारता जो सूत्र कहता है जैसे फूल से सुगंध लेते हैं उसी प्रकार से कर राजस्व का दोहन करना चाहिए।
आर्थिक साम्राज्यवाद का असुर हिंसक तरीके से इस खनिज सम्पदा को सिर्फ हत्या कर रहा है और वह भारत को दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था का झुनझुना भी पकड़ना चाहता है। इसी क्रम में मुकेश अंबानी नाम का असुर 2009 में रिलायंस इंडस्ट्रीज से सीबीएम गैस आज 2026 में भी बिना किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया अवैध रूप से पूरी गुंडागर्दी के साथ, पूरी हिंसक विचारधारा के साथ वह भारत माता को बिना उसका राजस्व दिए निकाल रहा है कह सकते हैं शहडोल की जमीन के साथ वह बलात्कार कर रहा है… क्योंकि कानून उसे सहमति नहीं देता. कानून के रक्षक जो शहडोल से दिल्ली तक बैठे वह असुर साम्राज्य के मुखिया के आंख के इसारे को समझते हैं क्योंकि वह मुखिया तृप्त किए हुए हैं। यह उदाहरण है।पूरे भारत में ऐसा ही मॉडल काम कर रहा होगा..? इसमें संका का क्यों करनी चाहिए। गोंडसे की विचारधारा के संरक्षक जिन स्वयंसेवक के जरिये इसपर नजर रखतेहै वहभी वह भी आर्थिक साम्राज्यवादी की जूठन में अपना और अपने बच्चों का पेट पालने में लगे हुए हैं।
ऐसे में स्वतंत्रता जब प्रयागराज तीर्थ में पहुंचती है तंत्र की स्व के सनातन-धर्म की रक्षक और वाहक ज्योर्तिमठके शंकराचार्य को भी संगम तक पहुंचने पर रोक देती है क्योंकि वह शंकराचार्य के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को नियंत्रित करना चाहता है.. शंकराचार्य को 18 जनवरी को ना सिर्फ अपमानित किया जाता है बल्कि उनके बटुक से लेकर वृद्ध शिष्य एवं महिला साध्वी तक के साथ मारपीट और अभद्रता भी की जाती है।
स्व-तंत्रता की पहचान को तलाशने के क्रम आध्यात्मिक पीठाधीश अपमानित जहर पीकर 11 में दिन तीर्थराज प्रयागराज में बिना संगम स्नान किया स्थान को कई हिंदू सनातन धर्म के प्रश्नों के अनुत्तरित छोड़कर नई खोज में चल पड़ते हैं। 18 जनवरी से 28 जनवरी तक वह अपमान के विष ज्वाला में संगमको साक्षी इस बात का इंतजार कर रहे थे की “संत हृदय नवनीत समाना….”कोई पुरुषार्थ तो होगा ही जो बचा होगा…? वह आएगा और परिचय देगा कि भारत स्वतंत्र है उसके तंत्र में स्व मे समा जाने की चाहत होगी, जो जिम्मेदार होगा लेकिन कोई वीर पुरुष; महात्मा अमृत काल में उन्हें दिखाई नहीं दिया।
“धार्मिक स्वतंत्रताके अधिकार” साथ भारत के संविधान की 6 मौलिक मे स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, की गारंटी मे 3 गारंटी की नाथूराम गोडसे के भूत ने पूरे दल-बल के साथ पूरे 10 दिन नंगा नाच करने के बाद धारदार हथियार से हत्या कर दिया।
सोना, जो हर भारतीय स्त्री की सपना की चाहत है उसकी स्वतंत्रता की पहचान है दो लाख रुपए तोला 10 ग्राम होनेकी कगार मे है डॉलर का मूल्य₹100 के लक्ष्य में दौड़ रहा है… आर्थिक साम्राज्यवाद का असुर संपूर्ण स्वतंत्रताको नष्ट भ्रष्ट का तांडव कर रहा है.
स्वतंत्रता ने सोना महंगा कर दिया, सोना से आने वाली नींद सोने कि स्वतंत्रता भी खत्म हो गई…. शहडोल क्षेत्र से निकल कर पतित पावनी गंगा मैं विलय हो मोक्ष की कल्पना करने वाले सोननद (यानी सोन नदी) की सुनहरी रेत जो उसके स्वतंत्र उड़ान के पंखों के समान थी.. शासन और प्रशासन व माफिया असुर के बलात्कार की शिकार होकर परखच्चे उड़ गए। अब वह निर्वस्त्र सोन निर्लज्जता के साथ गंगा में मिल उस पतित पावनी गंगा को भी अपवित्र करताहै। क्योंकि हम दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था पाने के लिए नाथूराम से नथ गए हैं। और इसलिए भी शंकराचार्य जी जो हमारे धार्मिक सनातन धारा के प्रवर्तक हैं गंगा ने मुंह मोड़ लिया है या फिर प्रयागराज के साक्षी पर उनकोअपमानित किया गया है। क्योंकि आर्थिक साम्राज्यवाद का असुर गोंडसे की हिंसक विचारधारा से सनातन धर्म पर हमला कर दिया। यह पूर्ण नहीं है इसलिए हम कह सकते हैं,

